सडाको के कागज के पक्षी याद दिलाते हैं हिरोशिमा की
उसकी कक्षा के दोस्तों ने शेष 356 चिड़ियाएं बनाई और हजार चिड़ियों के साथ दफना दिया गया। उसके बाद सडाको के मित्रो ने उसकी याद में स्मारक बनाया।;
- बाबा मायाराम
उसकी कक्षा के दोस्तों ने शेष 356 चिड़ियाएं बनाई और हजार चिड़ियों के साथ दफना दिया गया। उसके बाद सडाको के मित्रो ने उसकी याद में स्मारक बनाया। अब शांति दिवस के दिन सडाको के स्मारक पर कागज के पक्षियों की मालाएं पहनाते हैं। उस स्मारक पर लिखा है- यही हमारे आंसू हैं, यही हमारी प्रार्थना है, दुनिया में शांति हो। सडाको की कहानी को याद करना जरूरी है। आज युद्धों में महिलाओं, बच्चों के मारे जाने, उनके भूखे और बीमार रहने की तस्वीरें आती है तो हमें विचलित कर देती हैं। आज दुनिया को शांति की जरूरत है, युद्ध की नहीं।
दो दिन पूर्व हिरोशिमा दिवस था, इस दिन को याद करने की आज बहुत जरूरत है, क्योंकि दुनिया में कई छोटे-बड़े युद्ध हो रहे हैं। अशांति व अराजकता का माहौल है। कई बार तो ऐसा लगता है कि दुनिया को खतरनाक युद्ध के बड़े नुकसान झेलने पड़ सकते हैं। ऐसे में हिरोशिमा पर हुई बमबारी के नतीजों को जानना जरूरी है, जिससे हम यह समझ सकें कि ऐसे विनाशकारी हथियारों का असर न केवल तत्कालीन होता है, बल्कि पीढ़ियों तक बना रहता है।
एक कहानी सडाको की है इस सडाको और कागज के पक्षी नामक किताब में एक लड़की की मार्मिक दर्द है। द्वितीय विश्व युद्ध जब अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर बम बरसाए थे, तब जापानी लड़की सडाको दो साल की थी। लेकिन बाद में वह बीमार हो गई। उसका बम गिरने के 9 साल बाद सडाको के जीवन पर असर पड़ा।
जब हिरोशिमा दिवस को याद किया जा रहा था। दीवारों पर एटम बम में मारे गए लोगों के फोटो चिपकाए गए थे। कागज की बनी लालटेन के अंदर मोमबत्तियां जलाई गई थी। सडाको ने उसकी लालटेन पर मृत दादी का नाम लिखा था, और उसे नदी में बहा दिया था। ये सब लालटेनें जुगुनियों की तरह टिमटिमा रही थीं।
सडाको का सारा परिवार एक मेज़ के सामने प्रार्थना के लिए इक_ा हुआ। मेज़ पर दादी की फोटो एक सोने के फ्रेम में सजी रखी थी। मिस्टर ससाकी, जो सडाको के पिता थे, ने अपने पुरखों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। बम को गिरे हुए नौ साल हो चुके थे। परंतु उसकी किरणें, उसका जहर, लोगों की मौत का कारण बना हुआ था।
सडाको का स्कूल की रिले रेस में दौड़ने के लिए चयन हुआ था। वह बहुत उत्साहित थी। इसके पहले उसने दौड़ने का अभ्यास किया था। सडाको की तेज रफ्तार देखते ही बनती थी। ऐसा लगता था जैसे वह हवा से बातें कर रही है। आखिर रेस का दिन आ गया। रिले रेस में जब उसकी बारी आई, तब सडाको जी जान व पूरी ताकत लगाकर दौड़ी। वह जीत गई थी। पर उसका दिल तेजी से धड़कने लगा, इसी दौरान उसका सिर चकराने लगा। कुछ दिन बाद भी स्कूल में वह दौड़ने समय गिर गई। जब अस्पताल में उसका एक्स रे लिया गया तो खून का कैंसर निकला।
उसे कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। इस दौरान उसके परिजन व स्कूल के दोस्त मिलने आए। एक दिन उसकी प्रिय मित्र चुज़ूकी आई। उसने उसे अच्छा होने का अनोखा तरीका बताया। उसने कहा मैंने तुम्हारी तबियत ठीक करने का एक अच्छा तरीका खोज निकाला है। फिर चुजूकी ने एक सुनहरे कागज को काटा और उसे मोड़कर एक सुंदर चिड़िया बना दी। उसने कहा कि अगर कोई व्यक्ति बीमार हो तो एक हज़ार कागज की चिड़िया बनाए तो स्वस्थ हो जाता है।
जब सडाको ने पूछा यह कागज की चिड़िया मुझे कैसे ठीक करेगी। तब चुजूकी ने उसे सारस की कहानी सुनाई।
इस तरह कागज की चिड़िया बनाने का सिलसिला शुरू हो गया। सडाको ने काफी मेहनत से कागज की चिड़िया बनाना सीखा। और सभी को कतार में सजा दिया। उसकी कुछ चिड़िया एकदम ठीक नहीं बनी थीं। एक-दो थोड़ी टेढ़ी- मेढ़ी बनी थी। परंतु यह तो शुरूआत थी।
वह चिड़िया बनाती रही। जगह कम पड़ी तो उसके एक दोस्त मासाहीरो ने उन्हें छत से लटका दिया। सडाको कई दिनों तक चिड़िया बनाती रही पर बीमारी शरीर में फैलती रही। उसको नजरअंदाज कर वह चिड़िया बनाने में लगी रही। अब तक वह चार सौ चौसठ चिड़िया बना चुकी थी। अब वह जल्दी थक जाती थी। कुछ और हिम्मत की। पूरे दिन सडाको खूब व्यस्त रहने लगी थी। वह अपने स्कूल का काम करती। अपने मित्रों को पत्र लिखती और मिलने आने वाले व्यक्तियों के साथ खेलती, गाने गाती। शाम के वक्त वह कागज़ों को मोड़कर चिड़िया बनाती। अब पक्षी बनाने में उसका हाथ साफ हो गया था। उसकी उंगलियां कागज के मोड़ों को अच्छी तरह पहचानने लगी थी। अब पक्षी सुंदर और सजीव बनने लगे थे।
एक दिन उसे बेहद कमजोरी लगी। वह गहरे सोच में डूब गई। इसी दौरान उसकी एक और मरीज केनजी से मुलाकात हुई। उसने उसके लिए भी पक्षी बनाए। अब कागज मोड़ने की अवस्था नहीं रही। उसे बीमारी के साथ-साथ उसे मौत के डर से भी लड़ना था। सुनहरा पक्षी उसके संघर्ष में सहायक था। वह सडाको की उम्मीद थी। उसने 644 चिड़िया बनाई, पर उसमें शक्ति नहीं बची। सारा परिवार उसके साथ था और एक दिन वह चिड़ियों को निहारते-निहारते गहरी नींद में सो गई। फिर कभी नहीं उठी।
उसकी कक्षा के दोस्तों ने शेष 356 चिड़ियाएं बनाई और हजार चिड़ियों के साथ दफना दिया गया। उसके बाद सडाको के मित्रो ने उसकी याद में स्मारक बनाया। अब शांति दिवस के दिन सडाको के स्मारक पर कागज के पक्षियों की मालाएं पहनाते हैं। उस स्मारक पर लिखा है- यही हमारे आंसू हैं, यही हमारी प्रार्थना है, दुनिया में शांति हो।
सडाको की कहानी को याद करना जरूरी है। आज युद्धों में महिलाओं, बच्चों के मारे जाने, उनके भूखे और बीमार रहने की तस्वीरें आती है तो हमें विचलित कर देती हैं। आज दुनिया को शांति की जरूरत है, युद्ध की नहीं। लेकिन विश्व में कई जगह युद्ध व संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं, युद्ध हो भी रहे हैं। सत्ता के शिखर पर पहुंचे राष्ट्र व व्यक्ति इनको हवा देते हैं। ऐसे अशांत, अराजक व खतरनाक मोड़ों पर दुनिया को ले जाते हैं, जो विनाश की ओर ले जाते हैं।
यह कहानी मुझे टायमेकर के नाम से प्रसिद्ध अरविंद गुप्ता जी ने उपलब्ध कराई है। उन्होंने युद्ध से जुड़ी मार्मिक कहानियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। वे बच्चों के लिए देश दुनिया का साहित्य उपलब्ध कराने के लिए मुहिम चला रहे हैं। इसके लिए बाल साहित्य का अनुवाद करते हैं, ई बुक बनाते हैं और उनकी वेबसाइट पर अपलोड करते हैं।
कुल मिलाकर, युद्ध में घायल विश्व को हिरोशिमा दिवस पर ऐसी मार्मिक कहानियों को याद करना जरूरी है, जिससे हमें शांति की प्रेरणा मिलती है। युद्ध में जीत किसी की नहीं होती, इससे विनाश और तबाही ही होती है इसलिए जरूरत है शांति समर्थक ताकतों को किसी भी तरह, हर संभव प्रयास शांति के करने चाहिए। क्या हम दुनिया को इस ओर ले जाने में सहायक हो सकते हैं, यही आज के समय की सबसे बड़ी समस्या है।