उपभोक्तावादी विनाश से आदिवासी आर्थिकी ही बचाएगी
कथित मुख्यधारा ने जनजातीय राजवंशों का राजपूतीकरण किया तो जनजातीय देवी-देवताओं का ब्राह्मणीकरण।;
- रणेन्द्र
कथित मुख्यधारा ने जनजातीय राजवंशों का राजपूतीकरण किया तो जनजातीय देवी-देवताओं का ब्राह्मणीकरण। देउड़ी ग्राम के मुण्डाओं की ग्राम-देवी रांची, तमाड़ की देउड़़ी देवी को ब्राह्मणवादी संरचना में सम्मिलित करने का प्रयास सामने चल रहा है। पुरी के जगन्नाथ भगवान (मूलत: शबर आदिवासियों के देवता), कामरूप की कामाख्या (खासी समुदाय की देवी), तिरूपति आदि ब्राह्मण देव-श्रेणियों में शामिल किये गए।
मेरा अध्ययन, पठन-पाठन-लेखन और जीवन का बहुलांश आदिवासी-जनजातीय समाज से जुड़ा है और मैंने पाया है कि गैर-जनजातीय समाज के साथ-साथ अकादमिक जगत के बड़े हिस्से का इस समाज के प्रति नजरिया पूर्वाग्रहों से भरा है। तमाम आदिवासी समुदायों को एकरूप मानते हुए उन्हें प्रिमिटिव या आदिम (और मन-ही-मन जंगली या असभ्य) मान लिया जाता है। जिक्र उठते ही उनकी आंखों के आगे अतीत में कभी बंदर खाने वाले 'बिरहोरÓ या अंडमान के जंगलों में नग्न विचरने वाले 'जारवाÓ लोगों की तस्वीरें कौंध उठती हैं, साथ ही थोड़ी सनसनी, थोड़ी गुदगुदी का भाव भी। एंथ्रोपोलॉजी की पुस्तकों में वर्णित सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी तस्वीरें और पॉपुलर मीडिया उनके पूर्वाग्रहों को पुष्ट करते चलते हैं।
खेदजनक यह भी है कि अपने पूर्वाग्रहों के कारण या - सरकारी दस्तावेज ही इतिहास लेखन का एकमात्र स्रोत हैं - जैसे सिद्धांतों पर अमल करने के कारण आदिवासी समुदायों का ब्रिटिश-पूर्व इतिहास लिखा ही नहीं गया। मानो वे इतिहासविहीन समुदाय हों। ब्रिटिशकालीन इतिहास लेखन में भी केवल 1767 से 1947 तक के आदिवासी 'उलगुलानों' की क्रांतियों पर बल देते हुए ऐसी अवधारणा बना दी गई कि मानो ये दिन-रात लड़ने-झगड़ने, रक्तपात करने वाले लोग हों।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य जिस पर (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय और उनके ग्रंथ 'लोकायत' को छोड़कर) अकादमिक जगत का ध्यान नहीं गया, वह यह है कि इस पूरे भू-भाग में ईसा-पूर्व काल से ही दो मॉडल थे: पहला,जनजातीय संघों का समतामूलक मॉडल और दूसरा, मगध के नेतृत्व में खड़े हुए साम्राज्य का ब्राह्मणवादी, जन्म आधारित भेदभाववादी मॉडल।
अजातशत्रु के षड्यंत्रों के कारण जनजातीय समतामूलक संघों के 'बज्जी महासंघÓ की पराजय को हम प्रथम मॉडल के लिए बड़ा धक्के के तौर पर देख सकते हैं। उसके बाद कौटिल्य के अर्थशास्त्र के उद्धरणों में कौटिल्य मगध-साम्राज्य के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा जनजातीय संघ को मानते हैं, जिन्हें विखंडित कर दस-दस की संख्या में सुदूर बसाने, कृषि कर्म करवाने तथा पुन: संगठित न होने देने का उनका संकल्प सामने आता है। गुप्तकाल में ब्राह्मणों को जनजातीय शासकों के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किए गए 'ग्रामदानों' ने भी ब्राह्मणवादी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना के अबाध प्रसार में महती भूमिका निभाई।
आश्चर्य यह है कि गुप्तकाल से आज तक संगठित धर्मों के सांस्कृतिक साम्राज्यवादी कुविचार यह मानकर चल रहे हैं कि आदिवासी समाज एक धर्म-विहीन समाज है और उसे अपने धर्म की परिधि में लाना उनका परम कर्तव्य है। यह पुण्य प्रतापी कार्य सात समुद्र पार की सांस्कृतिक साम्राज्यवादी ताकतों के साथ-साथ स्वदेशी साम्राज्यवादी भी समभाव से किये जा रहे हैं। जिस समुदाय के धार्मिक चिंतन-दर्शन में समस्त जीव-जगत गोत्र के रूप में और वनस्पति-नदियां-पहाड़ पूज्य देवता के रूप में सम्मिलित हो, जहां कृषि कार्य में सहयोगी पशुओं को घर के प्रिय सदस्य के रूप में आदर प्राप्त हो, उसे धर्मदर्शनविहीन मानना कथित मुख्यधारा की बौद्धिक शून्यता नहीं तो और क्या है?
प्रकृति पर विजय से प्रारंभ हुई औद्योगिक क्रांति की लहर आज कथित चौथी औद्योगिक क्रांति तक पहुंच गई है। हमारा क्रय और उपभोग ही अर्थव्यवस्थाओं के विकास-मंदी के ग्राफ निर्धारित कर रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य प्रकृति के सनक भरे दोहन और हमारी भोग की मूल प्रवृत्ति के उद्दीपन पर निर्भर कर दिया गया है, जो हमें तेजी से संपूर्ण प्रकृति-धरती के विनाश की ओर ले जा रही है। ऐसे संकटमय समय में कोई क्योंकि 'आदिवासी आर्थिकीÓ की चर्चा नहीं करना चाहता, जो-'प्रकृति से उतना भर लें, जितना हमारी आवश्यकता है'-जैसे सिद्धांतों पर आधारित हैं? जबकि सारी पूर्वी सभ्यताएं मूलत: इसी संतोष और संयम पर आधारित रही हैं।
कथित मुख्यधारा ने जनजातीय राजवंशों का राजपूतीकरण किया तो जनजातीय देवी-देवताओं का ब्राह्मणीकरण। देउड़ी ग्राम के मुण्डाओं की ग्राम-देवी रांची, तमाड़ की देउड़़ी देवी को ब्राह्मणवादी संरचना में सम्मिलित करने का प्रयास सामने चल रहा है। पुरी के जगन्नाथ भगवान (मूलत: शबर आदिवासियों के देवता), कामरूप की कामाख्या (खासी समुदाय की देवी), तिरूपति आदि ब्राह्मण देव-श्रेणियों में शामिल किये गए। यानी शंकर, गणेश, कार्तिकेय, हनुमान से लेकर तिरूपति तक आदिवासी देवी-देवता हमारे हुए पर आदिवासी समुदाय नहीं।
कोशिश हो कि आदिवासी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह-दुराग्रह और एकांगी अवधारणा-दृष्टि बदलें, टूटे। जनजातीय राजवंशों पर शोध हो; जनजातीय धर्म, दर्शन भी दर्शनशास्त्र के अनुशासन चिंतन-लेखन का हिस्सा बनें; वैकल्पिक आर्थिकी के तौर पर 'आदिवासी आर्थिकीÓ पर विमर्श शुरू हो, ताकि आत्ममुग्ध गैर-आदिवासी समाज के माथे से अनावश्यक श्रेष्ठता-बोध का वजन कुछ हल्का हो।