ललित सुरजन की कलम से - दफा 499 और 500

वर्तमान समय के अधिकतर नेताओं का पढ़ने-लिखने से कोई वास्ता नहीं है। ऐसे में उनके पास अगर अपनी बात कहने के लिए सही शब्दों का अभाव है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-08-06 22:20 GMT

वर्तमान समय के अधिकतर नेताओं का पढ़ने-लिखने से कोई वास्ता नहीं है। ऐसे में उनके पास अगर अपनी बात कहने के लिए सही शब्दों का अभाव है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। दूसरे- किसी नेता का उसे सुनने आई भीड़ को देखकर प्रफुल्लित हो जाना स्वाभाविक है, लेकिन उससे कहीं अधिक वे टेलीविजन के कैमरों को देखकर पहले नकली आवेश में और फिर उसी रौ में बहते हुए अपने असली रूप याने एक कुपढ़ और बददिमाग व्यक्ति के रूप में सामने आ जाते हैं।

उन्हें लगता है कि अपने विरोधियों को जितना अधिक गरियाएंगे उनकी लोकप्रियता और वोटों में उतना ही इजाफा होगा। वे भूल जाते हैं कि आपका विरोधी ही आपके भाषणों का रिकार्डिंग करवा रहा है। तीसरे- नेताओं का अहंकार सिर पर चढ़कर बोलता है।

इस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का पालन करने की नसीहत दी है तथा व्यक्ति की मानहानि को अपराध की श्रेणी में रखा है तो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए शायद उचित ही हुआ है।

(देशबन्धु में 19 मई 2016 को प्रकाशित)

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