मतदाताओं के साथ धोखाधड़ी न करें जनप्रतिनिधि

राजनीतिक लाभ के लिए चुनाव से पहले और चुनाव के बाद के गठबंधन में फर्क करना भी ज़रूरी है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-06-21 21:50 GMT
  • विष्णु गजानन पांडे

राजनीतिक लाभ के लिए चुनाव से पहले और चुनाव के बाद के गठबंधन में फर्क करना भी ज़रूरी है। लोकतंत्र और लोकतंत्र बचाने के नाम पर जो राजनीति हो रही है, वह बंद होनी चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा तो होनी ही चाहिए लेकिन उसे इन अवसरवादियों से भी बचाना चाहिए और सबसे पहले मतदाता के अधिकार की रक्षा करते हुए जनादेश का आदर करना सीखना होगा।

लोकसभा में छोटे दलों में अफरा तफरी मची है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के 6 सांसद शिवसेना (एकनाथ शिंदे) में शामिल हो गए है। उधर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों ने अपने लिए नया ठिकाना ढूंढ लिया और एक अनजान पार्टी नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गये हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा के मई 2026 के चुनाव नतीजों के बाद से पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी में टूट-फूट की बातें हो रहीं थी और 60 के आसपास विधायक या तो तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर नयी पार्टी बना सकते हैं या ममता बनर्जी को निकाल कर पार्टी पर कब्जा कर सकते हैं।

आखिर यह भगदड़-बेचैनी मची क्यों है? क्या टीएमसी छोड़ने का निश्चय करने वाले सांसद/ विधायक सचमुच ममता बनर्जी से नाराज हैं? और क्या उद्धव ठाकरे के सांसद भी उनसे नाराज हैं? इस वक्त तो ऐसे ही बयान आ रहे हैं लेकिन असल वजह कुछ और ही लगती है। निश्चित रूप से ये लोग ईडी,सीबीआई, आयकर विभाग की संभावित कार्रवाई से डर रहे हैं लेकिन टीएमसी विधायकों के इस डर की वजह जानने के लिए प.बंगाल चुनाव में निर्वाचित विधायकों की पृष्ठभूमि देखनी होगी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव में जीतने वाले 292 विधायकों में से 65 प्रतिशत यानी 190 विधायक आपराधिक मामलों में आरोपी हैं। 270 में से 170 विजेता (58 प्रतिशत)गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपी हैं।

आपराधिक मामलों वाले कुल विजेताओं में से लगभग 89प्रतिशत पर गंभीर आरोप हैं। चुनाव में दो प्रमुख पार्टियों-भाजपा के 206 निर्वाचित विधायकों में 152 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें से 141 पर गंभीर मामले दर्ज हैं। तृणमूल कांग्रेस के जीतने वाले 80 विधायकों में से 34 पर आपराधिक मामले हैं और इन 80 विधायकों में 25 पर गंभीर मामले दर्ज हैं। दर्ज मामलों में हत्या, हत्या का प्रयास, यौन अपराध, महिलाओं/बच्चों के खिलाफ अपराध दंगे भड़काना, चुनावी धोखाधड़ी और वित्तीय हेराफेरी (मनी लॉन्ड्रिंग) जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू विजेता विधायकों की आर्थिक स्थिति से जुड़ा है। सबसे अधिक करोड़पति विजेता भाजपा से(114) हैं। उसके बाद तृणमूल कांग्रेस (59) के हैं। प.बंगाल में इस समय भाजपा सत्ता में हैं तो उसके विधायकों पर तत्काल कोई कानूनी कार्रवाई की स्थिति बनने की उम्मीद नहीं है लेकिन तृणमूल कांग्रेस के निर्वाचित विधायक कानूनी चपेट में आ सकते हैं और यही उनकी घबराहट का सबसे बड़ा कारण है।

पिछले पांच-सात सालों में विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में हुई टूट-फूट और भगदड़ को देखें तो यही एक बड़ी वजह नजर आती है। महाराष्ट्र में अविभाजित शिवसेना और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायकों में भगदड़ इसी वजह से हुई। पार्टी नेतृत्व से नाराजी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं भी एक बड़ा कारण है। हाल में दिल्ली में आप के सांसदों ने भी कानूनी कार्रवाई के डर से इसी तरह का फैसला किया। बहुत से नेता भाजपा में शामिल होकर या उसका अंदर या बाहर से समर्थन कर 'गंगा नहा' लिए। कई नेताओं के खिलाफ आरोप तो बड़े गंभीर लगे पर सबूतों के अभाव में वे बाइज्जत बरी हो गए। पार्टी छोड़ने वाले नेता अपना डर कभी नहीं बताता।

2019 में महाराष्ट्र में जब राज्यपाल ने महाविकास अघाड़ी को सरकार बनाने के लिए बुलाया तो बॉम्बे हाई कोर्ट में मुंबई के कुछ वकीलों, बिजनेसमैन और इंजीनियरों ने एक पिटीशन फाइल की जिसमें उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण समारोह पर रोक लगाने का आग्रह किया गया। चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग के नेतृत्व वाली बेंच के सामने पिटीशनर्स के वकील ने तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए कहा 'याचिकाकर्ता भाजपा का समर्थक हैं।

भाजपा ने चुनाव से पहले शिवसेना के साथ गठबंधन किया था इसलिए उस चुनाव क्षेत्र में भाजपा के बजाय शिवसेना का कैंडिडेट होने के बावजूद इन वोटर्स ने उसे वोट दिया। इस तरह, लाखों वोटर्स ने वोट दिया है। पिटीशनर के वकील नेदुम्परा ने कहा, 'लेकिन, चुनाव के बाद शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया और कांग्रेस और राकांपा गठजोड़ कर लिया। यह मतदाता और जनादेश के साथ धोखा है।' उन्होंने दावा किया कि 'क्योंकि जनादेश का अपमान करके सत्ता बनाई जा रही है इसलिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाना भी गैर-संवैधानिक और गलत है।' मुख्य न्यायाधीश ने याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से मना करते हुए कहा कि 'शादियों के होते ही तलाक का कॉन्सेप्ट मैरिज लॉ के लिए नया नहीं है।' चीफ जस्टिस नंदराजोग की टिप्पणी यह दिखाने के लिए काफी है कि चुनाव के बाद वोटरों के अधिकार की कोई अहमियत नहीं है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की इस कमी को दूर करना बहुत जरूरी है।

सत्ता की लालसा में राजनीतिक पार्टियां चुनाव में जीतने की संभावना रखने वाले उम्मीदवारों को चुनती हैं। देखा जाता है कि इन उम्मीदवारों को चुनने का मापदंड उनका बाहुबल, उनका क्रिमिनल बैकग्राउंड, उनके जीतने की संभावना और उनके पास मौजूद पैसा होता है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस एस. रवींद्र भट की बेंच ने सख्त निर्देश देते हुए कहा कि टिकिट देने का कारण और आधार केवल 'जीत की क्षमता' नहीं बल्कि उम्मीदवार की योग्यता, उपलब्धियों और मेरिट के आधार पर होने चाहिए। राजनीतिक दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार को टिकट देने के ठोस और तर्कसंगत कारण अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया और समाचार पत्रों में सार्वजनिक करने होंगे। इस निर्देश के बावजूद सभी प्रमुख दल 'जीतने की क्षमता' को प्राथमिकता देते हुए भारी संख्या में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारते हैं। आपराधिक पृष्ठभूमि या आर्थिक घोटालों के आरोपी, नैतिकताविहीन जनप्रतिनिधियों से ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे सत्ता का विरोध करेंगे और लोकतंत्र की रक्षा करेंगे? सबसे बड़ी बात यह है कि इन लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता और यह कहा नहीं जा सकता कि आज इस पेड़ पर चहचहाने वाला पंछी कब दूसरे पेड़ पर चहचहाते हुए नजर आएगा। दलबदल कानून की कमजोरियां उजागर हो चुकी है और यह एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं रह गया है।

किसी निर्वाचित प्रतिनिधि या प्रतिनिधियों का अपनी पार्टी या अपने नेता से मतभेद हो तो वे अपना विरोध जरूर जाहिर करें, वे पार्टी छोड़ सकते हैं लेकिन 'इधर से उधर घुस कर' वोटर्स को धोखा न दें। ऐसी व्यवस्था हो कि असंतुष्ट जनप्रतिनिधि संसद या विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दें और मतदाता का विश्वास दोबारा हासिल करें। अगर लोकतंत्र में वोटर की बहुत ज़्यादा अहमियत है तो राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे उन्हें मिले वोट की इज्जत रखें। मतदाता के सामने अपनी बात रखकर उनसे दोबारा वोट मांगना हमेशा सही रहेगा। इसी तरह राजनीतिक लाभ के लिए चुनाव से पहले और चुनाव के बाद के गठबंधन में फर्क करना भी ज़रूरी है। लोकतंत्र और लोकतंत्र बचाने के नाम पर जो राजनीति हो रही है, वह बंद होनी चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा तो होनी ही चाहिए लेकिन उसे इन अवसरवादियों से भी बचाना चाहिए और सबसे पहले मतदाता के अधिकार की रक्षा करते हुए जनादेश का आदर करना सीखना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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