लोकतंत्र बचाने की नयी लड़ाई

कांग्रेस की पूर्व सांसद और मध्यप्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाई गईं मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करने के फैसले से भोपाल से लेकर दिल्ली तक हंगामा मचा है, जो लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है और वक्त की मांग भी है।;

Update: 2026-06-10 21:30 GMT

कांग्रेस की पूर्व सांसद और मध्यप्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाई गईं मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करने के फैसले से भोपाल से लेकर दिल्ली तक हंगामा मचा है, जो लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है और वक्त की मांग भी है। चार साल पहले चंडीगढ़ मेयर चुनाव में जब तत्कालीन रिटर्निंग अधिकारी अनिल मसीह ने मतपत्रों में गड़बड़ी कर भाजपा को जिताया था, तो सारा वाकया कैमरे में रिकॉर्ड हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया था। लेकिन सत्तारुढ़ भाजपा को न तब कोई फर्क पड़ा, न अब पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इसी बात का जश्न मना रहे हैं कि उन्हें सत्ता पर बैठे बारह साल पूरे हो गए। मीडिया भी इस समय भाजपा के जश्न की खबरों में गले तक डूबा हुआ है। इस देश का मीडिया जागरुक प्रहरी की भूमिका निभाता तो कल से लेकर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उन सवालों पर तीखी बहसें करवा रहा होता, जिन्हें कांग्रेस ने उठाया है। इसके बाद न चुनाव आयोग और न भाजपा का दुस्साहस इतना बढ़ता कि वे इस मामले में कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा करते। क्योंकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव यही कह रहे हैं कि कांग्रेस ने ही गलती की। वहीं इस मामले को कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान के नजरिए से भी देखा जा रहा है। हालांकि असल मुद्दा यह है कि भाजपा को जिताने के लिए कांग्रेस के साथ या कहें कि लोकतंत्र के साथ बेईमानी की गई है।

गौरतलब है कि मीनाक्षी नटराजन का पर्चा 9 जून को रिटर्निंग अधिकारी ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उन्होंने तेलंगाना में अपने ऊपर दर्ज आपराधिक मामले का जिक्र नहीं किया। जबकि हकीकत यह है कि उन पर कोई मामला दर्ज नहीं हुआ, कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई, केवल निजी शिकायत मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ की गई है। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि किसी की निजी शिकायत पर अदालत से एक नोटिस आया, जिसमें सुश्री नटराजन से कहा गया कि आप आकर हमें बताइए कि हम केस का संज्ञान लें या नहीं। मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेना एक प्राथमिक चरण होता है और उसमें ये फैसला किया जाता है कि केस आगे चलना चाहिए या नहीं। बिना संज्ञान के कोई भी क्रिमिनल केस जन्म ही नहीं लेता है। ध्यान देने की बात ये है कि चुनाव आयोग के कानून में स्पष्ट लिखा है कि प्रत्याशी को सिर्फ वही खुलासा करना है, जिसमें अपराध अगर सिद्ध हो चुका हो और दो साल से ज्यादा की सजा हो। रिटर्निंग अधिकारी को यही देखना होता है। लेकिन इस मामले में मजिस्ट्रेट ने संज्ञान नहीं लिया है। तो आरोप पत्र दाखिल होना और आरोप तय होना बाद की बात है। लेकिन रिटर्निंग अधिकारी ने खुद ही तय कर लिया कि यह आपराधिक मामला है, जिसे मीनाक्षी नटराजन ने छिपाया और इस आधार पर उनका नामांकन रद्द कर दिया। देश की वरिष्ठ वकील तीस्ता सीतलवाड का भी कहना है कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33 ए के तहत ऐसी कोई जानकारी तभी दी जानी है जब अदालत आरोप तय कर दे।Ó अदालत का नोटिस इस बात का सबूत है कि अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं। जब तक आरोप तय नहीं हो जाते, तब तक जानकारी देने की ज़रूरत नहीं है। इसलिए रिटर्निंग अधिकारी ने गैर-कानूनी और नियम-विरुद्ध काम किया है। तीस्ता सीतलवाड ने कहा है कि उनके खिलाफ आवाज़ उठाई जानी चाहिए और उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

हो सकता है कांग्रेस ऐसा करे और रिटर्निंग अधिकारी पर बाद में कार्रवाई हो। लेकिन क्या इससे चुनाव आयोग की जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं। भाजपा सत्ता पर बने रहने के लिए भले सौ तरह के छल-कपट करे, लेकिन यह तभी कामयाब होंगे, जब देश की संवैधानिक संस्थाएं भी इन कुटिल चालों की तरफ से आंखें मूंद ले। चुनाव आयोग इसी तरह नजरें बचाता दिख रहा है। मंगलवार शाम को जब पता चला कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज किया गया है, तो कांग्रेस नेताओं ने फौरन दिल्ली में केन्द्रीय निर्वाचन आयोग पहुंच कर शिकायत दर्ज कराना चाही। लेकिन उन्हें वहां किस तरह सुरक्षाकर्मियों ने रोका, इसे पूरे देश ने देखा और दुनिया भी देख ही रही होगी कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का निर्वाचन आयोग विपक्ष के सांसदों के साथ कैसा व्यवहार करता है। वहीं मध्यप्रदेश में कांग्रेस से चुनाव आयोग ने कहा कि 2 घंटे में वह जवाब देगा, लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया है। इस बीच कांग्रेसियों ने सामूहिक उपवास शुरु किया है। राज्य चुनाव आयोग के दफ्तर में संघ की यूनिफॉर्म लगा दी गई है। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर अदालत जाने की तैयारी कर रही है, साथ ही राष्ट्रपति के पास भी शिकायत दर्ज की जाएगी।

देश में सामान्य तौर पर जब भी राजनैतिक दल को कोई शिकायत होती है, तो इसी तरह के तरीके अपना कर इंसाफ की मांग उठाई जाती है। लेकिन भाजपा शासन में सामान्य तौर-तरीके की परिभाषा बदल चुकी है। अब हम एक ऐसे असामान्य, असाधारण और अभूतपूर्व शासन को देख रहे हैं, जिसके लिए लज्जा, निंदा, परिमार्जन जैसे शब्द अस्तित्व ही नहीं रखते हैं। लोकलाज की परवाह किए बगैर नरेन्द्र मोदी उस वक्त विदेश चले गए, जब उन्होंने देशवासियों से विदेश न जाने और तेल बचाने जैसी अपील की। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश समेत कई जजों के साथ केन्द्रीय कानून मंत्री और संसदीय कार्यमंत्री इन दिनों लंदन में बैडमिंटन मैच खेल रहे हैं, यह खर्च भी जनता ही उठा रही है। नीट पेपर लीक में कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली, भ्रष्ट निर्माण के कारण लगी आग में दिल्ली में एक साथ 21 लोग जलकर मर गए, और शोकाकुल परिवारों को उनके हाल पर छोड़कर पूरा एनडीए कुनबा सत्ता की सालगिरह की खुशियां मना रहा है।

सत्ता पर बैठे लोगों का ऐसा व्यवहार 2014 से पहले कभी नहीं देखा गया। लेकिन अब यही नया सामान्य है। तो ऐसे वक्त में कांग्रेस को भी विरोध का स्तर कुछ और ज्यादा बढ़ाना होगा, कुछ नए किस्म की अहिंसक आक्रामकता दिखानी होगी, ठीक वैसे ही जैसे गांधीजी ने असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में दिखाई थी। कांग्रेस के साथ अब बाकी विपक्ष को भी खुलकर खड़ा होना होगा, क्योंकि आज जो मीनाक्षी नटराजन के साथ हुआ, वो अगली बार किसी और पार्टी के प्रत्याशी के साथ होगा, यह तय है। अभी इंडिया गठबंधन की बैठक में यही तय हुआ है कि सारे दल दो महीने बाद फिर बैठेंगे, लेकिन जरूरत हो तो फिर सारे दलों को बैठकर एक साथ इस बेईमानी के खिलाफ रणनीति बनाकर मैदान में उतरना होगा। अकेले-अकेले लड़ाई लड़ने का वक्त अब निकल चुका है।

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