पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है
अखिलेश यादव ने एक लंबी-चौड़ी पोस्ट लिखकर उनसे अनशन खत्म करने की अपील की है।;
देश की खराब कर दी गई शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को सुधारने और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन लगातार 25 दिनों से जारी है। इस आंदोलन में शामिल सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर पिछले 17 दिनों से अनशन पर हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दिपके का कहना है कि सोनम सर खुद से न बैठ पा रहे हैं, न खड़े हो रहे हैं। जाहिर है उनकी बिगड़ती सेहत ने न केवल उनके समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि अब कई जानी-मानी हस्तियां भी सोनम वांगचुक के लिए फिक्रमंद हो रही है।
अखिलेश यादव ने एक लंबी-चौड़ी पोस्ट लिखकर उनसे अनशन खत्म करने की अपील की है। अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे, रोहित पवार, फारुख अब्दुल्ला, आतिशी, सांसद महुआ मोईत्रा, संजय सिंह, जॉन ब्रिटास, किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी समेत हज़ारों लोगों ने उन्हें खुलकर समर्थन दिया है और उनसे अनशन समाप्त करने की लगातार अपीलें हो रही हैं। लेकिन 59 वर्षीय वांगचुक अपने फ़ैसले पर अडिग हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने जो शुरू किया है, उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना होगा। सोनम वांगचुक ने संदेश दिया है कि 'मैं बाहर से कमज़ोर हूं, लेकिन अंदर से मजबूत हूं।' खुद को महात्मा गांधी का अनुयायी बताते हुए वांगचुक कहते हैं कि वे गांधी के अहिंसक आंदोलन के सिद्धांतों में विश्वास करते हैं और उसी तरह भूख हड़ताल के ज़रिए सरकार की अंतरात्मा को जगाना चाहते हैं।
बेशक गांधीजी के सिद्धांतों की कोई काट ही नहीं है, लेकिन अंतरात्मा तो उसी की जगाई जा सकती है, जिसके भीतर यह विद्यमान हो। मौजूदा मोदी सरकार का निष्ठुर रवैया देखकर तो यह कतई उम्मीद नहीं दिखती कि उसे किसी की भी तकलीफ से कोई फर्क पड़ता है। नीट पेपर लीक होने और उसके बाद दोबारा परीक्षा करवाए जाने के मानसिक तनाव में कितने होनहार युवाओं ने अपनी जिंदगी ले ली, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने संवेदना का एक शब्द नहीं कहा। वहीं शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस मुद्दे पर कोटा में राहुल गांधी द्वारा आयोजित छात्रों की गूंज रैली के लिए कहा था कि उसमें दहशतगर्दों को तैयार किया जा रहा है, इसके साथ ही उन्होंने सीजेपी और उसके समर्थकों को 'विघटनकारी तत्वों की बी-टीम' बताते हुए कहा था कि उन्हें देश की तरक्की पर भरोसा नहीं है। जिन नेताओं को विरोध की आवाज पसंद नहीं और आंदोलन के लोकतांत्रिक हक को जो लोग देशविरोधी गतिविधि समझते हैं, ऐसे सत्ताधारी क्या खाक अंतरात्मा जैसे शब्दों के मायने समझेंगे।
अभिजित दिपके ने कहा कि समझ नहीं आता कि सरकार देश के नागरिकों की बात को इतनी आसानी से क्यों ख़ारिज कर रही है। हम सिर्फ जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। हमारी केवल इतनी मांग है कि जो शिक्षा मंत्री परीक्षाएं ठीक से नहीं करा सका, उनकी जिम्मेदारी तय की जाए। बेशक अभिजित दिपके ने मुख्य न्यायाधीश द्वारा युवाओं के लिए कहे गए कॉकरोच शब्द से आहत होकर कॉकरोच जनता पार्टी बना ली और इस मुहिम को सोशल मीडिया पर समर्थन भी खूब मिला। लेकिन जब वे जमीन पर आंदोलन करने उतरे हैं तो उन्हें अपनी राजनैतिक परिपक्वता भी दिखानी होगी और मुक्तिबोध के शब्दों को उधार लेकर कहें तो पार्टनर अपनी पॉलिटिक्स भी बतानी होगी। अभिजित दिपके को यह समझना चाहिए कि मौजूदा सरकार के तौरतरीके पिछली तमाम सरकारों से बिल्कुल अलग हैं। लोकतंत्र का चोगा तो नजर आता है, लेकिन भीतर धड़कनें अधिनायकवाद की हैं।
देश में पहले भी कई आंदोलन हुए हैं, जिनमें जमकर सरकार की धज्जियां उड़ाई गई हैं। सबसे बड़ी मिसाल तो 2011 का अन्ना आंदोलन ही है, जिसकी वजह से यूपीए सरकार की विदाई हुई। तब 11 दिन अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे और इस बीच सरकार विरोधी सारी मुहिम के बावजूद मंत्री, नेता, पदाधिकारी लगातार अन्ना हजारे और उनकी टीम से मिलते रहे। लोकपाल विधेयक कैसा होना चाहिए इसका मसौदा तैयार करने में उनसे बाकायदा चर्चा की गई। दिन-रात डा.मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और गांधी परिवार को कोसा गया तो भी ऐसा नहीं हुआ कि आंदोलनकारियों को सरकार ने मरने के लिए छोड़ दिया। उस समय का मीडिया भी गुलाम नहीं था, लिहाजा उसने सातों दिन चौबीसों घंटे इस आंदोलन का प्रसारण किया। क्या आज जंतर-मंतर पर हम ऐसा होते देख रहे हैं। टुकड़ों-टुकड़ों में राजनैतिक दलों के लोग मंच पर जाकर अपनी सहानुभूति, समर्थन प्रकट कर रहे हैं, मगर वहां मंच और जमीन का फर्क समझ आ रहा है। जंतर-मंतर पर बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो जमीन पर हैं, और वहीं अनशन कर रहे हैं। इन लोगों को न किसी राजनैतिक दल का समर्थन मिल रहा है, न इनसे अनशन खत्म करने की बड़े पैमाने पर अपील हो रही है। मुख्यधारा का मीडिया भी कई दिनों तक यहां नदारद ही रहा, अब कुछेक तथाकथित स्टार पत्रकारों के पहुंचने पर थोड़ी बहुत हलचल दिख रही है। लेकिन अन्ना हजारे जैसे फ्रंट पेज से लेकर प्राइम टाइम तक पर छाए रहते थे, वो कवरेज न सोनम वांगचुक के लिए है, न बाकी अनशनकारियों के लिए। इसलिए अभिजित दिपके को पिछली सरकारों और मोदी सरकार का फर्क समझना होगा।
इस आंदोलन के बरक्स ही छात्रों की गूंज आंदोलन भी कांग्रेस चला रही है, जिसे मीडिया में हमेशा की तरह कोई जगह नहीं मिल रही। युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ता लगातार सड़कों पर हैं, कहीं पुलिस की लाठियां खा रहे हैं, कहीं पानी की बौछारें झेल रहे हैं, यह सब भी पीड़ित छात्रों को इंसाफ दिलाने के लिए ही है। इसके बावजूद इंडिया गठबंधन के कई नेताओं और पत्रकार सवाल कर रहे हैं कि राहुल गांधी सीजेपी को समर्थन देने क्यों नहीं आते। इनसे प्रतिप्रश्न किया जाना चाहिए कि यही सवाल वे अभिजित दिपके से क्यों नहीं करते। क्या अभिजित दिपके ने अब तक छात्रों की गूंज आंदोलन को लेकर राहुल गांधी या कांग्रेस के किसी नेता से कोई संपर्क किया है। और सवाल यह भी है कि अगर राहुल गांधी जंतर-मंतर पहुंचते हैं, तब भी क्या बदलने वाला है। वे प्रधानमंत्री तो हैं नहीं जो धर्मेन्द्र प्रधान को हटा दें। बेशक राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं और इस नाते वे लगातार जनता के बीच पहुंचते ही हैं और अब भी पीड़ितों के लिए आवाज उठा ही रहे हैं। लेकिन हर बात में सवालों के तीर राहुल गांधी की तरफ मोड़ने से समस्या हल नहीं होगी, केवल असली मुद्दे से ध्यान भटकेगा। अभी यही हो रहा है, क्योंकि छात्रों को इंसाफ से ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि राहुल जंतर-मंतर जाएंगे या नहीं। जबकि यह वक्त सोनम वांगचुक का अनशन खत्म कराने और इस बात पर जोर देने का है कि मोदी सरकार को हर हाल में जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर किया जाए। इसके लिए बयानबाजी छोड़कर सबको एक साथ खड़े होने की जरूरत है।