मंदिर में चोरी और नेहरू जी
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला अब केंद्र और उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल बनता जा रहा है।;
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला अब केंद्र और उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल बनता जा रहा है। विपक्ष तो इस मुद्दे पर लगातार सवाल उठा ही रहा है, अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इस मामले पर अपनी चिंता सार्वजनिक तौर पर व्यक्त की है। संघ की वार्षिक 'अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक' हाल ही में कर्नाटक के बेलगावी में खत्म हुई। बैठक में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की गिनती में हुई गड़बड़ी की घटना पर दुख जताया गया। उत्तरप्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस मामले में एक एसआईटी गठित कर जांच शुरु की है, जिस पर संघ ने भरोसा जताया कि एसआईटी और पुलिस की कार्रवाई किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगी। संघ ने कहा कि 'तीर्थ क्षेत्र न्यास' पक्का करे कि भविष्य में ऐसी कोई घटना न हो जिससे राम मंदिर के प्रति सभी राम भक्तों की श्रद्धा और गहरी आस्था को ठेस पहुंचे।' वैसे उत्तर प्रदेश सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि इस मामले में किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा और जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ बेहद सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन बड़ा सवाल तो यही बना हुआ है कि जिस न्यास का गठन भाजपा सरकार की देखरेख और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जानकारी में हुआ, वहां करोड़ों की चोरी करने की किसी की भी हिम्मत कैसे हुई। दो ही स्थितियों में ऐसा मुमकिन है, या तो प्रधानमंत्री ने राम मंदिर का राजनैतिक उपयोग करने के बाद वहां के संचालन पर ध्यान नहीं दिया या फिर उन्हें सब कुछ पता होते हुए भी उन्होंने इस तरफ अनदेखी की। सच्चाई क्या है यह तो खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बताएंगे।
लेकिन कम से कम इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इस पूरे प्रकरण पर नरेन्द्र मोदी ने कुछ नहीं कहा है। राम मंदिर के लिए आडवानी द्वारा निकाली गई रथयात्रा से लेकर बाबरी मस्जिद तोड़कर उसी जगह पर मंदिर के लिए भूमिपूजन करने, फिर मंदिर का उद्घाटन, प्राण प्रतिष्ठा करने तक नरेन्द्र मोदी का चेहरा ही आगे रहा। रथयात्रा में उन्होंने संघ और भाजपा के कार्यकर्ता होने के नाते समन्वयक के तौर पर काम किया था, लेकिन जब उस बीज की फसल लहलहाई तो सबसे ज्यादा लाभ नरेन्द्र मोदी के खाते में ही आया। हर चुनाव में उन्होंने यह दावा किया कि जहां वादा किया था, वहीं मंदिर बनवाया। तो अब हिंदुओं की आस्था पर इतनी बड़ी चोट की गई है, तो क्या नरेन्द्र मोदी को दर्द नहीं हो रहा है, यह सवाल तो उठेगा ही। जब संघ के लोग अफसोस जाहिर कर सकते हैं, जब नरेन्द्र मोदी के पूर्व प्रधान सचिव और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टी रहे नृपेंद्र मिश्रा इस सार्वजनिक चोरी पर दुख जता चुके हैं, तो नरेन्द्र मोदी को बोलने से कौन रोक रहा है।
ध्यान रहे कि 2024 में प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि 'राम राष्ट्र हैं और देव देश हैं।' हालांकि यह विचार संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ था, फिर भी अगर मोदी को अपने कहे पर यकीन था तो अब अपने राष्ट्र और देश पर चोरों की कुदृष्टि देखकर भी वे शांत कैसे हैं। नरेन्द्र मोदी के समर्थकों ने हाल ही में उनकी सत्ता के 12 साल पूरे होने पर इस बात की खुशी मनाई कि मोदी ने प.नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। हालांकि उसमें तथ्यात्मक गलती है, फिर भी उनकी खुशफहमी उन्हें मुबारक। जहां तक नेहरूजी से तुलना की बात है तो मंदिर चोरी का ऐसा ही प्रकरण राजस्थान में श्रीनाथद्वारा में भी हुआ था।
13 नवंबर 1958 को मंगालदास पकवासा ने 18वीं सदी के श्रीनाथजी मंदिर से सोना, चांदी और भारी मात्रा में नकदी उसके संरक्षक महाराज द्वारा गुप्त रूप से ले जाए जाने की सूचना तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को दी। तब नेहरू ने इसे 'लूट' बताते हुए राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया और केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत को पत्र लिखकर इस मामले में सख्त कदम उठाने को कहा था। अपने पत्र में नेहरू ने कहा कि महाराज द्वारा मंदिर की संपत्ति को चुपचाप ले जाना सार्वजनिक धन का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि यह गबन इसलिए संभव हो सका क्योंकि मामले को संभालने में ढिलाई बरती गई। उन्होंने खेद जताया कि राजस्थान सरकार द्वारा मुख्य न्यायाधीश वांचू की अध्यक्षता में गठित जांच समिति महाराज की आपत्तियों के कारण कभी काम ही नहीं कर सकी। उस समय नेहरू ने एक अहम सवाल उठाया था कि नाथद्वारा मंदिर की आय का उपयोग आखिर किस अच्छे उद्देश्य के लिए हो रहा है?' उन्होंने कहा था कि मेरे अनुमान से मुख्यत: राजनीतिक उद्देश्यों के लिए। इसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता और आपको तत्काल कदम उठाने चाहिए।'
उन्होंने यह भी लिखा था कि जिस व्यक्ति पर लूट और धन के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे हों, उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए? और उसे उस पद पर बने रहने की अनुमति क्यों दी जाए जहां वह और अधिक धन का दुरुपयोग कर सकता है? मेरा मानना है कि तत्काल कार्रवाई आवश्यक है। राजस्थान सरकार का इस मामले में नरम रुख अपनाना उचित नहीं है।'
क्या प्रधानमंत्री मोदी ऐसा ही कोई पत्र मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को नहीं लिख सकते थे। जिस तरह नेहरूजी ने मंदिर के धन के राजनैतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग की बात की, वह भी भाजपा के लिए फंसने वाली हो सकती है। क्योंकि नेहरूजी तो निश्चित ही मंदिर के धन या मंदिर के नाम पर वोट नहीं मांगते थे, मगर नरेन्द्र मोदी और भाजपा के तमाम नेताओं ने मंदिर के नाम पर खूब वोट मांगे हैं। तो क्या अब मोदी समेत सभी नेताओं की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वे श्रद्धालुओं के साथ हुई धोखाधड़ी पर कम से कम उनके साथ खड़े तो दिखाई दें। हिंदुओं को जगाने से पहले तो भाजपा को इस मामले में खुद जागना चाहिए।
वैसे गनीमत यह है कि इस मामले पर कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुईं, जिन पर सोमवार को सुनवाई हुई और अगली सुनवाई 20 जुलाई यानी अगले सोमवार को है। इस बीच एसआईटी को स्टेटस रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। जिस सुप्रीम कोर्ट से बाबरी मस्जिद की जगह पर ही राम मंदिर बनाने की अनुमति हिंदू पक्ष को दी गई थी, इस बार वह किस तरह इंसाफ करता है, देखना होगा।