देर से आए और दुरुस्त नहीं आए

21 मार्च को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शाम साढ़े चार बजे के करीब सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी कि रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी - ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं

By :  Deshbandhu
Update: 2026-03-23 21:40 GMT

21 मार्च को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शाम साढ़े चार बजे के करीब सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी कि रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी - ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं। सरकार चाहे इसे 'नॉर्मल' बताए, लेकिन हकीकत ये है कि उत्पादन और ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे, लघु और अतिलघु उद्योगों (एमएसएमई) को सबसे ज्यादा चोट लगेगी, रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बढ़ेंगे, विदेशी निवेशकों का पैसा और तेजी से बाहर जाएगा, जिससे शेयर बाज़ार पर दबाव बढ़ेगा, यानी हर परिवार की जेब पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ना तय है। और यह सिर्फ वक्त की बात है - चुनाव के बाद पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी की कीमतें भी बढ़ा दी जाएंगी। राहुल गांधी ने आगे लिखा कि मोदी सरकार के पास न दिशा है, न रणनीति - सिर्फ बयानबाज़ी है। सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कह रही है- सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है।

शनिवार को लिखी इस पोस्ट के बाद नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को आकर संसद में मध्यपूर्व में चल रहे युद्ध पर सरकार के नजरिए को सामने रखा। हालांकि युद्ध 28 फरवरी से चल रहा है और इस बीच संसद सत्र भी जारी ही था, तो प्रधानमंत्री के सामने पहले भी मौका था कि वे फौरन संसद से देश को संबोधित करते और बताते कि इस कठिन वक्त में वे देश को कौन सी राह पर आगे बढ़ाने वाले हैं। लेकिन यहां भी उन्हें संभवत: इंतजार था कि राहुल गांधी कुछ कहें तो वे आगे बढ़ें। हमेशा यही होता है। राहुल गांधी जिन मुद्दों को उठाते हैं, सरकार पहले उनका मजाक उड़ाती है, बाद में उसी पर आगे भी बढ़ती है। जाति जनगणना को स्वीकार करना या किसान आंदोलन में आखिरकार मानना कि कोई कमी रह गई है ये सब उसी के उदाहरण हैं।

बहरहाल, प्रधानमंत्री ने सोमवार को जो कुछ संसद में कहा, उससे देश की मौजूदा समस्याओं के हल को लेकर कोई आस नहीं बंधी, दूसरी तरफ इस युद्ध को लेकर जो स्पष्ट नजरिया उन्हें रखना चाहिए था, उसमें भी वे चूक गए। युद्ध सही नहीं है या संवाद से समाधान निकालें, जैसे उपदेश देने का वक्त अब नहीं रहा। बल्कि नरेन्द्र मोदी के सामने पूरा मौका था कि वे अपनी संसद में, अपने ही लोगों के बीच, सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था के दायरे में अमेरिका और इजरायल को कहते कि ईरान पर युद्ध छेड़कर आपने ठीक नहीं किया। आपको किसी देश की संप्रभुता को चोट पहुंचाने का कोई हक नहीं है। नरेन्द्र मोदी ऐसा करते तो शायद आज विपक्ष भी उनके साथ ही खड़ा होता और इससे पूरी दुनिया में भारत की आवाज फिर से बुलंद होती। लेकिन मोदी ऐसा अनूठा मौका चूक गए। बल्कि वे अयातुल्लाह खामेनेई और मीनाब के प्राथमिक स्कूल में मारी गई बच्चियों की हत्या की निंदा भी न कर सके, न ही उन्हें श्रद्धांजलि दी। ऐसा करने से पिछली कई गलतियां माफ हो सकती थीं।

नरेन्द्र मोदी ने ये भी नहीं बताया कि जब वे 26 फरवरी को इजरायल में थे, तो क्या उन्हें भनक नहीं थी कि ईरान पर कोई हमला होने वाला है, या इजरायल क्या सोच रहा है। वहां की संसद में जाकर हमास की आलोचना जब मोदी कर सकते हैं और गज़ा पर चुप रह सकते हैं, तब भी क्या नेतन्याहू को उन पर इतना भरोसा नहीं हुआ कि वह दो दिन बाद क्या होने वाला है, इस बारे में मोदी को संकेत दे सकें। फिर ट्रंप या नेतन्याहू के साथ घनिष्ठ मित्रता के दावे मोदी कैसे कर सकते हैं।

नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को संसद में कहा कि इस युद्ध ने भारत के सामने भी अप्रत्याशित चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसका मतलब है कि अब तक सरकार सब ठीक होने के जो दावे करती रही है, वो खोखले ही थे। मोदी ने कहा कि भारत की संसद से भी यह संदेश दुनिया में जाना चाहिए कि संकट का जल्द समाधान हो। लेकिन प्रधानमंत्री स्पेन के प्रधानमंत्री की तरह अमेरिका और इजरायल को दो टूक नहीं कह सके कि युद्ध बंद करें। इस युद्ध के जवाबी वार में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नाकेबंदी की है, जिससे हर रोज लगभग दो करोड़ बैरल कच्चा तेल और तेल उत्पाद की आवाजाही प्रभावित हुई है और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। इसमें भारत समेत तमाम देशों में ऊर्जा का संकट आया है।

बाकी देश इस संकट से निपटने के लिए वास्तविक समाधान तलाश रहे होंगे, लेकिन भारत में मोदी पिछले 11 सालों की उपलब्धियां गिना रहे हैं कि पहले 27 देशों से ऊर्जा आयात होती थी, आज 41 देशों से हो रही है। हमारी रिफाइनिंग क्षमता में भी वृद्धि हुई है। हमारे पास 53 लाख मीट्रिक टन क्रूड ऑयल का रिजर्व है। पिछले 10-11 साल में इथेनॉल के उत्पादन और उसकी ब्लेंडिंग पर बहुत काम हुआ है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जा रहा है। इससे भी बचत हो रही है। हमने मेट्रो का नेटवर्क बढ़ाया है। हमने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर बहुत अधिक बल दिया। आज वैकल्पिक ईंधन पर जिस कदर काम हो रहा है, भारत का भविष्य और सुरक्षित होगा। अब सवाल है कि जब इतना सब है तो फिर उनके अपने गृहराज्य के सूरत शहर में कई उद्योग बंद क्यों हुए और प्रवासी मजदूरों को लौटना क्यों पड़ा, ये भी नरेन्द्र मोदी को बताना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारा प्रयास है कि हर जरूरी सामान से जुड़े जहाज सुरक्षित भारत पहुंचें। हम हर पक्ष से संवाद कर रहे हैं। ऐसे प्रयासों के कारण होर्मुज स्ट्रेट में फंसे हमारे कई जहाज भारत आए भी हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने यह नहीं बताया कि भारतीय जनता के प्रति ईरान की सदाशयता के कारण जहाजों को आने दिया गया। हालांकि जिस तरह चीन के जहाज निर्बाध होर्मुज़ से गुजरे, वैसे हमारे क्यों नहीं गुजरे, ये भी बड़ा सवाल है। अब भी हमारे 37 जहाज, 1,109 नाविक और 10 हजार करोड़ रुपए के सामान फंसे हुए हैं, उन्हें निकालने की क्या योजना है प्रधानमंत्री को यह भी बताना था।

कुल मिलाकर नरेन्द्र मोदी ने एक अहम मामले में देश का पक्ष रखने में देर कर दी और फिर भी दुरुस्ती नहीं दिखा पाए। 

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