अब यह कांग्रेस का नहीं छात्रों का आन्दोलन बन गया

प्रयागराज और पटना दोनों कोटा से अलग हैं। कोटा में लगभग सभी छात्र अकेले रहते हैं। उन पर नियंत्रण कोचिंग सेंटर वालों, या पीजी होस्टलों या अगर कमरा किराए पर ले कर रह रहे हैं तो मकान मालिकों का है।;

Update: 2026-06-21 21:40 GMT

प्रयागराज और पटना दोनों कोटा से अलग हैं। कोटा में लगभग सभी छात्र अकेले रहते हैं। उन पर नियंत्रण कोचिंग सेंटर वालों, या पीजी होस्टलों या अगर कमरा किराए पर ले कर रह रहे हैं तो मकान मालिकों का है। खुद मां-बाप जब मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए छोड़ने आते हैं तो कह जाते हैं ध्यान रखना। कोटा में तैयारी कर रहे बच्चों के बीच कोई एकता का सूत्र नहीं होता।

अगले महीने जुलाई से आपको माहौल बदला हुआ दिखेगा। कोटा के छात्र सम्मेलन की सफलता के बाद जुलाई में तीन छात्र सम्मेलन हैं। 10 जुलाई प्रयागराज, 11 जुलाई पटना और 14 जुलाई दिल्ली। कांग्रेस के इन सम्मेलनों को असफल करने के लिए सरकार कई प्रयास कर रही है। कोटा में भी किया था। वहां कोचिंग सेंटर के संचालकों के जरिए छात्रों को डराया गया था। बड़े होस्टलों के मालिकों ने यही कोशिश की थी। सरकार प्रशासन सब ने कोशिश कर ली थी मगर कोटा के दशहरा मैदान में छात्र उमड़ पड़े। सवाल उनके भविष्य का था।

पिछले 12 साल में विपक्ष खासतौर से कांग्रेस के कई कार्यक्रम हुए। सफल भी चर्चित भी। मगर यह पहली बार है कि कांग्रेस के शुरू आंदोलन को छात्रों ने अपना बना लिया। इसका असली रूप देखने को मिलेगा इलाहाबाद जिसकी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पूरे भारत में अव्वल रही उसका नाम बदल कर अब प्रयागराज कर दिया है।

मगर नाम बदलने से इस शहर की युवा शक्ति का संघर्ष का जज्बा नहीं बदल जाएगा। यह वह शहर है संगम वाला जहां का नौजवान दो हाथ लगे और पार हुए के चढ़ी हुई नदी को पार करने के जज्बे वाला रहा है।

प्रयागराज और पटना दोनों कोटा से अलग हैं। कोटा में लगभग सभी छात्र अकेले रहते हैं। उन पर नियंत्रण कोचिंग सेंटर वालों, या पीजी होस्टलों या अगर कमरा किराए पर ले कर रह रहे हैं तो मकान मालिकों का है। खुद मां-बाप जब मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए छोड़ने आते हैं तो कह जाते हैं ध्यान रखना। कोटा में तैयारी कर रहे बच्चों के बीच कोई एकता का सूत्र नहीं होता।

मगर प्रयागराज जो भारत का सबसे पुराना प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का केन्द्र हैं वहां बच्चों पर स्वनियंत्रण के अलावा और कोई दबाव नहीं होता। कोटा के मुकाबले बहुत मुश्किल में रहते हैं। छोटे-छोटे कमरे, कम पैसे में गुजर करते हैं। कोटा में मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे होते हैं। प्रयागराज और पटना में गरीब घरों के। उनके लिए आर-पार की लड़ाई होती है।

अगर प्रतियोगी परीक्षा निकाल लिए तो ठीक है नहीं तो फिर गांव लौटना या छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी ही विकल्प बचते हैं। कोटा वालों को अगर सरकारी मेडिकल इंजीनियरिंग नहीं मिला तो प्राइवेट मेडिकल इंजीनियरिंग में चांस होता है। मां-बाप चाहे कर्ज लें, गांव की जमीन बेचें मगर एक कोशिश करते हैं। मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए और भी दूसरे ठीक-ठाक जॉब के चांस रहते हैं।

मगर प्रयागराज और पटना में पढ़ने आए बच्चों के पास इतने विकल्प नहीं होते। गांवों के बच्चे होते हैं। मां-बाप पेट काटकर पढ़ने तैयारी के लिए पैसे पहुंचाते हैं। जिसने प्रयागराज और पटना के लड़के-लड़कियों का कष्टमय जीवन नहीं देखा वह नहीं समझ सकता कि गरीबी में पढ़ाई और एन्ट्रेंस टेस्टों की तैयारी कैसी तपस्या है। कोटा में बच्चे पेट भर और स्वादानुसार भी खाते हैं। यहां महीने के आखिर में एक टाइम खाकर और उबले चावल भी खाकर बच्चे काम चलाते हैं।

तो ऐसी स्थिति में जब कोटा के छात्र निकलकर राहुल के साथ आए तो आप समझ सकते हैं कि पेपर लीक होने, समय पर रिजल्ट नहीं निकलने, रिजल्ट निकाल कर फिर कैन्सिल कर देने, फिर परीक्षा फिर रिजल्ट और फिर कोर्स शुरू नहीं होने से त्रस्त हो चुके उत्तर प्रदेश और बिहार के स्टूडेंट किस तरह इस छात्र सम्मेलन के लिए उत्साहित हैं और राहुल में उन्हें किस तरह उम्मीद दिख रही है।

उत्तर प्रदेश में पिछले सात साल में दो दर्जन से ज्यादा पेपर लीक, परीक्षाएं रद्द के मामले हो चुके हैं। हजारों युवा ओवर एज हो गए। लाखों स्टूडेंट युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो गया। बिहार का हाल भी ऐसा ही है। सवाल उठाने पर सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं।

अभी इन्हीं सवालों को उठाने पर पुलिस ने वहां एक युवा भरत तिवारी का एनकाउंटर कर दिया। एनकाउंटर और बुलडोजर को इन डबल इंजन की सरकारों में बहुत महिमामंडित किया जा रहा था। गोदी मीडिया और भक्त इस तरह दीवाने थे कि लगता था कि न्याय की देवी के बदले इन दोनों को ही प्रतीक के रूप में सुप्रीम कोर्ट में स्थापित करवा देंगे। दलित, ओबीसी, मुसलमान का एनकाउंटर इन्हें जायज लगता था। एक महिला टीवी एंकर तो बेशर्मी के साथ मुख्यमंत्री से पूछ रही थी कि गाड़ी पलटेगी? मतलब उसे मारा जाएगा?

लेकिन आग लगाने वाले यह नहीं सोचते कि यह आग उनकी तरफ भी आएगी। भरत तिवारी का एनकाउंटर जो कि हत्या ही है और इस तरह के सारे एनकाउंटर हत्या ही होते हैं के बाद अब वे लोग थोड़े चौंके हैं जो अभी तक किसी के मारे जाने पर घर गिराए जाने खुशियां मनाते थे।

तो पटना में जब 11 जुलाई को छात्र सम्मेलन होगा तो यह भी एक बड़ा मुद्दा होगा। छात्र युवाओं को कुछ नहीं देना और उनकी आवाज उठाने वाले को मार देना। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की कोटा से उठाई हुई आवाज अब देश भर गूंजने लगी है।

बेरोजगारों का हाल क्या है? हर साल 15 से 20 लाख युवा नौकरी के फार्म भरते हैं। उसके लिए एक हजार से तीन हजार तक एप्लीकेशन फीस ली जाती है। लेकिन लूट यहीं खत्म नहीं हो जाती। फार्म में अगर कोई करेक्शन करना है तो पहली बार में दो सौ रुपए और सैंकड टाइम में पांच सौ रुपए। किसी न्यूज़ चैनल में सवाल देखा कि बेरोजगारों से छोटी नौकरियों के लिए सरकार एप्लीकेशन फीस क्यों लेती है?

हिन्दू-मुसलमान के बारे में तो इन चैनलों को सब पता होता है मगर क्या यह पता है कि कई जगह तो केवल एक पोस्ट निकाली जाती है। हजारों युवा फार्म भरते हैं। अधिकांश को रिटर्न के लिए भी नहीं बुलाया जाता। कैसे यह लोग पढ़े हैं? कैसे एन्ट्रेंस टेस्ट नौकरियों की तैयारियां की हैं? कैसे हिम्मत करके मां-बाप से फार्म भरने के लिए पैसे मांगें और फिर कभी टेस्ट की तारीख घोषित नहीं हुई है। तो कभी पेपर लीक हो गए। कभी टेस्ट हो गए रिजल्ट रूका पड़ा है और रिजल्ट आ गया तो नियुक्ति नहीं दे रहे।

एक नया खेल और निकाल रखा गया है। नॉट फाउंड सुटेबल। एनएफएस। अभी तक आरक्षित सीटों पर कर रहे थे। अब जनरल पर भी करने लगे। जैसे बताया कि दलित ओबीसी मुसलमान के एनकाउंटर पर खुश हो रहे थे। अब बिहार में सवर्ण तिवारी का कर दिया। ऐसे ही जनरल के दलित पिछड़ों की सीटों पर एनएफएस का फरमान आने पर बहुत खुश होते थे। कहते थे यह योग्य ही नहीं हैं।

अभी उत्तर प्रदेश में 331 वैकेंसियां खाली छोड़ दी गईं। दो दौर की परीक्षाओं के बाद कहा गया कोई योग्य नहीं पाया गया। लोकसेवा आयोग उत्तरप्रदेश की 2 जून 2026 की विज्ञप्ति। वैकेंसी 2003 में निकाली थीं। 2004 में परीक्षा हुई दो बार पहले जनवरी में फिर जून और जुलाई में। हजारों युवा बैठे थे। और अब 2026 जून में कहा जा रहा है कोई योग्य नहीं। रिक्तियां खाली छोड़ी जाती हैं।

पढ़ाई से लेकर नौकरी तक कहीं कोई मतलब नहीं है। बारहवीं की सीबीएसई की जो परीक्षा बच्चों के पूरे भविष्य का आधार होती है उसमें कितनी गड़बड़ियां हुईं सबने देखा। यह भी देखा कि सवाल उठाने वाले बच्चे को पाकिस्तानी कह दिया गया। सरकार इन सब को मुद्दा ही नहीं मानती है। ऐसे में कांग्रेस के शुरू किए छात्र सम्मेलन स्टूडेंट और युवा को अब अपने लगने लगे। प्रयागराज और पटना से मालूम पड़ जाएगा कि छात्र और युवा कितना जागे हैं। अपना भविष्य वे कैसा देखना चाहते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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