रेपो दर पर रिजर्व बैंक का बड़ा फैसला
रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति में ज़्यादा उदार रुख अपनाकर अर्थव्यवस्था की विकास दर को बढ़ावा देने का जोखिम उठाया है।;
- अंजन रॉय
रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति में ज़्यादा उदार रुख अपनाकर अर्थव्यवस्था की विकास दर को बढ़ावा देने का जोखिम उठाया है। विकास और महंगाई के बीच के तालमेल का, जैसा कि बैंक का विश्लेषण बताता है, महंगाई को नियंत्रित करने के लिए आपातकालीन ब्रेक लगाने के बजाय विकास को बल देने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने 5 अगस्त को अपनी नई ऋ ण नीति का ऐलान किया, जिसमें नीतिगत ब्याज दरों को जस का तस रखा गया। नीतिगत ब्याज दरें एक बहुत ज़रूरी उपकरण हैं जिनका इस्तेमाल केन्द्रीय बैंक कीमतों में स्थिरता और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार को बनाए रखने के लिए करता है।
ऊपर से देखने पर यह बात थोड़ी अजीब लगती है क्योंकि मौजूदा महंगाई दर, महंगाई के लक्षित दर से काफ़ी ज़्यादा है। रिज़र्व बैंक का अनुमान है कि आने वाले महीनों से लेकर अगले वित्तीय वर्ष की शुरुआत तक महंगाई दर लगभग 5 प्रतिशत से ऊपर बनी रहेगी। इसके उलट, रिजर्व बैंक की महंगाई का लक्ष्य स्तर 4 प्रतिशत है।
रिजर्व बैंक ने महंगाई को लक्षित स्तर पर लाने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाने के बजाय मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का फै़सला इसलिए किया क्योंकि महंगाई के उतार-चढ़ाव के उसके विश्लेषण में नीति बनाने वालों को यकीन हो गया है कि कीमतों में यह बढ़ोतरी सीमित तरह की है और आम तौर पर कीमतों में बढ़ोतरी का ज़्यादा डर नहीं है।
रिजर्व बैंक द्वारा तैयार किए गए महंगाई के आंकड़ों में विस्तार में जाएं तो, '2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) महंगाई दर 5.0 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें दूसरी तिमाही में 4.7 प्रतिशत, तीसरी में 5.9 प्रतिशत और चौथी में 5.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। वर्ष 2027-28की पहली तिमाही के लिए महंगाई दर 5.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें जोखिम समान रूप से संतुलित हैं।'
लेकिन रिजर्व बैंक ने बताया कि कोर महंगाई, यानी ईंधन और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों को छोड़कर, आरामदायक ज़ोन में है। यानी, महंगाई का मौजूदा दबाव मुख्य रूप से दो तरह की चीज़ों-ईंधन और खाने-पीने की चीज़ों- से आ रहा है। इनमें से, ईंधन की महंगाई मुख्य रूप से मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध की वजह से कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण है।
एक बार युद्ध की स्थिति स्थिर हो जाने पर, यह उम्मीद करना वाजिब है कि ईंधन की महंगाई में काफ़ी कमी आएगी। इसलिए, कीमतों में कुछ समय के लिए हुई बढ़ोतरी को रोकने के लिए नीतिगत दरों को बढ़ाने से कुल विकास की संभावनाओं और अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है।
जहां तक खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों की बात है, तो इनमें मौसम के हिसाब से बदलाव होता है और इसलिए महंगाई के रूझान में भी बदलाव होगा। आम तौर पर, गर्मियों के महीनों में और अक्टूबर के आखिर में फसल कटाई के मौसम तक खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें तेज़ी से बढ़ती हैं। इसके बाद, बाज़ार में खाने-पीने की चीज़ें आने पर उनकी कीमतें कम होने लगती हैं।
इस माहौल को देखते हुए रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति में ज़्यादा उदार रुख अपनाकर अर्थव्यवस्था की विकास दर को बढ़ावा देने का जोखिम उठाया है। विकास और महंगाई के बीच के तालमेल का, जैसा कि बैंक का विश्लेषण बताता है, महंगाई को नियंत्रित करने के लिए आपातकालीन ब्रेक लगाने के बजाय विकास को बल देने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है। यह नियंत्रण करने की सावधानी भरी सोच के बजाय ज़्यादा उम्मीद जगाने वाला है, क्योंकि रिज़र्व बैंक को घरेलू मांग पर भरोसा है कि यही विकास दर को आगे बढ़ाएगी।
रिज़र्व बैंक का तरीका असल में आंकड़ों पर आधारित होता है, यानी नए आंकड़ों के हिसाब से अपनी मौद्रिक नीति बदलाव करना। सभी केन्द्रीय बैंक ऐसा करने का वादा करते हैं और भारतीय रिजर्व बैंक भी ऐसा ही करता है। फिर भी, आखिर में, अंदरूनी समझ —यानी फै़सला लेने की क्षमता— ही असल में कार्रवाई को प्रेरित करती है।
रिजर्व बैंक गवर्नर के नीतिगत वक्तव्य में बताए गए आंकड़े को देखें तो लगता है कि मौजूदा नीति मुख्य रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था की लगातार विकास दर में मदद करने के लिए बनाई गई है। साथ ही बढ़ती अर्थव्यवस्था के दायरे में कीमतों में स्थिरता भी बनाए रखी गई है। वैश्विक हालात की आम तौर पर निराशाजनक तस्वीर के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था की मदद करने वाली नीति का यह एक अच्छा शुरुआती कदम है।
सरकार को भी ऐसा रुख पसंद आना चाहिए। प्रशासन आम तौर पर केन्द्रीय बैंकिंग प्राधिकरण से मौद्रिक नीति में उदार रुख बनाए रखकर मदद की उम्मीद करता है। देखिए रिजर्व बैंक गवर्नर ने अपने नीतिगत बयान में क्या कहा है।
रिजर्व बैंक का कहना है, 'लगातार वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद, घरेलू आर्थिक गतिविधियों ने मज़बूती दिखाई है, जैसा कि पहली तिमाही के लिए उपलब्ध उच्च आवृत्ति संकेतकों से पता चलता है।Ó अब रिजर्व बैंक गवर्नर संजय मल्होत्रा द्वारा बताए गए आंकड़े पर एक नज़र डालें:
निजी खपत में अपनी मज़ीर् से किए जाने वाले खर्च (डिस्क्रीशनरीस्पेंडिंग) की वजह से तेज़ी बनी रही, जबकि अवसंरचना और निर्माण पर सरकार के मज़बूत खर्च की वजह से निवेश की गतिविधियां स्थिर रहीं।
2026-27 की पहली तिमाही में मोटर वाहनों की बिक्री (खुदरा) में 14.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में दोपहिए और ट्रैक्टर की खुदरा बिक्री में क्रमश: 15.1 प्रतिशत और 21.4 प्रतिशत की दोहरे अंकों वाली बढ़ोतरी दर्ज की गई।
दूसरी ओर, इसी अवधि में खुदरा पैसेंजर वाहनों की बिक्री और आईआईपी उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं की बिक्री में क्रमश: 21.0 प्रतिशत और 7.2 प्रतिशत की मज़बूत रफ़्तार से बढ़ोतरी हुई। 2026-27 की पहली तिमाही में स्टील की खपत में 8.3 प्रतिशत और सीमेंट के उत्पादन में 8.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2026-27 की पहली तिमाही में पोर्ट कार्गो में 6.1 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।
पहली तिमाही के लिए कंपनियों के शुरुआती नतीजे विनिर्माण क्षेत्र में अच्छे प्रदर्शन का संकेत देते हैं। पीएमआई में बढ़ोतरी भी इस बात की पुष्टि करती है। घरेलू मांग में मजबूती के कारण सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में भी तेजी बनी रही।
1 अगस्त, 2026 तक, 413 सूचीबद्ध निजी विनिर्माण कंपनियों के नतीजे सामने आए। 2026-27 की पहली तिमाही में शुद्ध बिक्री में 21.9 प्रतिशत और संचालन लाभ में 15.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पहली तिमाही में आईआईपी विनिर्माण में 6.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। विनिर्माण क्षेत्र में, 23 में से 16 औद्योगिक ग्रुपों ने पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 2026-27 की पहली तिमाही में सकारात्मक विकास दर दर्ज की।
वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में विनिर्माण पीएमआई 54.6 पर रहा, जो विस्तार वाले ज़ोन (चौथी तिमाही: 2025-26 में 55.4) में बना रहा। पहली तिमाही 2026-27 में जीएसटी ई-वे बिल में 12.4 प्रतिशत की अच्छी बढ़ोतरी हुई, जबकि टोल से वसूली (वॉल्यूम) में 16.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पहली तिमाही: 2026-27 में जीएसटी राजस्व में 8.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पहली तिमाही: 2026-27 में घरेलू एयर कार्गो में 9.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रिजर्व बैंक के लिए सकारात्मक रुख अपनाने और नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करके विकास दर को रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देने वाली नीति अपनाने के लिए ये काफ़ी अच्छी ख़बरें थीं।