ललित सुरजन की कलम से राहुल गांधी नई राह पर?
'राहुल इतना तो समझ ही रहे होंगे कि भारत की राजनीति में खेल के नियम पूरी तरह बदल चुके हैं, मुहावरे भी बदल गए हैं।;
'राहुल इतना तो समझ ही रहे होंगे कि भारत की राजनीति में खेल के नियम पूरी तरह बदल चुके हैं, मुहावरे भी बदल गए हैं। यह जानने और चुनावी मैदान में बुरी तरह घायल हो जाने के बावजूद यदि वे किन्हीं पुराने मूल्यों की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं, तो स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि इसके लिए उनकी कार्ययोजना क्या है? उसे अमल में आने के लिए क्या वे कोई समयबद्ध कार्यक्रम बना रहे हैं और इसमें उनका साथ कौन देगा? क्या सत्तालोलुप कांग्रेसियों में इतना धीरज और साहस है कि वे उनके साथ-साथ चल सकें? जब राजनीति करने का मूल मकसद ही स्वार्थपूर्ति हो तब सिद्धांतों पर टिके रहने वाले कार्यकर्ता कहां से जुटेंगे?'
'जाहिर है कि राहुल गांधी ने अपने लिए एक नया रास्ता चुन लिया है, जिस पर चलने में कदम-कदम पर बाधाएं आएंगी और हौसला कायम रखने के लिए एकमेव अवलंब दृढ़ इच्छाशक्ति का ही होगा। मुझे यहां वह नीतिकथा अनायास याद आ रही है जिसमें बाप-बेटे अपने गधे के साथ कहीं जा रहे हैं और तमाशबीनों की फब्तियां सुन-सुन अपना ही तमाशा बना बैठते हैं। कभी बाप गधे पर सवार तो कभी बेटा, कभी दोनों सवार, तो कभी दोनों पैदल। मतलब यह कि हर ऐरे-गैरे की सलाह मानने की बजाय अपनी बुद्धि से चलना ही श्रेयस्कर है। उम्मीद करना चाहिए कि राहुल गांधी भली-भांति विचार करने के बाद ही एक नए पथ पर चलेंगे और उससे डिगेंगे नहीं।'
(देशबन्धु में 13 जून 2019 को प्रकाशित)
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