उत्तरप्रदेश की राह पर बंगाल

प.बंगाल में भाजपा शासन के आते ही राज्य में चारित्रिक बदलाव दिखाई देना शुरु हो चुका है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-08 21:40 GMT

प.बंगाल में भाजपा शासन के आते ही राज्य में चारित्रिक बदलाव दिखाई देना शुरु हो चुका है। भाजपा शासन की खास पहचान बन चुके बुलडोजर और पुलिस मुठभेड़ दोनों का इस्तेमाल प.बंगाल में शुरु हो चुका है। सुवेन्दु अधिकारी के सत्ता संभालते ही तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कानूनी कार्रवाई शुरु हो गई, कई मौकों पर जनता ने कानून हाथ में लिया और टीएमसी नेताओं पर अंडे फेंके। भाजपा ने इसे लोगों का गुस्सा बताकर न्यायोचित ठहराने की कोशिश की। कई बाजारों में रेहड़ी-पटरी वालों को जबरन हटाया गया और कुछ जगह बुलडोजर से व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को गिराया गया। और अब बारुईपुर मामले में एक अहम आरोपी की मुठभेड़ में मौत हो गई, जिससे प.बंगाल को भाजपाई रंग में ढलने में जो कसर बाकी थी, वह भी पूरी हो गई।

गौरतलब है कि बीते दिनों कोलकाता के दक्षिणी उपनगर स्थित बारुईपुर थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की की बलात्कार के बाद नृशंसता से हत्या कर दी गई। ऐसी एक भी घटना किसी भी सभ्य समाज के लिए बड़ा कलंक होनी चाहिए। जो समाज अपने बच्चों की, महिलाओं की हिफाज़त न कर सके, उसे शर्मिंदा होना चाहिए। मगर बड़े अफसोस की बात है कि बलात्कार जैसा गंभीर अपराध अब राजनीति करने का जरिया बन चुका है। जब प.बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के वक्त आर जी कर मेडिकल कॉलेज में बलात्कार और हत्या का मामला आया था, तब भाजपा ने बिना समय गंवाएं टीएमसी सरकार को घेरा, राज्य में धरना-प्रदर्शन सब किया। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भी कार्रवाई की, आरोपियों को पकड़वाया, फिर भी उन पर ऊंगली उठाई गई कि वे बहन-बेटियों की सुरक्षा नहीं कर सकतीं। इस चुनाव में भी भाजपा ने इस मुद्दे को भुनाना चाहा और इसके लिए आर जी कर मेडिकल कॉलेज की दिवंगत पीड़िता की मां को टिकट दी, वे जीतीं और अब विधायक भी बन गई हैं। लेकिन अफसोस है कि वे भी अब पीड़ित परिवार के साथ खुलकर खड़े होने और ऐसे नृशंस अपराध पर आवाज उठाने की जगह खोखले तर्क दे रही हैं कि मेरी बेटी के साथ अस्पताल जैसी सुरक्षित जगह पर ऐसा हुआ, जबकि वो बच्ची बाहर थी या कहां थी, पता नहीं। इस बयान के बाद सभ्य समाज को अपने आप से यह सवाल करना चाहिए कि क्या बच्चे केवल अपने घर में सुरक्षित रह सकते हैं, बाहर नहीं। अगर ऐसा है तो हम किस अधिकार से खुद को सभ्य कहते हैं। और कई मामलों में घर में करीबी रिश्तेदार ही जो शारीरिक शोषण करते हैं, उस वक्त बच्चों के लिए कौन सा सुरक्षित स्थान बताया जाएगा। जाहिर है भाजपा विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ या नयी सरकार की कानून व्यवस्था के खिलाफ खुल कर बोलने की स्थिति में नहीं हैं, तो उन्होंने सारा ठीकरा पिछली टीएमसी सरकार पर फोड़ दिया। हालांकि इसकी कोई तुक बनती नहीं। अगर ममता बनर्जी की सरकार लड़कियों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने में नाकाम थी, तो जनता ने उन्हें सत्ता से हटा दिया है। अब जिनकी सत्ता है, यानी भाजपा की, तो उसे हर तरह से जिम्मेदारी लेना होगा। लेकिन इसकी जगह सुवेन्दु अधिकारी कहीं ममता बनर्जी को पीड़ित परिवार से मिलने से रोक रहे थे, तो कहीं उनके नेता इस घिनौने अपराध में भी हिंदू-मुसलमान कर रहे थे।

इस घटना से नाराज भीड़ ने तो एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या भी कर दी, हालांकि अब भीड़ में शामिल कम से कम 200 लोगों पर कार्रवाई होगी, ऐसी बात प्रशासन कर रहा है। लेकिन एक अन्य आरोपी, जो इस घटना की अहम कड़ी बन सकता था, उसका रहस्यमय तरीके से एनकाउंटर कर दिया गया।

जिस तरह उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश या गुजरात में हुई कई पुलिस मुठभेड़ों में यही कहानी बताई गई कि आरोपी ने पुलिस गिरफ्त से भागने की कोशिश की और उन पर हमला किया, बदले में पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई, जिसमें आरोपी मारा गया। ठीक यही कहानी बारुईपुर मामले के मुख्य आरोपी प्रभास मंडल के एनकाउंटर के पीछे बताई जा रही है। हालांकि इस घटना में शुरुआत से पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। प्रारंभिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, नाबालिग की मौत डूबने से हुई थी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि पुलिस ने शुरुआती शिकायत पर गंभीरता से कार्रवाई की होती तो लड़की की जान बचाई जा सकती थी। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक एक स्थानीय निवासी ने बताया कि 'रात करीब साढ़े आठ बजे हमने पुलिस को सूचना दी थी, लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। रविवार सुबह स्थानीय लोगों से जानकारी मिलने के बाद हमने इलाके के सीसीटीवी फुटेज खंगाले और खुद अभियुक्त की पहचान कर उसे पकड़ लिया। अभियुक्त ने थाने में अपना अपराध कबूल किया था। हम उसके साथ घटनास्थल पर गए और शव बरामद कराया। इसके बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस बीच भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता शांतनु मंडल ने अभियुक्त को भागने में मदद की।' लेकिन शांतनु मंडल ने अपने ऊपर लगे इन आरोपों से इनकार किया है।

इस मुठभेड़ और आरोपी के मारे जाने के बाद टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने भी दावा किया कि प्रभास मंडल भाजपा का कार्यकर्ता था। उसे भाजपा के अंदरूनी मामलों की काफी जानकारी दी। इसलिए उसका एनकाउंटर कर दिया गया। उन्होंने सवाल किया, 'पुलिस हिरासत में कैसे एनकाउंटर हो गया? पुलिस ने तो उसे पकड़ा हुआ होगा न' जिस तरह से यूपी में सब कुछ छिपाया जा रहा है या मार दिया जा रहा है।'

ठीक ऐसी ही बातें टीएमसी सांसद महुआ मोईत्रा ने कही हैं, उन्होंने इसे यूपी 2.0 बताया है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 9 साल के कार्यकाल में राज्य में 17,043 पुलिस मुठभेड़ की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 289 अपराधियों की मौत हुई है। ऐसी मुठभेड़ों पर कई बार मानवाधिकार कार्यकर्ता और कानूनविद सवाल उठा चुके हैं। पुलिस का काम अपराधी को पकड़ना है, उसे सजा देने का अधिकार न्यायालय का है। लेकिन मुठभेड़ों के सिलसिले रुक ही नहीं रहे हैं। मुठभेड़ों को मैडल की तरह देखने का रवैया बदलना होगा, क्योंकि फिर न्यायप्रक्रिया से भरोसा उठ जाएगा। 

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