सावरकर : आभासी वीरता का खुलासा
हिन्दू महासभा के एक नेता विनायक दामोदर सावरकर के पड़पोते सत्यकी सावरकर ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ़ अवमानना का मामला दर्ज कराकर मानो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है।;
हिन्दू महासभा के एक नेता विनायक दामोदर सावरकर के पड़पोते सत्यकी सावरकर ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ़ अवमानना का मामला दर्ज कराकर मानो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। सोमवार को पुणे की विशेष एमएलए-एमपी कोर्ट में राहुल के वकील ने सत्यकी के मुंह से जो कुछ उगलवाया है, उसने सावरकर की कथित वीरता का आवरण गला कर रख दिया है। अक्सर सावरकर के नाम के आगे 'वीर' लगाया जाता है जिसके जरिये यह भ्रम फैलाया गया था कि उन्होंने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में वीरतापूर्वक हिस्सा लिया था। खासकर, अंदमान निकोबार के सेलुलर जेल में सावरकर की काले पानी की सज़ा का बहुत महिमा मंडन हुआ करता है जिसमें उन्हें अंग्रेजों के हाथों अपार कष्ट मिलना बताया जाता है। सावरकर के लिये रचा गया आभामंडल तो बहुत पुराना है लेकिन 2014 में भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार बनने के बाद उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं के मुकाबले अधिक महान, त्यागी और काफी ज्यादा कष्ट पाने की कहानियां नये सिरे से फैलाई गईं।
हालांकि इस प्रक्रिया में सावरकर की वीरता की परतें पहले से ही खुलने लगी थीं। कांग्रेस एवं अन्य दलों ने इस मुद्दे को संवेदनशील तथा भारत के इतिहास से जुड़ा होने के कारण न तो उस पर बहुत चर्चा की और न ही आजादी के लिये संघर्षरत विभिन्न विचारधाराओं एवं व्यक्तियों के बीच किसी तरह की तुलना करना उचित समझा गया। भाजपा, उसके सहयोगी संगठन, आईटी सेल, ट्रोल आर्मी आदि द्वारा विभिन्न मंचों, खासकर सोशल मीडिया पर सावरकर को सर्वोच्च दर्जे का नेता स्थापित करने का बाकायदा अभियान चलाया गया। उन पर विभिन्न प्रचार माध्यमों पर खूब अधकचरी सामग्री परोसी जाती है जिनमें बताया जाता है कि सावरकर और हिंदू महासभा, कालांतर में भाजपा की विचारधारा वाले लोगों का योगदान महात्मा गांधी एवं जवाहरलाल नेहरू से अधिक रहा है। इस बारे में कभी अज्ञानता से तो कभी सायास ऐसी कहानियां प्रसारित की गयीं जिनके जरिये बतलाने की कोशिश हुए कि सावरकर ही स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वोच्च नेता थे- बाकी सारे गौण।
वैसे इस असत्य, भ्रम एवं अफवाहों के बीच बहुत से ऐसे लोग भी थे जिन्होंने सच्चाई को सामने लाने की लड़ाई जारी रखी। सावरकर के बाबत कई तरह की बातों का सत्यापन और गलत बातों के खंडन करने की प्रक्रिया में उनकी वीरता की असलियत लगभग एक दशक से सामने आ रही है। मसलन, उनके ब्रिटिश सरकार को लिखे तकरीबन दर्जन भर माफीनामे, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजन्म कोई भी काम न करने की प्रतिज्ञा, ताज के प्रति हमेशा वफादार रहने, 60 रुपये की पेंशन, काला पानी से छूटने के बाद अपने जीवन की अंतिम सांस तक खुद को समेटकर रखने जैसे तथ्य शायद आम जनता के सामने नहीं आते, यदि भाजपा और उनके प्रचार तंत्र के जरिये सावरकर को गांधी-नेहरू से ऊपर बताये जाने का कुटिल अभियान नहीं चलाया जाय।
राहुल गांधी को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने कांग्रेस बनाम भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लड़ाई को विचारधारा के संघर्ष में बदल डाला; और इस प्रक्रिया में सावरकर, महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे, पूरी संघी ब्रिगेड स्वाभाविकत: उनके निशाने पर आ ही गयी। याद हो कि सितम्बर, 2022 में राहुल ने देशव्यापी पैदल मार्च का जो पहला चरण शुरू किया था, जिसमें उन्होंने कांग्रेस की इन्क्लूज़िव इंडिया की उदार अवधारणा के बरक्स भाजपा-संघ की संकुचित, नफरतकारी और हिंसक विचारधारा को खड़ा कर लोगों को बताया कि अंतर बिलकुल साफ है। भारत का रास्ता लोगों को जोड़ने की ओर जाता है और उनकी पार्टी उस ओर बढ़ती रहेगी।
कालांतर में उनके सावरकर पर हमले सतत बढ़ते गये जिसका भाजपा व संघ के पास कोई जवाब नहीं था। नवम्बर 2022 में जब उनकी यात्रा महाराष्ट्र के नासिक पहुंची तब भी उन्हें आभास था कि सावरकर को लेकर उनका दृष्टिकोण और कई तरह के बयान यहां के लोगों और विशेषकर तब तक उनकी अविभाजित सहयोगी पार्टियों- शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को नागवार गुजरेगा। राहुल ने इसकी चिंता नहीं की। तब भी नासिक की कोर्ट में उनके विरूद्ध सावरकर की अवमानना का एक मामला दर्ज हुआ था परन्तु शिकायतकर्ता ने इसी वर्ष की मार्च में अपनी अर्जी वापस ले ली।
मार्च 2023 में अपने लन्दन दौरे पर भी नेता प्रतिपक्ष ने सावरकर को नहीं बख्शा। नतीजतन, सत्यकी सावरकर ने राहुल के खिलाफ पुणे की कोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। राहुल ने सुनवाई के दौरान इस पर अपना बयान दर्ज करने की मांग की जिससे सत्यकी और सावरकर का कुनबा संकट में आ गया है। राहुल के वकील मिलिंद पवार ने अदालत में सत्यकी का क्रॉस एक्जामिनेशन किया जिसके दौरान उन्हें जो सच अपने मुंह से बताने या स्वीकारने पड़े हैं- उसने सावरकर की कथित वीरता का मुखौटा उतार दिया है और लोगों के सामने ऐसे तथ्य आ गये हैं जिन्हें नकारना भाजपा, संघ, उनके ट्रोलरों और पक्ष लेने वालों के लिये असम्भव है।
सोमवार को सत्यकी ने स्वीकार किया कि सावरकर ने एक-दो नहीं बल्कि 10 माफीनामे अंग्रेज सरकार को पेश किये और उनसे जेल से रिहा करने की गुजारिश की थी। उन्हें यह भी स्वीकारना पड़ा कि किसी भी अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने सजा माफ करने के पत्र नहीं लिखे थे। हालांकि सत्यकी का कहना था कि सजा कम कराने या रिहाई का निवेदन करने वाले पत्रों की यह सामान्य शिष्टाचार की भाषा थी जो उस वक्त हर किसी को लिखनी पड़ती थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भगत सिंह, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त आदि ने न माफी मांगी न समझौता किया था। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें 'वीर' एक लेखक द्वारा अपनी किताब में कहा गया था, न कि किसी सरकार ने उन्हें यह उपाधि दी थी।
मामले की अगली सुनवाई 1 जुलाई को होगी। उम्मीद है कि सावरकर की आभासी वीर गाथा के और भी अध्याय खुलेंगे।