भारत में बढ़ती असमानता और सिकुड़ते अवसर

भारत को हमेशा चमकीली संभावनाओं का देश माना जाता है। पुराने दौर में उसके लिए सोने की चिड़िया विशेषण का इस्तेमाल होता था;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-08-06 22:12 GMT
  • राजेश पांडेय

भारत की आबादी में युवाओं की संख्या 29 से 30 फीसदी के बीच होने का अनुमान है। चीन सहित कई देशों की तरक्की के पीछे युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से ऐसे देशों में काम करने वाली आबादी का प्रतिशत घटा है। उनकी अर्थव्यवस्था में गिरावट का एक कारण यह भी है। इस दृष्टि से भारत की बहुत अनुकूल स्थिति है।

भारत को हमेशा चमकीली संभावनाओं का देश माना जाता है। पुराने दौर में उसके लिए सोने की चिड़िया विशेषण का इस्तेमाल होता था। उसमें दुनिया की बड़ी ताकत के बतौर उभरने की क्षमता रही है। लेकिन वर्तमान स्थिति खोए हुए अवसरों की अनंत कथा के रूप में तब्दील हो गई है। पिछले कुछ वर्षों से देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। राजनीतिक सत्ता के समान संपत्ति और साधन चंद लोगों के हाथों में सिमट गए हैं। नीतियों और प्राथमिकताओं में कुछ अमीरों को ज्यादा अहमियत मिल रही है। विश्व बैंक के आंकड़े और कई विशेषज्ञों के निष्कर्ष हालात की सही तस्वीर पेश करते हैं। जानकारी छिपाने और तोड़-मरोड़कर तथ्य पेश करने में माहिर सरकार भी कई बार सच बता देती है।

भारत ने आजादी के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया था। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार का झुकाव समाजवाद और पूर्व सोवियत संघ की व्यवस्था की तरफ था। सरकार ने कई उद्योगों की बुनियाद रखी और बड़े बांध बनाए। विशुद्ध पूंजीवाद के पैरोकार कई अर्थशास्त्री देश की अपेक्षाकृत धीमी विकास दर के लिए इस मॉडल को जिम्मेदार मानते हैं। खासतौर से 2014 के बाद तो देश की तमाम समस्याओं का ठीकरा नेहरू के कार्यकाल पर फोड़ने का सिलसिला चल पड़ा है। बहरहाल, पं. नेहरू के दौर में बने एक विराट सार्वजनिक क्षेत्र ने बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए। कुछ नए शहर अस्तित्व में आए, अर्थव्यवस्था को सहारा मिला और अवसरों में आम लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी थी। एक बेहद पिछड़े देश ने विकास की दौड़ में बड़े देशों से होड़ करने का सपना देखा था।

विकास के नेहरूवादी मॉडल में आगे जाकर कई सरकारों ने बदलाव किए हैं। लेकिन आर्थिक गैरबराबरी नए शिखर स्पर्श कर रही है। यहां हम आय, संपत्ति, उत्पादन के तुलनात्मक आंकड़ों से विकास की वास्तविक स्थिति का काफी हद तक मूल्यांकन कर सकते हैं। पेरिस इकानॉमिक्स स्कूल की विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के मुताबिक भारत में कुछ लोगों के हाथ में संपत्ति और आय के जमा होने का स्तर चरम पर पहुंच गया है। वह दुनिया के सबसे ज्यादा असमान देशों की श्रेणी में आता है। राष्ट्रीय आय के 58 प्रतिशत हिस्से पर टॉप दस प्रतिशत लोगों का कब्जा है। दूसरी ओर सबसे निचली सीढ़ी पर बैठे 50 प्रतिशत लोगों के हिस्से में सिर्फ 15 प्रतिशत आमदनी आई है। कुल राष्ट्रीय आय के 40 प्रतिशत के मालिक एक फीसदी लोग हैं। विश्व बैंक की जुलाई 2026 में जारी एक रिपोर्ट में भारत को निम्न मध्यम आय की अर्थव्यवस्था बताया गया है। यह दर्जा 2009 से चल रहा है। मतलब पिछले 15-16 वर्षों से स्थिति लगभग यथावत है।

भारत के महाशक्ति बनने की संभावनाएं वर्षों से जताई जा रही हैं। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद तो विश्व गुरु, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सहित कई दावे जोर-शोर से किए जा रहे हैं। लेकिन इन दावों पर संदेह बढ़ा है। इंडियन एक्सप्रेस में अभी हाल प्रकाशित सी राजामोहन के लेख में दो विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि भारत में बड़ी ताकत बनने की कई खूबियां हैं पर इतनी नहीं कि वह दुनिया की व्यवस्था को आकार दे सके। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इतिहासकार ब्रेंडन सिम्स ने अपनी नई किताब- द रिटर्न ऑफ ग्रेट पावर्स में भारत को फ्रांस, जर्मनी और जापान के साथ महाशक्ति बनने की कगार पर खड़े देशों की सूची में रखा है। वे लिखते हैं यदि अगले दशक में भारत का कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) ब्रिटेन, जापान और जर्मनी से अधिक हो जाता है तब भी वह अमेरिका और चीन से बहुत पीछे तीसरे स्थान पर रहेगा। फॉरेन अफेयर्स पत्रिका में एक लेख में टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के माइकेल बेकले की दलील है, विश्व राजनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका तो बनी रहेगी लेकिन अपनी कई घरेलू कमजोरियों के कारण उसके वास्तविक महाशक्ति बनने की संभावना नहीं है।

ये घरेलू कमजोरियों कौन सी हैं? 2014 के बाद धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ा है, सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई ने राजनीतिक दलों के साथ औद्योगिक, व्यावसायिक हलकों में डर पैदा किया है। उद्योगपति निवेश करने में हिचकिचा रहे हैं। केंद्र सरकार के मंत्री कभी चेतावनी तो कभी सवाल पूछने के अंदाज में कहते हैं, समझ में नहीं आता है उद्योगपति निवेश करने से पीछे क्यों हट रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में प्राइवेट सेक्टर का निवेश जीडीपी के 11 प्रतिशत पर आ गया है। वहीं मनमोहन सिंह के कार्यकाल में यह 14 प्रतिशत था। यह स्थिति उस वक्त है जब मोदी सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स की दर 2019 में 30प्रतिशत से घटाकर 22प्रतिशत कर दी।

अब उद्योगपति सरकार के फैसलों, उसकी नीतियों पर सवाल उठाने की बजाय उसकी तारीफ करने में लगे रहते हैं। हर बजट का जमकर स्वागत होता है। कुछ साल पहले तक उद्योगपति राहुल बजाज सरकार के खिलाफ खुलकर बोलते थे। फरवरी 2022 में उनके निधन के बाद उद्योग क्षेत्र से ऐसी कोई असरदार आवाज सामने नहीं आई है। कॉरपोरेट सेक्टर जोखिम भी नहीं उठा रहा है। उसका ध्यान किराए, ब्याज, शेयर बाजार के लाभांश और वायदा बाजार जैसी रेंटियर गतिविधियों पर ज्यादा है। 2012-13 से 2023-24 के आयकर रिटर्न के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है, व्यावसायिक गतिविधियों से कंपनियों की कुल कर योग्य आय 57.3प्रतिशत से गिरकर 54.3प्रतिशत पर आ पहुंची थी।

न्यूयॉर्क के थिंक टैंक रोडियम ग्रुप और ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट का निष्कर्ष है, मैन्युफैक्चरिंग में भारत आगे नहीं बढ़ सका है। चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट और अमेरिका से व्यापार युद्ध ने दूसरे देशों के लिए आर्थिक फायदा उठाने के मौके बनाए हैं। लेकिन भारत के मुकाबले इस स्थिति को वियतनाम, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको जैसे देशों ने ज्यादा भुनाया है। पश्चिमी देशों की कई कंपनियों ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग चीन से हटाकर इन देशों में स्थानांतरित कर दी है।

निजी क्षेत्र के निवेश में गिरावट के बीच कुछ अमीरों की संपत्ति तेज रफ्तार से बढ़ रही है। दो उद्योगपतियों मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के बीच आगे निकलने की जबर्दस्त होड़ है। फोर्ब्स की सूची के अनुसार 2026 के मध्य में 8.84 लाख करोड़ रुपए की कुल संपत्ति के साथ अडानी भारत के सबसे अमीर शख्स थे। 2021 में उनकी संपत्ति 7.12 लाख करोड़ रुपए थी। उन्होंने पांच साल से कम समय में अपनी संपत्ति में ढाई लाख करोड़ रुपए का इजाफा कर लिया है। अडानी ने भारतीय अमीरों के सिंहासन पर लंबे समय से आसीन मुकेश अंबानी को पीछे हटा दिया है। 2021 में अंबानी की संपत्ति लगभग 8.84 लाख करोड़ रुपए थी। यह 2026 में घटकर 8.65 लाख करोड़ रुपए पर आ गई।

असमानता की एक और तस्वीर इन आंकड़ों में देखिए। बीते कुछ वर्षों में कुछ भारतीयों की आय और संपत्ति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। अभी हाल मेें वित्त मंत्रालय ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक आय वाले लोगों की संख्या 2021-22 के 142 से बढ़कर 2025-26 में 576 हो गई थी। एक अरब 40 करोड़ की आबादी में यह संख्या मु_ी भर कही जाएगी। दूसरी और बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्हें अच्छा जीवन बिताने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार 2025 में नियमित कर्मचारियों का औसत सालाना वेतन 2.7 लाख रुपए (22 हजार 699 रुपए मासिक) था। वहीं आकस्मिक कामगार का औसत दैनिक वेतन सिर्फ 453 रुपए रहा।

पिछले माह जंतर-मंतर और कुछ राज्यों में युवाओं के आंदोलन का मुख्य कारण सिर्फ प्रश्नपत्रों का लीक होना नहीं है। उसने बढ़ती बेरोजगारी और सिकुड़ते अवसरों के खिलाफ अपनी चिंता, आक्रोश और असंतोष जताया है। हर साल गिनी-चुनी सरकारी नौकरियों में आवेदन करने वालों की संख्या लाखों में रहती है। अधिकतर युवाओं को उनकी योग्यता और क्षमता के हिसाब से रोजगार नहीं मिल रहे हैं। इसलिए वे मजबूरी में सामान की सप्लाई करने वाले रोजगार से काम चला रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में खाना और अन्य सामान की डिलीवरी करने वाली कंपनियों में रोजगार कई गुना बढ़ा है। शहरों में लोगों के दरवाजों पर गर्मागर्म खाना और सामान की डिलीवरी करने वाले लोगों में ज्यादातर युवा ही होते हैं।

भारत की आबादी में युवाओं की संख्या 29 से 30 फीसदी के बीच होने का अनुमान है। चीन सहित कई देशों की तरक्की के पीछे युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से ऐसे देशों में काम करने वाली आबादी का प्रतिशत घटा है। उनकी अर्थव्यवस्था में गिरावट का एक कारण यह भी है। इस दृष्टि से भारत की बहुत अनुकूल स्थिति है। उसके सामने युवा आबादी से लाभ उठाने का मौका है। ऐसा सुनहरा अवसर एक शताब्दी में एक-दो बार ही मिलता है। इस बार चूके तो हम विकसित भारत का सपना साकार होते नहीं देख पाएंगे। अनंत संभावनाओं के बावजूद अमेरिका और चीन जैसे देशों के पीछे चलते रहेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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