ललित सुरजन की कलम से परीक्षा की एक और घड़ी

'असम और पूर्वोत्तर प्रांतों की समस्या आज की नहीं है। वहां सिर्फ हिन्दू और मुसलमान का प्रश्न नहीं है, बात सिर्फ बंगलादेशियों के अवैध अप्रवासन की नहीं है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-08-09 21:50 GMT

'असम और पूर्वोत्तर प्रांतों की समस्या आज की नहीं है। वहां सिर्फ हिन्दू और मुसलमान का प्रश्न नहीं है, बात सिर्फ बंगलादेशियों के अवैध अप्रवासन की नहीं है। पूर्वोत्तर में असमिया और गैर-असमियों के बीच खाई रही है; बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ से गए चाय बागानों के किसानों को भी वहां ढेरों मुसीबतों का सामना करना पड़ा है। स्थानीय जनजातियों के बीच भी हिंसक संघर्ष होते रहे हैं। इस सबके बावजूद पूर्वोत्तर धीरे-धीरे एक वृहद भारतीय परिवेश में अपने आपको ढालने में यत्न से जुटा हुआ है। इसमें समय लगेगा। हमने द्रविड़ आन्दोलन देखा है और खालिस्तान की मांग को। काश्मीर तो आए दिन खबरों में रहता ही है। गुलामी से मुक्त हुए हमें अभी पैंसठ साल ही हुए हैं। एक व्यक्ति के लिए यह लंबी उम्र हो सकती है, लेकिन एक देश के लिए यह समय का छोटा सा हिस्सा है। इसे समझकर सब्र से काम लेने की जरूरत है। एक तरफ कानून और व्यवस्था की मशीनरी को अपना काम करना चाहिए तो दूसरी ओर बहुसंख्यक समाज को अपने बीच के अल्पसंख्यकों के साथ सद्भाव और सौमनस्य कायम करने का यत्न करना चाहिए।'

(देशबन्धु में 18 अगस्त 2012 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय)

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