संसद से सड़क तक विपक्ष की लड़ाई
राहुल गांधी की नाक से बहता खून, एक पैर में जूता, एक में नहीं। प्रियंका गांधी को धक्का देकर बस में बिठाया जाना।;
राहुल गांधी की नाक से बहता खून, एक पैर में जूता, एक में नहीं। प्रियंका गांधी को धक्का देकर बस में बिठाया जाना। देर रात पुलिस स्टेशन में खड़ी सोनिया गांधी। ये महज तस्वीरें नहीं हैं, न ही संयोग से बने दृश्य हैं, बल्कि सोशल मीडिया और जनता के मानस पर छा जाने के लिए पैदा हुए क्षण हैं। विपक्षी राजनीति में हिरासत की तस्वीरें कई बार वास्तविक बहसों से ज्यादा असर छोड़ जाती हैं। यह राजनीति का पुराना और कारगर हथियार है। आपातकाल का नाम लें तो जॉर्ज फर्नांडीस की हथकड़ी लगी तस्वीर सबसे पहले याद आती है।
अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और बाकी विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए ऐसी ही किसी तस्वीर की दरकार थी। क्योंकि 20 जुलाई को जब जंतर-मंतर पर हजारों लोग संसद की तरफ बढ़ने का इरादा लिए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए उतरे तो बेहद क्रूरता से उन्हें कुचलने की कोशिश की गई। इस दौरान कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से अभिजित दिपके समेत मंच पर पहले बैठे लोगों को तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन उनके आह्वान पर जुटे युवाओं को चोटें आईं। हालांकि उनके हौसले इससे कम नहीं हुए, बड़ी संख्या में युवा और उनका साथ देते अन्य लोग अब भी जंतर-मंतर पर डटे ही हैं। सोमवार को एक सवाल कई बार उठा कि विपक्ष के नेता कहां हैं, राहुल गांधी क्यों छात्रों का साथ देने जंतर-मंतर नहीं आ रहे। इससे पहले जब वे विदेश में थे, तब भी सवाल उठ रहे थे कि देश में इतना कुछ चल रहा है और राहुल कहां हैं। लिहाजा राहुल ने जवाब दे दिया।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास के सामने विपक्षी सांसदों के साथ खड़े होकर सीधे नरेन्द्र मोदी से इस्तीफे की मांग ही की। ऐलान कर दिया कि मोदी जब तक विपक्ष की और छात्रों की बात नहीं सुनेंगे, वे यहां से हटेंगे नहीं। इसके बाद ही पुलिस को ऐसा एक्शन लेना पड़ा कि एक झटके में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव जैसे तमाम विपक्षी सांसदों को हिरासत में लिया गया। बुधवार को जब राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की तब भी उनसे सवाल किया गया कि आप प्रधानमंत्री आवास के सामने ही क्यों गए। इस पर राहुल गांधी ने जवाब दिया कि जब छात्र अपनी मांगों के साथ सड़क पर हैं, तो हमें लगा कि हमें भी सड़क पर होना चाहिए। लेकिन उससे पहले हमारी स्वाभाविक जगह संसद है। इसलिए मंगलवार सुबह हम लोकसभा अध्यक्ष के पास गए कि इस मुद्दे पर चर्चा हो, तो उनका जवाब था कि सरकार से पूछेंगे। इसके बाद हम प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने देने गए।
राहुल गांधी के इस जवाब पर आश्चर्य नहीं होता क्योंकि देश पिछले 12 सालों में देख चुका है कि कितनी बार जरूरी मुद्दों पर विपक्ष ने चर्चा की मांग की, लेकिन सत्ता पक्ष ने व्यवधान खड़ा किया। विपक्ष के लोगों को बोलने न देना और जब वे बोलें तो कई बार टोकना या उनके बयानों को रिकार्ड से हटवाना, ऐसे सारे धतकरम विपक्ष की आवाज दबाने के लिए किए गए हैं। वंदेमातरम पर चर्चा के लिए सरकार के पास वक्त है, जीएसटी लागू करवाना हो तो आधी रात को प्रधानमंत्री संसद में दिखेंगे। लेकिन देश के भविष्य यानी युवाओं पर बात करना है, उस शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करना है, जिसके भरोसे ही देश सही अर्थों में आगे बढ़ेगा, तो उस मुद्दे पर मोदी बात ही नहीं करना चाहते। जबकि कायदे से उन्हें खुद इस मुद्दे पर चर्चा की पहल करनी चाहिए थी।
सरकार बहस से बचती दिख रही है, तो विपक्ष के पास दो ही रास्ते बचते हैं- या तो वह थोड़ी बहुत शिकायतें कर विपक्ष होने की खानापूरी कर ले या फिर इस मुद्दे को सड़क पर ले जाए। राहुल गांधी समेत बाकी विपक्ष ने दूसरा रास्ता चुना। एक शंका यह भी जताई जा रही थी कि राहुल सड़क पर आ गए हैं तो जंतर-मंतर पर जो आंदोलन खड़ा हुआ, वह फीका पड़ जाएगा। यानी राहुल पर सबका ध्यान जाएगा, छात्रों की मांग पर नहीं तो इस आशंका को भी खुद राहुल गांधी ने ध्वस्त कर दिया। उन्होंने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में साफ कहा कि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा, जिन लोगों ने छात्रों के साथ मारपीट की और उनका अपमान किया, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, नरेंद्र मोदी छात्रों के साथ हुए व्यवहार के लिए माफी मांगें, इन तीन मांगों पर कोई समझौता नहीं होगा। हम छात्रों के साथ पूरी तरह से खड़े हैं। जब उनके साथ हुई बदसलूकी पर सवाल हुए कि कभी नेता प्रतिपक्ष के साथ ऐसा नहीं किया गया, तब भी राहुल गांधी ने कहा कि मैं ऐसे कई और प्रहार छात्रों के लिए झेलने तैयार हूं। इन जवाबों के बाद कांग्रेस के खिलाफ जो नैरेटिव बनाने की कोशिश की गई थी, वो बेकार हो गई।
संसद में तो मोदी सरकार बहस से बच सकती है, लेकिन जब विपक्ष सीधे प्रधानमंत्री के घर के सामने खड़ा हो जाए, तो यही संदेश जाता है कि बात अब किसी मंत्री के इस्तीफे तक नहीं बल्कि सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों की जवाबदेही तक पहुंच चुकी है।
हालांकि विपक्ष की असली परीक्षा अब भी बाकी है कि क्या इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में वह सफल होगी। जब तक नीट पेपर लीक के कारण अपनी जान गंवा चुके छात्रों को न्याय नहीं मिलता, जब तक शिक्षा प्रणाली की खामियां दूर नहीं होगी, जिम्मेदार लोगों को कटघरे में नहीं खड़ा किया जाता, क्या विपक्ष इस मुद्दे को जिंदा रखेगा।