वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते पर जारी बातचीत के बीच अमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त कर्नल और रक्षा विशेषज्ञ डगलस मैकग्रेगर ने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। एक विशेष साक्षात्कार में मैकग्रेगर ने कहा कि कोई भी देश अपने राष्ट्रीय हितों से ऊपर जाकर फैसले नहीं करता और अमेरिका को इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और व्यवहार की आलोचना करते हुए रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर दबाव बनाने की रणनीति को “मूर्खतापूर्ण मानसिकता” बताया। इसके साथ ही ट्रंप द्वारा प्रस्तावित “बोर्ड ऑफ पीस” को उन्होंने “भ्रष्टाचार का औजार” करार दिया और पाकिस्तान को लेकर भी विवादास्पद दावा किया।
“या तो हमारे साथ या खिलाफ” वाली सोच पर सवाल
मैकग्रेगर ने भारत-अमेरिका संबंधों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिका में यह प्रवृत्ति बन गई है कि अन्य देशों से उम्मीद की जाती है कि वे हर मुद्दे पर वाशिंगटन का समर्थन करें। उन्होंने कहा, “अमेरिका में यह आदत बन गई है कि या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ। जॉर्ज वॉशिंगटन ने स्पष्ट कहा था कि कोई भी देश अपने हितों की सीमा से आगे नहीं जाता। लेकिन पिछले 25-30 वर्षों में हम यह भूल गए हैं। भारत हर बात पर हमारी हां में हां नहीं मिलाएगा।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है और रूस से तेल आयात को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है।
रूस से व्यापार पर टैरिफ और आलोचना
गौरतलब है कि भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला किया है। इस कदम को लेकर भारत में भी आलोचना हुई है। मैकग्रेगर ने इस नीति की आलोचना करते हुए कहा कि रूस के साथ व्यापार करने पर देशों को दंडित करना अमेरिका के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है। उनके अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में परस्पर निर्भरता बढ़ी है और इस तरह की आक्रामक नीति से अमेरिका के साझेदार देशों में असंतोष बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि भारत ऐतिहासिक रूप से रूस के साथ घनिष्ठ संबंध रखता आया है, भले ही उसने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई हो। ऐसे में नई दिल्ली से यह उम्मीद करना कि वह अपने पुराने रणनीतिक साझेदार से पूरी तरह दूरी बना ले, व्यवहारिक नहीं है।
भारत-चीन संबंधों पर आकलन
भारत-चीन संबंधों को लेकर मैकग्रेगर ने अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने माना कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और तनाव मौजूद है, लेकिन किसी बड़े युद्ध की आशंका कम है। उन्होंने कहा, “सीमा पर झड़पें होती रही हैं, लेकिन कोई भी गंभीर विश्लेषक यह नहीं मानता कि भारत और चीन के बीच पूर्ण युद्ध होगा।” उनके अनुसार, दोनों देश आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से इतने महत्वपूर्ण हैं कि वे बड़े पैमाने पर संघर्ष से बचने की कोशिश करेंगे।
ट्रंप के “अनिश्चित और आवेगी” फैसलों पर टिप्पणी
मैकग्रेगर ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व शैली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ट्रंप का व्यवहार अनिश्चित और आवेगी प्रतीत होता है। उन्होंने दावा किया कि ट्रंप के कई प्रमुख फैसलों के पीछे प्रभावशाली अरबपति दानदाताओं का दबाव और प्रभाव काम करता है। मैकग्रेगर ने कहा, “अगर ट्रंप वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र होते, तो उनके निर्णय और व्यवहार अलग होते।” यह उल्लेखनीय है कि मैकग्रेगर अतीत में ट्रंप प्रशासन के साथ काम कर चुके हैं, इसलिए उनके बयान को राजनीतिक हलकों में विशेष महत्व दिया जा रहा है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर तीखा हमला
ट्रंप द्वारा प्रस्तावित “बोर्ड ऑफ पीस” को लेकर मैकग्रेगर ने तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस बोर्ड का गाजा संकट के समाधान से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। मैकग्रेगर ने इसे “शांति का मंच” नहीं बल्कि “भ्रष्टाचार और निजी समृद्धि का तंत्र” बताया। उनके अनुसार, यह पहल अमेरिकी राष्ट्रपति के इर्द-गिर्द मौजूद प्रभावशाली वित्तीय हितों के लिए एक आवरण मात्र है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस बोर्ड के जरिए कुछ ताकतवर और संपन्न समूह अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर ट्रंप या उनके सहयोगियों की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पाकिस्तान को लेकर विवादास्पद दावा
मैकग्रेगर ने साक्षात्कार में पाकिस्तान को लेकर भी सनसनीखेज दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने के लिए प्रवेश शुल्क का भुगतान किया है। हालांकि उन्होंने इस दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक दस्तावेज या प्रमाण पेश नहीं किया। पाकिस्तान सरकार की ओर से भी इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ऐसे आरोपों के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
भारत के लिए क्या संकेत?
मैकग्रेगर के बयान ऐसे समय आए हैं जब भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे हैं, वहीं रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की विदेश नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है। ऐसे में किसी एक ध्रुव की ओर पूर्ण झुकाव की संभावना कम है। मैकग्रेगर की टिप्पणियां इस व्यापक बहस को और तेज कर सकती हैं कि क्या अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ व्यवहार में लचीलापन दिखाएगा या “या तो हमारे साथ या खिलाफ” वाली नीति जारी रखेगा।
नई बहस छेड़ी
डगलस मैकग्रेगर के बयान ने भारत-अमेरिका संबंधों, रूस से व्यापार, ट्रंप की नेतृत्व शैली और मध्य पूर्व की राजनीति पर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय हित किसी भी देश की प्राथमिकता होते हैं और अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत जैसे बड़े देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत निर्णय लेते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या वाशिंगटन अपने सहयोगियों के प्रति अपनी रणनीति में बदलाव लाता है या नहीं।
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