शर्मिंदगी का पर्यटन
बीते दिनों कुछ ऐसी खबरें देखने और सुनने मिली हैं, जिनसे पर्यटन पर नयी बहस शुरु होने की गुंजाइश बनी है। पर्यटन की भारत में प्राचीन परंपरा रही है।;
बीते दिनों कुछ ऐसी खबरें देखने और सुनने मिली हैं, जिनसे पर्यटन पर नयी बहस शुरु होने की गुंजाइश बनी है। पर्यटन की भारत में प्राचीन परंपरा रही है। साधु, संत, फकीर एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर जीवन के अनुभवों और नैतिकता के ज्ञान से लोगों को समृद्ध करते थे। उन्हें भोजन-पानी की तकलीफ न हो, इसका ख्याल समाज का संपन्न तबका कर लेता था। धार्मिक पर्यटन भी पुराने जमाने के लोग खूब किया करते थे और तमाम तकलीफें उठाकर अपने आराध्य के दर्शन के लिए जाते थे। इन साधुओं, फकीरों और श्रद्धालुओं के लिए आज भी देश में जगह-जगह धर्मशालाएं और सरायें बनी हुई हैं। लेखक-पत्रकार भी नयी खबर, नयी रचना की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते थे और उदार मन, खुले दिल-दिमाग के साथ समाज के नए पहलुओं से परिचित होते थे। नौकरी या कारोबार के सिलसिले में भी लोगों को देशाटन करना पड़ता था। वक्त के साथ पर्यटन को बाकायदा उद्योग में बदल दिया गया है। अब लोग केवल यह तय करते हैं कि उन्हें कहां घूमने जाना है, बाकी सारा इंतजाम पर्यटन क्षेत्र में काम कर रही कंपनियां कर देती हैं। होटल की बुकिंग से लेकर दर्शनीय स्थलों की सैर और खरीदारी तक सब जिम्मा कंपनी के लोगों का होता है। यात्रियों को केवल इन सुविधाओं का भुगतान करना होता है। इस सब में कोई बुराई नहीं है, बल्कि अच्छी बात है कि रोजगार का एक नया आयाम खुला है। लेकिन इतनी सुविधाओं के बावजूद विचारणीय पहलू यह है कि क्या पर्यटन का असली मकसद पूरा हो पा रहा है। अर्थात क्या हम नयी जगहों, नयी संस्कृतियों को देखने-समझने का नजरिया विकसित कर रहे हैं या फिर महज सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने के लिए घूम रहे हैं। तस्वीरें खिंचवाने में भी कोई समस्या नहीं है, क्योंकि आखिर को यह भी आपकी यादों की धरोहर ही बनेगी। लेकिन इसमें क्या हम यानी भारतीय ऐसी उच्छृंखलता का परिचय दे रहे हैं, जिससे दुनिया को हम पर उंगली उठाने का मौका मिल रहा है, यह भी सोचने की बात है।
दरअसल कुछ दिनों से एक वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है, जिसमें वियतनाम के एयरपोर्ट पर विमान के पास ही भारतीय पर्यटकों का एक समूह उत्साह से गरबा करता दिख रहा है। इस समूह में स्त्री-पुरुष-बच्चे सब हैं। पास में खड़े वियतनामी कर्मचारी और अन्य लोग हैरानी से इस समूह को देख रहे हैं। गरबा करने वाले समूह को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि ये लोग गुजरात से आए होंगे। कुछ समय पहले दुबई के प्रसिद्ध बुर्ज खलीफा में भी यात्री दल के गरबा करने का वीडियो सामने आया था। वियतनाम वाला वीडियो चर्चा में आने के बाद और भी ऐसे कई वीडियो सामने आए, जिसमें कहीं द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना के सामने गरबा हो रहा है, कहीं नियाग्रा जलप्रपात के सामने। ऐसे ही वियतनाम में सुप्रसिद्ध ट्रेन स्ट्रीट पर कुछ यात्रियों ने छैंय्या छंैय्या गीत पर नृत्य करते हुए वीडियो बनाया। बता दें कि यह ट्रेन स्ट्रीट इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहां घर और दुकानें ट्रेन की पटरी के एकदम करीब हैं और जब ट्रेन आती है, तो लोग वहां से हट जाते हैं। लेकिन इस जगह पर रहने वालों ने शायद ही कभी सोचा होगा कि अब ट्रेन स्ट्रीट का नाम इस तरह से भी चर्चा में आएगा। इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर डालने वाली युवती ने लिखा भी कि अगर ट्रेन स्ट्रीट आए और 'छैंय्यां-छैंय्यां' गाने पर डांस न किया तो क्या ही घूमना हुआ।
इस वाक्य से ही आज के संपन्न पर्यटकों की मानसिकता समझी जा सकती है, जिनके लिए विदेश घूमने में भी महत्वपूर्ण एक नए देश के आचार-विचार, रहन-सहन को देखना-समझना नहीं है, बल्कि वायरल हो सके, ऐसी रील बनाना है। गरबा हो या कोई और नृत्य, उनके लिए नृत्यशालाएं हैं, क्लब्स हैं या सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मंच उपलब्ध हैं। पर्व-त्यौहारों पर भी अपने उत्साह को प्रकट करने के लिए सड़क से लेकर मैदान तक नृत्य करने की छूट देश में मिली ही हुई है। फिर किसलिए हम विदेश जाकर भारतीय संस्कृति के नाम पर ऐसे नृत्य करते हैं, यह बात अब भारतीय पर्यटकों को सोचनी चाहिए। क्या इससे देश का नाम खराब नहीं होता है। प्रधानमंत्री मोदी अपने मन की बात कार्यक्रम में अक्सर उपदेशात्मक बातें लोगों से कहते हैं, तो क्यों न अगली बार वे पर्यटकों को समझदारी से घूमने की सलाह दें ताकि लोग भारतीयों पर सवाल न उठाएं। दरअसल भारतीय कारोबारी हर्ष गोयनका ने 2019 में स्विट्जरलैंड के एक होटल का नोटिस शेयर किया था, जिसमें 'भारत से आए प्रिय मेहमानों' को संबोधित करते हुए कहा गया था कि बुफे का खाना साथ न ले जाएं, दिए गए कटलरी का ही उपयोग करें और गलियारे तथा बालकनी में शोर न मचाएं। श्री गोयनका ने उस वक्त लिखा था कि, 'यह नोटिस पढ़कर मन में गुस्सा आया, अपमान हुआ और विरोध करने का मन किया। लेकिन फिर एहसास हुआ कि हम पर्यटक के रूप में शोरगुल करने वाले, असभ्य और सांस्कृतिक रूप से असंवेदनशील हैं। अभी वियतनाम वाले वीडियो के बाद फिर से इसी नोटिस को हर्ष गोयनका ने शेयर करते हुए ऐसी ही कुछ और घटनाओं की याद दिलाई है, जिनसे भारतीय पर्यटकों के व्यवहार पर शर्मिंदगी महसूस होती है।
विदेश के साथ-साथ देश में भी पर्यटन स्थलों का हाल यात्रियों के बेलगाम व्यवहार और सरकारों की अकर्मण्यता के कारण बुरा हो चुका है। बीते कई दिनों से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख आदि पहाड़ी राज्यों से खबरें आ रही हैं कि पहाड़ों पर कई-कई किलोमीटर का लंबा जाम लगा हुआ है।
कायदे से पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रियों को सीमित संख्या में आने की ही अनुमति होनी चाहिए। और नियमों का पालन बेहद कड़ाई से होना चाहिए ताकि प्राकृतिक व्यवस्था बनी रही। लोगों की बेतहाशा भीड़ से नाजुक पहाड़ी स्थलों पर कितना दबाव बढ़ चुका है, इसका पता तब चलता है जब केदारनाथ जैसे हादसे होते हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऑल वेदर रोड बनाने, पहाड़ों को काटकर होटल बनाने और एडवेंचर टूरिज्म के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ की जो छूट मिली है, वो हर हाल में बंद होनी चाहिए। पर्यटन उद्योग बेशक खूब बढ़े, पर इसमें ये न हो कि कुछ सालों में दर्शनीय स्थल कूड़े घर जैसे बन जाएं।