हाईकोर्ट का सराहनीय फैसला

लोकतंत्र और संविधान को खत्म करने के लिए मीडिया की स्वतंत्रता को कुचलने की कुटिल चालें लगातार सामने आ रही हैं।;

Update: 2026-06-11 21:30 GMT

लोकतंत्र और संविधान को खत्म करने के लिए मीडिया की स्वतंत्रता को कुचलने की कुटिल चालें लगातार सामने आ रही हैं। इसी क्रम में समाचार पोर्टल न्यूजक्लिक के संस्थापक और प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ पर आर्थिक अपराध शाखा और प्रवर्तन निदेशालय ने कार्रवाई की थी। जिस पर अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि यह कार्रवाई स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के खिलाफ शक्तियों का दुरुपयोग है। विडंबना यह है कि सत्ता में बैठे लोग और समूची भाजपा, जो लगातार दावा कर रही है कि नरेन्द्र मोदी के बारह वर्षों के शासन में देश मजबूत हुआ है, उसने इस मामले में दो शब्दों का अफसोस भी जाहिर नहीं किया। क्या देश की मजबूती में लोकतंत्र का मजबूत होना शामिल नहीं है। क्या ऐसे बेबुनियाद मामलों से न केवल ईमानदारी से काम करने वालों को परेशान किया जाता है, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता पर भी आंच आती है। क्या भाजपा को यह स्थिति स्वीकार्य है। अगर है, तो फिर उसे खुलकर अपने इरादे अब बता देने चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र के साथ लुका-छिपी का खतरनाक खेल पिछले 12 सालों से खेला ही जा रहा है।

गौरतलब है कि प्रबीर पुरकायस्थ पर आरोप था कि उनकी कंपनी पीपीके न्यूज क्लिक स्टूडियो प्राईवेट लिमिटेड ने वित्तीय वर्ष 2018-19 में अमेरिका की कंपनी वर्ल्डवाईड मीडिया होल्डिंग्स कंपनी से 9 करोड़ 59 लाख रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) हासिल किया। ईओडब्ल्यू में दर्ज एफआईआर में कहा गया था कि ये एफडीआई कानून का उल्लंघन कर हासिल की गई। अगस्त 2020 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की शिकायत पर दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया कि न्यूजक्लिक को एफडीआई नियमों से बचने के लिए शेयर के ज़्यादा मूल्यांकन वाले ट्रांज़ेक्शन के ज़रिए वर्ल्डवाईड मीडिया होल्डिंग्स (डब्ल्यूडब्ल्यूएमएच) कंपनी से एफडीआई के तौर पर 9.59 करोड़ रुपये मिले थे। इस मामले में प्रबीर पुरकायस्थ और अमित चक्रवर्ती को दिल्ली पुलिस ने 3 अक्टूबर 2023 को गिरफ्तार किया था। दोनों को न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। इस रिपोर्ट में आरोप लगाए गए थे कि न्यूजक्लिक ने चीनी दुष्प्रचार फैलाने के लिए एक अमेरिकी अरबपति से फ़ंडिंग ली है। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और प्रबीर पुरकायस्थ, अभिसार शर्मा, औनिंद्यो चक्रवर्ती, भाषा सिंह, व्यंग्यकार संजय राजौरा, इतिहासकार सोहेल हाशमी आदि पर छापेमारी की गई।

पुलिस ने छापेमारी के दौरान मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर समेत इलेक्ट्रॉनिक सामान भी ज़ब्त किया था। तब आईटी सेल ने इन तमाम पत्रकारों को चीन के लिए काम करने के नाम पर खूब ट्रोल किया था। पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज को दबाने के साथ-साथ उन्हें बदनाम करने के लिए कैसे हथकंडे इस्तेमाल होते हैं, यह उसी का एक उदाहरण था। इस गिरफ्तारी के छह महीने बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई, 2024 को प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए रिहा करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया था कि प्रबीर पुरकायस्थ की हिरासत लेते वक्त उनके वकील को हिरासत की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई। सुप्रीम कोर्ट ने तब यह भी कहा था कि प्रबीर पुरकायस्थ को गिरफ्तार करते वक्त गिरफ्तारी की लिखित वजह भी नहीं बताई गई।

अब यह पूरा मामला ही औंधें मुंह गिर गया है। दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने अपने फैसले में कहा कि, 'मौजूदा कार्यवाही न केवल दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के ख़िलाफ़ शक्तियों का मनमाना हमला और दुरुपयोग भी है।' हाईकोर्ट ने ईडी के दावे को 'पूरी तरह ग़लत और आधारहीन' माना। बार एंड बेंच के मुताबिक़, न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने अपने आदेश में कहा कि मामले में लगाए गए आरोपों के समर्थन में अपराध के आवश्यक तत्व नहीं पाए गए। वहीं एफ़आईआर को रद्द करते हुए कहा कि, इस एफ़आईआर को जारी रखना क़ानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है। चूंकि मूल आपराधिक मामला ही रद्द कर दिया गया, इसलिए हाई कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई भी समाप्त कर दी। अदालत ने कहा कि ईडी ने करीब डेढ़ साल तक व्यापक जांच की, लेकिन अब तक ऐसा कोई भी आपत्तिजनक तथ्य सामने नहीं आया जो मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 4 के तहत अपराध होने का संकेत भी देता हो। धोखाधड़ी के आरोप पर अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में किसी ऐसे व्यक्ति का होना ज़रूरी है जिसे संपत्ति से वंचित कर धोखा दिया गया हो। इस मामले में ऐसा कोई व्यक्ति सामने नहीं आया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, 'ईडी के जवाब से भी साफ़ है कि वह यह दावा करने की कोशिश कर रही है कि आईपीसी की धारा 120बी के तहत आपराधिक साज़िश का अपराध अब भी बनता है। हालांकि, यह नहीं बताया गया कि साज़िश का आधार क्या है। केवल यह तथ्य कि प्रबीर पुरकायस्थ और डब्ल्यूडब्ल्यूएमएच के प्रबंधक जेसन फेचर के बीच एक समझौता हुआ था, अपने आप में आपराधिक साज़िश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा, जब तक यह नहीं दिखाया जाता कि उसका गैरक़ानूनी उद्देश्य क्या था या कौन से गैरक़ानूनी तरीक़े अपनाए गए थे, तब तक उसे आपराधिक साज़िश नहीं कहा जा सकता।

अदालत ने कहा, साल 2018 में जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त हुआ था, तब डिजिटल मीडिया में 26 प्रतिशत निवेश सीमा लागू नहीं थी। पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि यह सीमा 2019 में लागू की गई है। इस तरह न्यूजक्लिक ने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया था। वहीं अदालत ने शेयरों के अधिक मूल्यांकन से जुड़े आरोपों को भी ख़ारिज कर दिया और कहा कि,'यह एक आर्थिक फै़सला है, जिससे किसी आपराधिक अपराध का संकेत नहीं मिलता।' आर्थिक अपराध शाखा की ओर से दर्ज एफ़आईआर को रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि 'इसे जारी रखना क़ानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग था।'

जिस तरह बिंदुवार तरीके से हाईकोर्ट ने ईडी और आर्थिक अपराध शाखा के बनाए केस को रद्द किया है, उसे जांच एजेंसियों को नसीहत की तरह लेना चाहिए, ताकि आईंदा किसी और पर ऐसे इल्जाम लगाने से पहले पूरी पड़ताल की जाए। लेकिन मौजूदा हालात में इसकी उम्मीद कम ही है। अभी कुछ समय पहले एनडीटीवी खड़ा करने वाले प्रणय रॉय और राधिका रॉय के खिलाफ भी मामला इसी तरह खारिज हुआ। लेकिन इस बीच एनडीटीवी बिक चुका था और मीडिया की एक स्वतंत्र आवाज सत्ता के गलियारों में गुम कर दी गई थी।

हाईकोर्ट के फैसले से थोड़ी राहत और प्रसन्नता तो जरूर है, लेकिन सवाल अब भी बाकी हैं कि क्या गलत मामले खड़े कर निर्दोषों के जीवन का महत्वपूर्ण वक्त बर्बाद करने और मीडिया की आजादी को कुचलने के दोषियों की शिनाख्त होगी, क्या उन्हें सजा होगी। ईडी को राजनैतिक बदला लेने के लिए जिस तरह लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है, क्या उस पर कभी रोक लग पाएगी।

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