भारत का अपमान करता अमेरिका और मौन मोदी
अमेरिका भारत के लिए किस कदर दुर्भावना रखता है, इसका ताजा उदाहरण ओमान की खाड़ी में तीन भारतीय नाविकों की मौत के तौर पर सामने आया है।;
अमेरिका भारत के लिए किस कदर दुर्भावना रखता है, इसका ताजा उदाहरण ओमान की खाड़ी में तीन भारतीय नाविकों की मौत के तौर पर सामने आया है। 9 जून को यहां व्यावसायिक जहाज सेटबेलो पर अमेरिकी नौसेना ने हमला किया था। हमले की पुष्टि खुद अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने की थी।
दरअसल ईरान को झुकाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पर अमेरिका ने अपनी नाकेबंदी की है और यहां से किसी भी जहाज को वह तभी गुजरने देगा, जब उसकी अनुमति हो। यह सीधे-सीधे दादागिरी है, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नैतिकता के खिलाफ है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप का शासन ऐसा ही है जो अपने अलावा किसी और के नियम नहीं मानता है। अपने इसी अहंकार भरे रवैये में अमेरिका ने सेटबेलो जहाज पर हमला किया और इसमें तीन भारतीयों की मौत हो गई, तो उसने इस पर अफसोस तक जाहिर नहीं किया।
जबकि ट्रंप बार-बार नरेन्द्र मोदी को अपना मित्र बताते हैं और मोदी भी उनसे अपनी नजदीकियां जाहिर करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन ट्रंप की यह दोस्ती भारत के लिए कितनी भारी पड़ रही है, इसके उदाहरण लगातार सामने आ रहे हैं। पहले अवैध अप्रवासी कहकर कई भारतीयों को बेड़ियों में जकड़कर भारत भेजा गया, मानो वे सब कुख्यात अपराधी हों। उसके बाद भारत पर टैरिफ लगाया, रूस से तेल खरीद बंद करवाई।
ट्रंप ने मोदी के लिए यहां तक कह दिया कि वे उनका राजनैतिक करियर बर्बाद कर सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर बीच में ही बंद करवाने का दावा भी ट्रंप ने कई बार इस तरह किया मानो मोदी सरकार कोई भी फैसला ट्रंप से पूछे बिना नहीं करती है। इतना अपमान काफी नहीं था, जो अब तीन भारतीयों की मौत पर जिस तरह भारत को ही अमेरिका ने उल्टी घुड़की दी है और यह देखकर घोर अफसोस होता है कि इस सबके बावजूद मोदी सरकार इतना साहस नहीं दिखा रही कि अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर को तलब करे और अपनी आपत्ति जाहिर करे। पाठकों को याद होगा कि 2013 में जब अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागढ़े पर कानूनी कार्रवाई की गई थी तो भारत की अस्मिता का सवाल उठाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने दिल्ली में अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा कम करने जैसे सख्त कदम उठाए थे। जिन्हें भाजपा ने बार-बार मौन मोहन कहकर मजाक उड़ाया उन्होंने दर्जनों बार भारत को मजबूत दिखाने वाले ऐसे फैसले लिए और अब अपनी ही ताकत का ढोल पीटने वाले नरेन्द्र मोदी जरूरत होने पर भी सख्ती नहीं दिखा पाते हैं।
तीन भारतीयों की मौत पर विपक्ष ने सवाल उठाए तो सरकार ने अफसोस तो जाहिर किया लेकिन इसमें अमेरिका के लिए आलोचना का कोई शब्द नहीं था, इसके बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने अमेरिकी समकक्ष मार्को रुबियो से इस घटना पर 'कड़ा विरोध' दर्ज कराया और कहा कि इस तरह का 'घातक हमला उचित नहीं' है। उचित न होने की बात से ही जाहिर होता है कि विदेश मंत्री जिस कड़ाई की बात कर रहे हैं, वो असल में कूटनीतिक चालाकी है। कड़ाई तो तब होती जब भारत सरकार अमेरिकी सरकार से कहती कि आपने हमारे नागरिकों की जान ली तो अब आपको भी अंजाम भुगतना पड़ेगा।
लेकिन मोदी सरकार केवल बतकही से काम चलाना चाहती है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एस जयशंकर और रुबियो के बीच बातचीत का जो ब्योरा जारी किया है, उसमें रुबियो ने कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अमेरिका की भाषा और भारत की भाषा देखकर ही समझा जा सकता है कि दोनों के रवैये में कितना फर्क है।
लेकिन इस फर्क की चिंता किए बिना मोदी फिर छह दिनों की विदेश यात्रा पर निकल गए हैं। फ्रांस में देशी-विदेशी कलाकारों द्वारा भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की प्रस्तुति का आनंद लेते और ताली बजाते मोदीजी के कई वीडियो सोशल मीडिया पर आए हैं। ऐसे वीडियो प्रसारित कर सरकार शायद यही चाहती है कि जनता इस बात पर गौरव का अनुभव करे कि भारतीय संस्कृति की महिमा दुनिया में गूंज रही है और प्रधानमंत्री मोदी इस का गवाह बन रहे हैं। वैसे जनता को अब सरकारी विज्ञप्तियों का इंतजार भी नहीं रहता। वह जानती है कि नरेन्द्र मोदी जब भी विदेश जाएंगे, तो बिना सहारे धड़ाधड़ विमान की सीढ़ियां चढ़ते उनके वीडियो आएंगे, फिर प्लेन के भीतर कुछ पेपर वगैरह पढ़ते हुए तस्वीरें आएंगी, ताकि पता चले कि प्रधानमंत्री तो काम करना खत्म ही नहीं करते।
विदेश में एयरपोर्ट से लेकर जिस भी सभागार में मोदी पहुंचेंगे, वहां भारतीय समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहेंगे और मोदी-मोदी के नारे लगाएंगे, विदेशी धरती पर अपने देवता समान नेता को देखकर लहालोट होंगे। फिर भारतीय परंपरानुसार तिलक लगाकर, आरती उतारकर मोदी का स्वागत होगा और फिर नृत्य-संगीत की मनमोहक प्रस्तुति। यही सब साल दर साल, महीने दर महीने होता आ रहा है।
बस यही समझ नहीं आता कि जब भारतीय संस्कृति को, यहां की धरती को प्रवासी भारतीय इतना ही याद करते हैं, तो विदेश जाकर बसे क्यों हैं और प्रधानमंत्री मोदी को भी कत्थक, भरतनाट्यम हो देखना हो, देश में ही देख लें। कम से कम जनता के टैक्स के करोड़ों रूपए बच जाएंगे। और अगर प्रधानमंत्री विदेश जाते ही हैं, जैसे अभी गए हुए हैं, तो कुछ ऐसे काम तो कर के आएं जिससे भारतीयों की इज्जत और रूतबा बढ़े। इस समय तो लगातार देश का अपमान ही अमेरिका कर रहा है, और मोदी चुपचाप इस अपमान को बर्दाश्त कर रहे हैं। जबकि विपक्ष ने उन्हें पहले भी कहा है कि आप विरोध करिए हम आपका साथ देंगे। न जाने किस डर से मोदी अमेरिका के खिलाफ कुछ बोलना ही नहीं चाहते हैं। वैसे मोदी अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की नसीहत को याद कर लें कि अमेरिका का दुश्मन होना ख़तरनाक है, लेकिन दोस्त होना जानलेवा है।