इंडिया की बैठक से निकली नयी राह

विपक्षी दलों के गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया की बैठक सोमवार आठ जून को दिल्ली में आयोजित की गई,;

Update: 2026-06-08 21:30 GMT

विपक्षी दलों के गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया की बैठक सोमवार आठ जून को दिल्ली में आयोजित की गई, जिसमें 25 दलों ने हिस्सा लिया। यह बैठक ऐसे वक्त हुई है जब मोदी सरकार अपने सबसे कठिन समय से गुजर रही है और साथ ही राहुल गांधी से बुरी तरह डरी हुई है। राहुल गांधी लगातार जनहित के मुद्दे सरकार के सामने उठा रहे हैं। लोकतंत्र और संविधान के साथ-साथ देश की शिक्षा से लेकर पर्यावरण तक सब कुछ बचाने के लिए आवाज उठा रहे हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी न राहुल गांधी की चेतावनियों को सुन रहे हैं, न जनता के दर्द को। ऐसे में राहुल गांधी ने बीते दिनों यह कहकर तहलका मचा दिया कि मोदी सरकार एक साल के भीतर चली जाएगी। नेता प्रतिपक्ष ने बाकायदा कहा कि उन्हें सरकारी एजेंसियों और संस्थाओं में बैठे लोग ही अपनी परेशानियां और सरकार की गलतियां बता रहे हैं। राहुल गांधी के मुताबिक सारा सिस्टम नरेन्द्र मोदी की पकड़ से बाहर हो चुका है। वैसे भी राहुल गांधी मोदी सरकार और भाजपा के हमलों के बावजूद झुकते या दबते नहीं हैं, तो उन पर शाब्दिक हमले होते ही रहते हैं। इसलिए इंडिया की बैठक से पहले ही दिल्ली के कई गोलचक्करों पर पोस्टर लग गए जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ शरद पवार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और एम के स्टालिन के बयान लिखे गए थे। ऐसे पोस्टर किसने लगाए यह समझना कठिन नहीं है, क्योंकि राज्य और केंद्र दोनों में भाजपा की सरकार है, एनडीएमसी पर भी उसी का कब्जा है। तो भाजपा की सहमति के बिना राहुल विरोधी पोस्टर नहीं लग सकते। इन पोस्टर्स पर किसी का नाम नहीं लिखा है, लेकिन इनसे यह जरूर जाहिर हो गया कि राहुल गांधी और इंडिया की एकजुटता दोनों से भाजपा डरी हुई है।

गौरतलब है कि सोमवार की बैठक से पहले रविवार से ही देश भर के भाजपा नेताओं और मंत्रियों ने इंडिया गठबंधन के खिलाफ बयान देने शुरु कर दिए थे। बिहार में मंत्री संतोष सुमन ने कहा कि सारे दल जल्द ही एनडीए में आ जाएंगे, तो बिहार के ही दूसरे मंत्री दिलीप जायसवाल ने कहा कि 'इंडिया' गठबंधन में जब तक राहुल गांधी रहेंगे तब तक कभी सफल नहीं हो सकता है। इसलिए विपक्ष के नेताओं को सोचने का वक्त आ गया है कि राहुल गांधी के साथ रहना है या अपने नाव को बचाना है। वहीं बिहार भाजपा के अध्यक्ष संजय सरावगी ने इंडिया को स्वार्थ का गठबंधन कहा, तो उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दो साल पहले ही इंडिया को टूटा हुआ बता दिया और कहा कि लोग अब तीसरे विकल्प की तलाश में हैं। ऐसे ढेरों बयान भाजपा नेताओं के हैं, जो किसी भी तरह यह साबित करने पर तुले थे कि इंडिया का अस्तित्व है ही नहीं। लेकिन सोमवार को एक बैनर के तले जुटे 25 दलों ने यह बता दिया कि भाजपा को अब और ज्यादा डरने की जरूरत है। दरअसल सोमवार बैठक के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर पांच बिंदुओं का उल्लेख किया, जिस पर इंडिया काम करेगा, इनमें पहला मुद्दा है कि देश में वोट लूट को लेकर विपक्षी दल एक चि_ी देश के मुख्य न्यायाधीश को लिखेंगे, दूसरा मुद्दा शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग है, क्योंकि उनके कार्यकाल में नीट-सीबीएसई परीक्षा को लेकर छात्रों के साथ विश्वासघात हुआ है। तीसरा मुद्दा केंद्र सरकार एक सर्वदलीय बैठक बुलाए और अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी समेत किसानों के मुद्दे पर चर्चा करे। चौथा मुद्दा है कि इंडिया के दल हर दो महीने में मिलेंगे और इंडिया गठबंधन की अगली बैठक अगस्त में हैदराबाद में होगी और 5वां मुद्दा यह तय हुआ कि संसद में सभी दलों के बीच समन्वय जारी रहेगा, आगामी मानसून सत्र के दौरान हर दिन सुबह नेता प्रतिपक्ष के दफ्तर में बैठक होगी। सभी दल इन बिंदुओं पर सहमत हुए हैं।

सोमवार की बैठक और इसमें आगे बढ़ने की रणनीति दोनों के जरिए 25 विपक्षी नेताओं ने यह बता दिया है कि देश को विपक्षमुक्त बनाने का भाजपा का सपना पूरा नहीं होने वाला, न ही विपक्ष पिछली बार की तरह बिखरा और कमजोर है। इंडिया गठबंधन की बैठक में डीएमके क्यों नहीं शामिल हुआ, आम आदमी पार्टी ने क्यों किनारा किया, यही सवाल भाजपा समर्थित मीडिया सोमवार को दिन भर उठाता रहा, क्योंकि उसे भी यह दिख रहा था कि विधानसभा चुनावों में आपस में ही लड़ने या कई मुद्दों पर असहमति रखने वाले दल भी एक मंच पर भाजपा के खिलाफ आ रहे हैं। यही भाजपा का सबसे बड़ा डर है। दरअसल अब देश का माहौल बदल रहा है और नरेन्द्र मोदी के गलत फैसलों का खामियाजा भुगतती जनता भी अब आवाज उठाने लगी है। 2016 में नोटबंदी के वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता संभाले दो साल ही हुए थे, इसलिए जनता ने उन पर भरोसा भी किया और नोटबंदी की गड़बड़ी के बावजूद हालात सुधारने के लिए वक्त दिया। फिर 2020 में लगे लॉकडाउन की ज्यादती भी जनता ने सह ली, क्योंकि कोरोना महामारी की चपेट में पूरी दुनिया आई हुई थी। लेकिन इस समय सरकार के फैसलों से जो हाहाकार मचा है, उसका कोई तार्किक कारण नरेन्द्र मोदी नहीं दे पा रहे हैं। उनके बारह सालों के शासन के बावजूद देश से न महंगाई गई, न बेरोजगारी खत्म हुई। बल्कि अब तो रोजाना तेल और गैस के दाम बढ़ाए जा रहे हैं। सरकार इसके लिए मध्यपूर्व में छिड़ी जंग को बहाने की तरह पेश कर रही है। नरेन्द्र मोदी जनता से किफायत बरतने की अपील कर रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी और सरकार की फिजूलखर्ची में कहीं कोई कमी नहीं आ रही है। साफ है कि जनता के सामने मोदी सरकार का देश को बेहतर बनाने का दावा खोखला साबित हो चुका है।

ऐसे में इंडिया गठबंधन की बैठक से भाजपा को डर लग रहा है। ध्यान रहे कि इससे पहले इस गठबंधन की आखिरी बैठक 1 जून 2024 को हुई थी, यानी करीब दो साल के अंतराल पर औपचारिक बैठक में सारे विपक्षी दल एक बैनर तले मिले। हालांकि संसद में इंडिया ने अपना दम बार-बार मोदी सरकार को दिखाया है। दो महीने पहले 17 अप्रैल को ही परिसीमन विधेयक को विपक्ष ने अपनी एकजुटता से पारित नहीं होने दिया और भाजपा के बहुमत वाले गुरुर को बड़ा झटका दिया था। इससे पहले भी कई बार संसद सदनों के भीतर और बाहर विपक्ष ने अनेक मुद्दों पर एकजुटता के साथ सरकार का विरोध किया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि आठ जून की बैठक से क्या देश की सियासत में कोई उल्लेखनीय बदलाव नजर आता है।

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