क्वेटा। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में दशकों से सुलग रहा विद्रोह हाल के दिनों में एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जिसने पूरे संघर्ष की दिशा और छवि दोनों बदल दी हैं। हालिया हमलों के बाद सामने आई तस्वीरों और वीडियो में बंदूक थामे महिलाएं दिखाई दीं, हमले की जिम्मेदारी लेते हुए, बयान जारी करते हुए और खुलकर सुरक्षा बलों को चुनौती देते हुए।यह सिर्फ किसी सशस्त्र संगठन में महिलाओं की भागीदारी की कहानी नहीं है, बल्कि उस गहरे सामाजिक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो वर्षों से पनप रहा था। विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव बलूच समाज के भीतर एक बड़े मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवर्तन का संकेत है।
तस्वीरों ने बदली बहस की दिशा
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के हालिया हमलों के बाद संगठन ने अपने हमलावरों की तस्वीरें सार्वजनिक कीं। इन तस्वीरों में दो महिलाएं भी शामिल थीं। पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह असाधारण दृश्य था। हमलों के बाद बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगटी मीडिया के सामने भावुक नजर आए। लेकिन चर्चा सिर्फ हमले की नहीं थी, सवाल यह था कि महिलाओं की यह खुली भागीदारी अचानक कैसे और क्यों बढ़ी? विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा असंतोष का परिणाम है।
“मजबूरी से जन्मा विद्रोह”
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सीनियर फेलो और दक्षिण एशिया मामलों के जानकार सुशांत सरीन के अनुसार, बलूच आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण सामाजिक संकेत है। वे कहते हैं कि बलूच समाज परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष रहा है, लेकिन सामाजिक रूप से रूढ़िवादी ढांचे में महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका सीमित थी। ऐसे में सुरक्षा अभियानों, कथित दमन और जबरन गुमशुदगियों के आरोपों ने महिलाओं को पहले राजनीतिक विरोध और फिर सशस्त्र प्रतिरोध की ओर धकेला। विश्लेषकों का तर्क है कि जिन परिवारों के सदस्य मारे गए या लापता हुए, उनमें महिलाओं ने आंदोलन की कमान संभाली। यही पृष्ठभूमि उन्हें अब अग्रिम पंक्ति तक ले आई है।
2013 की ‘लॉन्ग मार्च’ से आज तक
महिलाओं की सक्रिय राजनीतिक उपस्थिति पहली बार 2013 की ‘लॉन्ग मार्च’ के दौरान बड़े पैमाने पर सामने आई थी। उस समय वे गुमशुदा लोगों के मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरीं। समय के साथ उनकी भूमिका बढ़ती गई। आज बलूच राजनीति में महिलाओं की आवाज मजबूत मानी जाती है। डॉ. महरंग बलूच जैसे नाम प्रमुखता से उभरे हैं। वे फिलहाल जेल में हैं, लेकिन कई विश्लेषकों के मुताबिक, बलूच समाज में उनकी स्वीकार्यता व्यापक है।यह संकेत देता है कि आंदोलन का चरित्र अब सिर्फ पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा।
पढ़ी-लिखी पीढ़ी और नया स्वरूप
इस आंदोलन में शामिल कई महिलाएं उच्च शिक्षित हैं- डॉक्टर, शोधार्थी और स्नातकोत्तर डिग्रीधारी। यह पहलू पाकिस्तान के लिए और चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह विद्रोह को हाशिए की समस्या के बजाय व्यापक सामाजिक असंतोष के रूप में पेश करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी समाज में शिक्षित महिलाएं हथियारबंद आंदोलन का हिस्सा बनती हैं, तो यह अलगाव की भावना की गहराई को दर्शाता है।
चर्चित घटनाएं और उभरता पैटर्न
पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाओं ने महिला भागीदारी को सुर्खियों में ला दिया।
2022, कराची यूनिवर्सिटी हमला: शारी बलूच, जो एक शिक्षिका थीं, इस घटना के बाद चर्चा में आईं।
2022, तुर्बत: पत्रकार सुमैया कलंदरानी बलूच का नाम सामने आया।
2025, कलात: विज्ञान स्नातक बानुक महेकान बलूच से जुड़ी घटना ने बहस तेज की।
इन मामलों ने संकेत दिया कि महिला भागीदारी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि एक उभरती प्रवृत्ति बनती जा रही है।
महिलाओं के हथियार उठाने के पीछे कारण
1. जबरन गुमशुदगियां
‘Voice for Baloch Missing Persons’ के अनुसार, 2000 से 2025 के बीच हजारों बलूच पुरुषों के लापता होने के आरोप लगाए गए हैं। जब परिवार के पुरुष सदस्य गायब हुए, तो महिलाओं ने नेतृत्व की भूमिका संभाली।
2. सुरक्षा अभियानों की कठोरता
मानवाधिकार संगठनों ने कई बार कठोर सैन्य अभियानों और विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई को लेकर चिंता जताई है। इन परिस्थितियों ने महिलाओं को सार्वजनिक और राजनीतिक मंच पर आने के लिए प्रेरित किया।
3. सामाजिक बदलाव
नई पीढ़ी, खासकर छात्र और पेशेवर वर्ग, आंदोलन में सक्रिय है। इससे महिलाओं के लिए भी नेतृत्व के अवसर बढ़े हैं।
4. CPEC और संसाधनों का सवाल
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और ग्वादर परियोजनाओं को लेकर स्थानीय हिस्सेदारी और संसाधन वितरण पर सवाल उठते रहे हैं। कई बलूच समूह इसे आर्थिक उपेक्षा के रूप में देखते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि महिला हमलावरों की पहचान और रोकथाम पारंपरिक सुरक्षा ढांचे के लिए अधिक जटिल हो सकती है। इससे खुफिया तंत्र और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्षों में बलूचिस्तान में सशस्त्र हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत हुई है। 2024 में पाकिस्तान में सुरक्षा बलों पर हमलों के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। एक तरफ खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियां, दूसरी ओर बलूचिस्तान में BLA की सक्रियता पाकिस्तान की सेना कई मोर्चों पर चुनौती का सामना कर रही है।
सशक्तिकरण या शोषण?
इस मुद्दे पर पाकिस्तान के भीतर भी मतभेद हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि महिलाओं को हिंसक गतिविधियों में शामिल करना उनका शोषण है। वहीं, आंदोलन से जुड़े समर्थक इसे महिलाओं की स्वतंत्र राजनीतिक भागीदारी और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति बताते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा समाधान नहीं है और इससे आम नागरिकों की सुरक्षा प्रभावित होती है।
शहबाज सरकार के लिए बढ़ती चिंता
बलूचिस्तान की स्थिति अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह गई है। यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक संसाधनों के वितरण और मानवाधिकार के मुद्दों से जुड़ चुकी है। जब महिलाएं प्रतिरोध की अग्रिम पंक्ति में दिखाई देती हैं, तो यह संकेत देता है कि समाज के भीतर असंतोष गहराई तक पहुंच चुका है। विश्लेषकों के अनुसार, यह राज्य की वैधता और भरोसे पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
संघर्ष को नया चेहरा
बलूचिस्तान में महिलाओं की सशस्त्र भागीदारी ने इस लंबे संघर्ष को नया चेहरा दिया है। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि वर्षों की घटनाओं और सामाजिक परिवर्तनों का परिणाम माना जा रहा है। हालांकि हिंसा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती, लेकिन यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि बलूचिस्तान का मुद्दा केवल सैन्य उपायों से नहीं सुलझेगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार राजनीतिक संवाद, विकास और विश्वास बहाली के जरिए इस चुनौती का सामना कैसे करती है—क्योंकि बदलता हुआ यह विद्रोह सिर्फ बंदूकों की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और अधिकारों की बहस भी बन चुका है।