जिम्मेदारी न लेने का घातक रोग
भाजपा की केंद्र से लेकर राज्य सरकारों में जिम्मेदारी न लेने का एक घातक रोग बढ़ता जा रहा है, जिसमें बार-बार देश और जनता का नुकसान हो रहा है।;
भाजपा की केंद्र से लेकर राज्य सरकारों में जिम्मेदारी न लेने का एक घातक रोग बढ़ता जा रहा है, जिसमें बार-बार देश और जनता का नुकसान हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 12 सालों के शासन में कई ऐसी बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें जनता के सामने प्राणों के संकट पड़ गए, लेकिन उन्होंने कभी जनता को यह आश्वासन नहीं दिया कि मैं जब तक सत्ता में हूं आप पर कोई मुसीबत नहीं आने दूंगा। उल्टा वे देशभक्ति के नाम पर जनता से ही त्याग और बलिदान की अपेक्षा करते रहे।
नोटबंदी, लॉकडाउन, चीन की घुसपैठ, पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमले, मणिपुर में जनजातीय संघर्ष, बारिश, सूखा आदि की आपदाएं, पेपर लीक न जाने कितने मामलों में जनता को जान-माल हर तरह का नुकसान हुआ। अभी राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के कारण भावनात्मक तौर पर भी जनता बुरी तरह आहत है। लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी इन मामलों में आगे बढ़कर जिम्मेदारी नहीं ली या किसी गलत फैसले के लिए माफी नहीं मांगी, इस्तीफा देना तो दूर की बात है। वहीं आम जनता में से कोई जब किसी मामले पर सरकार की आलोचना करे तो उसे कैसे कानूनी शिकंजे में जकड़ा जाता है, इसकी बड़ी मिसाल उमर खालिद की गिरफ्तारी है। विपक्ष सरकार की आलोचना करे, तो नरेन्द्र मोदी उसे व्यक्तिगत निंदा मानकर कहते हैं कि गालियां उनके लिए टॉनिक का काम करती हैं। अब नरेन्द्र मोदी की राह पर ही देवेन्द्र फड़नवीस चल पड़े हैं।
महाराष्ट्र में थोड़े दिनों की बारिश से हाहाकार मच चुका है। कई लोगों की जान चली गई है। 7,000 करोड़ रुपए की लागत वाले और हाल ही में शुरू किए मुंबई-पुणे च्मिसिंग लिंकज् एक्सप्रेसवे पर जो भूस्खलन हुआ और करीब 18 घंटे यातायात बंद रहा, तो विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए। साथ ही सोशल मीडिया पर भी सरकार की खिंचाई हुई। यह मुद्दा विधानसभा में भी उठा। विधानसभा में शहरों के विकास पर नियम 293 के तहत जब बहस हो रही थी तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष पर कड़ा हमला करते हुए इस परियोजना को इंजीनियरिंग का एक शानदार वैश्विक नमूना करार दिया।
उन्होंने कहा कि देवेंद्र फडणवीस को बुरा-भला कहना ठीक है। मुझे इसकी आदत है। मुझ पर इन बातों का कोई असर नहीं होता। मैंने जिंदगी में एक बात सीखी है, आज से 10 साल बाद, जो लोग आज बुरा-भला कह रहे हैं, वे शायद दिखाई न दें, लेकिन च्कनेक्टिंग लिंकज् कायम रहेगा, और उस पर देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के नाम होंगे। आप मुझे जितना चाहें बदनाम करें, लेकिन अगर आप महाराष्ट्र को बदनाम करेंगे, तो मैं किसी को नहीं बख्शूंगा। इसके बाद अपनी भाषा का स्तर प्रचलित भाजपाई राजनीति के अनुरूप गिराते हुए फड़नवीस ने कहा कि जिनको कुत्ता भी नहीं पूछा, वो आजकल सोशल मीडिया पर आकर सबको गाली देते हैं, मुख्यमंत्री को भी गाली देते हैं। ऐसे भाड़े के टट्टे इस मिसिंग लिंक के बारे में भी पैसा ले-लेकर सोशल मीडिया पर लिख रहे थे, ऐसे लोगों को कह देना चाहता हूं कि अगर महाराष्ट्र का अपमान करोगे तो छोड़ूंगा नहीं।
देवेन्द्र फड़नवीस ने सदन की गरिमा को हाशिए पर धकलते हुए कुत्ते जैसे असंसदीय शब्द का इस्तेमाल किया और इस पर जिस तरह सदन में सत्ता पक्ष के लोगों ने उनका समर्थन किया, उससे जाहिर होता है कि सरकार को लोकतांत्रिक शालीनता और मर्यादा की कोई परवाह नहीं है। सोशल मीडिया पर पैसे लेकर ट्रोलिंग का काम भाजपा के शासन में ही खूब बढ़ा है और इसके पीछे किन लोगों का समर्थन रहा है, यह जनता जानती है। वैसे अगर संरचनात्मक गड़बड़ियों पर सरकार से ही जवाब मांगा जाएगा, इस पर भाजपा सरकार के लोग चिढ़ते क्यों हैं, यह समझ से परे है।
हाल ही में एक वाकया उत्तरप्रदेश से सामने आया है, जब पत्रकार ने मंत्री दिनेश प्रताप सिंह से सवाल किया कि मुख्यमंत्री के उद्घाटन से पहले ही लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे कई जगह से धंस गया है। तो दिनेश प्रताप सिंह ने जवाब दिया कि इसमें कौन सी नयी बात है, आप सड़क ख़ुद बनवा लो। उन्होंने सड़कों की टूट-फूट और मरम्मत को प्रक्रिया का हिस्सा बताया। बेशक सड़कें टूटती हैं, उनमें गड्ढे बनते हैं, लेकिन जब वे कई बरसों तक इस्तेमाल हो जाएं तब उनकी मरम्मत की नौबत आनी चाहिए। अगर उद्घाटन से पहले या शुरु होने के चंद दिनों में सड़कें, पुल या कोई भी इमारत टूटे तो जाहिर है कि उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। इस समय अकेले महाराष्ट्र या उत्तरप्रदेश से नहीं, बल्कि गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली कई राज्यों में कहीं सड़कें टूटीं, कहीं एयरपोर्ट पानी-पानी हुआ, कहीं स्टेशन पर पंखे से पानी गिरने लगा। ऐसी तस्वीरें देखकर समझा जा सकता है कि विकास के नाम पर जनता के दिए टैक्स से जो भारी-भरकम परियोजनाएं बन रही हैं, उनकी लागत का बड़ा हिस्सा भाजपा नेताओं, अधिकारियों या ठेकेदारों की जेब में जा रहा है। दिक्कत यह है कि भारतीय जनता ने इस भ्रष्टाचार को अब सामान्य आचरण मानकर स्वीकार कर लिया है। फिर भी कभी सवाल उठाए जाते हैं तो ऐसे ही जवाब मिलते हैं कि खुद बनवा लो या जिनको कुत्ता नहीं पूछता वो सवाल पूछ रहे हैं।
सरकार की आलोचना को व्यक्तिगत आलोचना माना जाने लगा है या फिर देश विरोधी काम। जबकि हाल ही में महाराष्ट्र में ही जस्टिस माधव जामदार ने सरकार विरोधी नारे लगाने पर एक व्यक्ति को तड़ीपार करने के आदेश पर पुलिस को फटकार लगाई और साफ कहा कि किसी नेता के खिलाफ नारे लगाना देशविरोधी काम नहीं है। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा ही फैसला सुनाया था कि सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं है।
हम नहीं जानते कि देवेन्द्र फड़नवीस ने इस फैसले को सुना या नहीं, मगर यह तय है कि वे पूरी तरह नरेन्द्र मोदी के नक्शेकदमों पर चल रहे हैं। देवेन्द्र फड़नवीस का मानना है कि आज से दस साल बाद भी परियोजनाओं पर उनका नाम रहेगा, यह बिल्कुल सही बात है क्योंकि आज से 60-70 साल पहले जो काम कांग्रेस की सरकारों में हुआ है, उनका नाम अब भी बना ही हुआ है। भले आज भाजपा कांग्रेस सरकारों के काम को नकार दे। असल बात तो यह है कि सरकार किसी भी दल की हो, जनता उसे काम करने के लिए सत्ता सौंपती है इसलिए काम किया जाए तो उसका एहसान नहीं जताया जा सकता।