असहमति से नफ़रत तक: लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा
सत्याग्रह का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को पराजित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सोई हुई नैतिक संवेदना को जगाना है।;
- निलेश देसाई
सत्याग्रह का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को पराजित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सोई हुई नैतिक संवेदना को जगाना है। यही कारण है कि सत्याग्रह केवल सत्याग्रही के साहस पर निर्भर नहीं करता। उसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज, मीडिया और शासन उस पीड़ा को देखने, समझने और उसका उत्तर देने के लिए तैयार हैं या नहीं।
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को कभी आंदोलन की तकनीक नहीं माना। उनके लिए सत्याग्रह सत्य की खोज, आत्मबल की अभिव्यक्ति और लोकतंत्र की नैतिक चेतना को जागृत करने का माध्यम था। वे कहते थे कि जब कोई व्यक्ति बिना घृणा, बिना हिंसा और बिना प्रतिशोध के अन्याय का सामना करते हुए स्वयं कष्ट सहता है, तो वह केवल शासक से नहीं, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा से संवाद करता है।
सत्याग्रह का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को पराजित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सोई हुई नैतिक संवेदना को जगाना है। यही कारण है कि सत्याग्रह केवल सत्याग्रही के साहस पर निर्भर नहीं करता। उसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज, मीडिया और शासन उस पीड़ा को देखने, समझने और उसका उत्तर देने के लिए तैयार हैं या नहीं। यदि सुनने की यह क्षमता कमजोर पड़ जाए तो सत्याग्रह का नैतिक प्रभाव भी क्षीण होने लगता है।
हाल के वर्षों में शिक्षा, पर्यावरण, कृषि, रोजगार, भूमि अधिकार और क्षेत्रीय स्वायत्तता जैसे अनेक मुद्दों पर शांतिपूर्ण धरने, पदयात्राएं और अनशन हुए हैं। इनमें से कुछ को व्यापक समर्थन मिला, कुछ को सीमित ध्यान मिला और कुछ लगभग सार्वजनिक विमर्श से बाहर रह गए, लेकन इनसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आज भी अहिंसक प्रतिरोध लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने की क्षमता रखता है? यह प्रश्न केवल किसी एक आंदोलन या सरकार का नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का प्रश्न है।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास का शायद सबसे बड़ा अहिंसक जनांदोलन था। गांधीजी ने यह स्थापित किया कि जनता की नैतिक शक्ति किसी भी साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति से बड़ी हो सकती है। स्वतंत्रता के बाद भी इसी परंपरा ने भूदान आंदोलन, चिपको, सूचना के अधिकार, नर्मदा बचाओ आंदोलन, जनलोकपाल आंदोलन और अनेक स्थानीय जनसंघर्षों को दिशा दी। इन आंदोलनों ने लोकतंत्र को कमजोर नहीं किया; बल्कि उसे अधिक उत्तरदायी बनाया।
इतिहास यह भी बताता है कि सत्ता और जनांदोलनों के बीच तनाव हमेशा रहा है। औपनिवेशिक शासन ने गांधी और लोकमान्य तिलक पर देशद्रोह के मुकदमे चलाए। स्वतंत्र भारत में भी अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारों ने विभिन्न आंदोलनों को संदेह की दृष्टि से देखा। इसलिए यह प्रश्न किसी एक दल या सरकार का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति का है जिसमें असहमति को सम्मानपूर्वक सुनना धीरे-धीरे कठिन होता जा रहा है।
डिजिटल युग ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। आज सूचना पहले पहुंचती है और समझ बाद में बनती है। सोशल मीडिया ने नागरिकों को अभिव्यक्ति का अभूतपूर्व अवसर दिया है, लेकिन उसी के साथ समाज वैचारिक खेमों में भी बंट गया है। किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके तर्कों से पहले उसकी राजनीतिक पहचान के आधार पर होने लगता है। परिणामस्वरूप संवाद की बजाय आरोप-प्रत्यारोप उसका स्थान ले लेते हैं।
लोकतंत्र में असहमति होना स्वाभाविक है। हर आंदोलन सही हो, यह आवश्यक नहीं। हर मांग स्वीकार हो, यह भी संभव नहीं। किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि वह असहमति का उत्तर किस प्रकार देता है। क्या वह संवाद करता है? क्या वह तथ्यों के आधार पर बहस करता है? या फिर वह विरोध करने वाले की नीयत पर ही प्रश्नचिह्न लगा देता है?
गांधीजी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने राजनीति को नैतिकता से जोड़ा। उन्होंने यह विश्वास पैदा किया कि बिना हिंसा के भी अन्याय का प्रतिरोध किया जा सकता है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ने लगे कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध का कोई अर्थ नहीं रह गया है, तो इसका असर केवल आंदोलनों पर नहीं पड़ेगा; यह लोकतंत्र की बुनियाद को प्रभावित करेगा।
ऐसी स्थिति में समाज सामान्यत: तीन दिशाओं में बढ़ता है- पहली है उग्रता। जब लोगों को लगता है कि शांतिपूर्ण मार्ग से कुछ नहीं बदलता, तब कुछ लोग हिंसक या कट्टर रास्तों की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इतिहास में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। दूसरी है, उदासीनता। लोग यह मान लेते हैं कि उनकी आवाज़ का कोई महत्व नहीं है। वे सार्वजनिक जीवन से दूरी बना लेते हैं। यह मौन लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है जितनी हिंसा, क्योंकि इससे जवाबदेही की संस्कृति कमजोर होती है।
तीसरी दिशा आशा की है। प्रत्येक पीढ़ी अपने समय के अनुरूप प्रतिरोध के नए माध्यम खोजती है। गांधी के समय चरखा, 'दांडी यात्राÓ और पदयात्राएं प्रतीक बने थे। आज डिजिटल अभियान, नागरिक नेटवर्क, सामुदायिक संवाद, जनसुनवाई और सोशल मीडिया माध्यम बन रहे हैं। अहिंसा समाप्त नहीं होती; वह अपने स्वरूप बदलती है, किंतु उसका नैतिक आधार वही रहता है—सत्य, आत्मानुशासन और संवाद। यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा आरंभ होती है। क्या हमारी संसद, हमारी सरकारें, हमारा मीडिया और हमारा नागरिक समाज ऐसी आवाज़ों को सुनने की संवेदनशीलता बनाए रख पाया है? क्या हम असहमति को लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग मानते हैं या उसे संकट के रूप में देखने लगे हैं?
सत्याग्रह का अर्थ केवल विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा भी है। जब कोई नागरिक बिना हिंसा के अपनी पीड़ा लेकर समाज और सत्ता के सामने बैठता है, तब केवल सरकार ही नहीं, पूरा समाज परीक्षा में होता है। प्रश्न यह नहीं कि हम उस आंदोलन से सहमत हैं या असहमत। प्रश्न यह है कि क्या हम उसे सुनने के लिए तैयार हैं। लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता। वह इस भरोसे से चलता है कि यदि कोई नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखेगा, तो उसकी बात सुनी जाएगी। यदि यह भरोसा टूटता है, तो सबसे बड़ी हार किसी आंदोलन की नहीं होती; लोकतंत्र की होती है।
दुर्भाग्य से आज असहमति को विचारों के मतभेद के रूप में नहीं, बल्कि विरोधी के प्रति नफ़रत के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। असहमति से नफ़रत का यह दौर लोकतंत्र की जड़ों को हिला रहा है। लोकतंत्र वहीं जीवित रहता है जहां विचारों का संघर्ष होता है, व्यक्तियों का नहीं। आज आवश्यकता केवल गांधीजी को याद करने की नहीं है, बल्कि उनके उस नैतिक आग्रह को पुनर्जीवित करने की है जिसमें विरोधी भी शत्रु नहीं, संवाद का सहभागी होता है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक वृद्धि या सैन्य क्षमता से नहीं, बल्कि अपनी आलोचना को सुनने, असहमति का सम्मान करने और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं को सुधारने की क्षमता से मापी जाती है। सत्याग्रह इसलिए अतीत की विरासत भर नहीं है। वह भविष्य के लोकतंत्र की भी अनिवार्य शर्त है।
(लेखक झाबुआ जिले के 'संपर्क' संस्था के संस्थापक निदेशक हैं।) क्लासिक इम्प्रेसन