मोदी करते हैं बाबा बागेश्वर की बात, राहुल करते हैं छात्र-युवा की!
इस इलाहाबाद के खुद राहुल हैं। नेहरू थे। चन्द्रशेखर आजाद जिन्होंने कहा था- जीते जीते जी मुझे अंग्रेज नहीं पकड़ सकते।;
- शकील अख्तर
इस इलाहाबाद के खुद राहुल हैं। नेहरू थे। चन्द्रशेखर आजाद जिन्होंने कहा था- जीते जीते जी मुझे अंग्रेज नहीं पकड़ सकते। यहीं इसी इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क में चारों तरफ से पुलिस से घिरने के बाद अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए खुद को गोली मार ली थी। निराला, रघुपति सहाय फिराक, महादेवी वर्मा सब इलाहाबाद में ही रहते थे।
नाम बदलने से शहर का मि•ाा•ा नहीं बदल जाता। प्रयागराज भी वैसा ही छात्रों की आवाज उठाने वाला हुआ जैसा इलाहाबाद था। राहुल के इस छात्र सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने प्रयागराज सहित पूरे यूपी का खासतौर से छात्रों का डर निकाल दिया।
हिन्दू-मुसलमान तो प्रधानमंत्री मोदी हर जगह करते हैं मगर यूपी में वे श्मशान-कब्रिस्तान तक पहुंच गए थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में वे केवल श्मशान-कब्रिस्तान तक नहीं रुके दीवाली और रमजान तक भी पहुंच गए थे। नतीजा जो वे चाहते थे वह हुआ। साम्प्रदायिकता का जहर ऐसा फैला कि यूपी में बीजेपी की सरकार बन गई। योगी मुख्यमंत्री बने और फिर हिन्दू-मुसलमान की नफरती और विभाजनकारी राजनीति ऐसी बढ़ी कि उसके अलावा यूपी में और कोई मुद्दा ही नहीं रहा।
राहुल ने प्रयागराज आकर वापस उन्हीं मुद्दों को फिर से जिन्दा कर दिया जो आम लोगों की वास्तविक जिन्दगी से जुड़े हुए थे और खास तौर से युवा और छात्रों से।
हालांकि गोदी मीडिया ने यह सब दिखाया नहीं मगर अब खबर उसकी मोहताज नहीं रही है। डिजिटल मीडिया जिसे लोग आम तौर पर यू ट्यूब कहते हैं से लेकर सोशल मीडिया तक छात्र युवाओं की वह आवाज गुंजने लगी जो राहुल के कार्यक्रम के बाद उनके दिल से निकली थी। अपने दर्द तो उन्होंने कहे ही।
ऐसे दर्द जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा फट जाए कि नौकरी की तैयारी के लिए यहां घर से दूर रहते हुए एक टाइम खाना खाते हैं। दस रुपए की सब्जी लाते हैं तीन दिन बनाते हैं। नौकरी निकालते नहीं। निकलाते हैं तो एक्जाम नहीं होता। एक्जाम हुआ तो पेपर लीक।
2017 में प्रधानमंत्री ने यूपी को यह श्मशान-कब्रिस्तान से सबसे सस्ता और खराब नशा दिया था। जिसमें सारी नौकरी शिक्षा भविष्य सब डूब गया। अब छात्र इसको समझ गए हैं। इन दस साल में मां-बाप बूढ़े और असक्त हो गए। एक छात्र स्टेज पर राहुल से कह रहा था- मां ने उसकी पढ़ाई और फिर नौकरी की तैयारी के लिए जमीन बेच दी। अब कुछ नहीं है। एक युवा ने कार्यक्रम के बाद बताया कि पिता रिटायर हो गए। घुटनों में दर्द है मगर प्राइवेट काम कर रहे हैं उसे नौकरी मिल जाए इस उम्मीद में।
छात्रों के दुखों की कोई पारावार नहीं है। एक छात्र ने स्टेज पर राहुल से कहा कि सुसाइड ही एकमात्र रास्ता है। निराशा का यह आलम। 23 छात्र पहले से कर चुके हैं नीट का पेपर लीक होने पर। राहुल ने फौरन रोका। कहा नहीं वह कोई रास्ता नहीं है। हम मिलकर रास्ते निकालेंगे। हिम्मत रखिए।
और वह हिम्मत छात्र युवाओं में आती दिख रही है। एक तरफ जब वे राहुल को स्टेज पर अपनी समस्याएं बता रहे थे। दूसरी तरफ राहुल के इस भरोसे के बाद कि साथ मिलकर लड़ते हुए इन सारी समस्याओं से जीतेंगे।
हमने सुबह जानने की कोशिश की कि छात्रों ने जो अपनी वास्तविक समस्याएं राहुल को बताईं है वह कितनी मीडिया के जरिए सामने आ पाईं। तो मालूम पड़ा कि शनिवार को मीडिया को एक और अहम काम में लगना पड़ा कि जहां राहुल ने छात्रों की शिक्षा, नौकरी, भविष्य की बात की वहीं प्रधानमंत्री ने देश के सबसे उच्च शिक्षण संस्थान आईआईटी दिल्ली में बाबा बागेश्वर की।
मीडिया को बाबा बागेश्वर का वह हिस्सा छुपाना पड़ा। छात्रों युवाओं में बहुत मजाक उड़ रहा था। मीडिया इसी काम में लगा रहा कि प्रधानमंत्री मोदी के बाबा बागेश्वर के जिक्र के प्रभाव को कैसे कम करे।
राहुल की खबर तो वैसे भी नहीं दिखाते हैं। और फिर जब छात्र और युवा भी उनके साथ हों तब तो बिल्कुल नहीं। लेकिन देश को जानना चाहिए। इतनी विपरीत परिस्थितियों में रहने के बावजूद राहुल गांधी का विश्वास था कि भारत के युवा को कोई नहीं रोक सकता। चीन, अमेरिका किसी देश का छात्र युवा भारत की इस नई पीढ़ी के मुकाबले प्रतिभाशाली नहीं है। लेकिन उसे दर्द बहुत दिया गया। बावजूद उसके वह दुनिया में अपना नाम करके दिखाएगी। देश का नाम रोशन करेगी।
इस इलाहाबाद के खुद राहुल हैं। नेहरू थे। चन्द्रशेखर आजाद जिन्होंने कहा था- जीते जीते जी मुझे अंग्रेज नहीं पकड़ सकते। यहीं इसी इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क में चारों तरफ से पुलिस से घिरने के बाद अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए खुद को गोली मार ली थी। निराला, रघुपति सहाय फिराक, महादेवी वर्मा सब इलाहाबाद में ही रहते थे। और जो ये रोज पूछते हैं कि नेहरू क्या थे? तो उसके हजारों जवाबों में से एक यहां का भी है कि नेहरू इन बड़े लेखक शायरों के दोस्त थे।
हाय फ्रेन्ड्स कहने वाले मोदी का ऐसा कोई बड़ा दोस्त? माय फ्रेंड ट्रंप को मान लें! नेहरू के महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के साथ मित्रता के संबंध थे। अब संसदीय कार्यमंत्री किरन रिजिजू यह न कह दें कि आइंस्टिन से दोस्ती क्यों की हिटलर से क्यों नहीं?
इलाहाबाद और नेहरू का जिक्र आ जाए और फिर साहित्य का तो क्या क्या बताएं? प्रेमचंद ने नेहरू की मशहूर किताब 'लेटरस फ्राम अ फादर टू हिस डाटरÓ का हिन्दी में अनुवाद किया था। पिता के पत्र पुत्री के नाम से।
यहां का विश्वविद्यालय आक्सफोर्ड आफ द ईस्ट ( पूर्व का आक्सफोर्ड) कहलाता था। अर्जुन सिंह यहीं पढ़े थे। 2004 में यूपीए की सरकार आने के बाद जब वे मानव संसाधन मंत्री बने तो उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया था। एक वह थे जो छात्रों के हित में विश्वविद्यालय का दर्जा बढ़ाते थे। एक अभी आज के थे जिन्हें अब शिक्षा मंत्री कहा जाने लगा है धर्मेंन्द्र प्रधान जिनके इस्तीफे के लिए छात्रों को आंदोलन करना पड़ा। लाठी, आंसूगैस और पैलेट गन के हमले झेलने पड़े।
जिन्होंने वहां छह हजार सीटें कम कर दीं। चार सौ प्रतिशत फीस बढ़ा दी। होस्टल की भी फीस बढ़ा दी। लायब्रेरी में पानी भर जाता है। प्रशासन कहता है कि ज्यादा पढ़कर क्या कलेक्टर बनोगे? पीने के पानी में कीड़े! शिकायत करो तो कहते हैं कि यूनिवर्सिटी पानी पीने की जगह नहीं है। यह सब बातें लाइव छात्रों ने स्टेज पर राहुल से कीं।
विश्वविद्यालय में लंबे समय से छात्रों का आन्दोलन चल रहा है। अभी दो हफ्ते पहले वहां के छात्रों ने बड़ा प्रदर्शन किया था। सोचिए लायब्रेरी खोलने पीने के पानी जैसे मुद्दों पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय जो पूर्व का आक्सफोर्ड कहलाता था वहां के छात्रों को आन्दोलन करना पड़ रहा है। 25 जुलाई को सुबह से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र सड़कों पर थे। हजारों छात्र।
अब इसे संयोग कहिए या इलाहाबाद का गुरु हथौड़ा हाथ। दोपहर तक धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। वहां का पुलिस प्रशासन और राज्य सरकार आज तक हैरान हैं कि अचानक इतने छात्र सड़क पर कैसे निकल पड़े। कोई तैयारी नहीं। किसी बड़े संगठन का आह्वान नहीं।