खामेनेई युग का अंत
ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार से पहले उनकी अंतिम यात्रा निकाली जा रही है।;
ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार से पहले उनकी अंतिम यात्रा निकाली जा रही है। जिसमें पूरे ईरान से लोग तो उमड़ पड़े ही हैं, साथ ही दुनिया के कई देशों के लोग उन्हें आखिरी बार श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे हैं। अली खामेनेई की अंतिम यात्रा सोमवार को राजधानी तेहरान में शुरू हुई। शहर की सड़कों पर लाखों लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए जुटे। जिस तरह से पूरे ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार पर लोग रोते-बिलखते दिख रहे हैं और जान के खतरे उठाकर भी कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आयतुल्लाह अली खामेनेई का ईरान में क्या दर्जा था। वे केवल आधिकारिक तौर पर सुप्रीम लीडर नहीं थे, बल्कि उनके साहस और बेखौफ रवैये को देखकर आम ईरानी नागरिक उन्हें अपना सर्वोच्च नेता मानता था और उनके कहे को पत्थर की लकीर। शायद यही वजह है कि 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल के हमले में आयतुल्लाह खामेनेई अपने कुछ परिजनों के साथ शहीद हुए, तो उनके न झुकने वाले जज्बे को हरेक ईरानी नागरिक ने अपने व्यवहार में उतार लिया और फिर अमेरिका-इजरायल के हर हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया। डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू को खुशफहमी थी कि वे ईरान पर आसान जीत दर्ज कर लेंगे, हमले के पहले ही दिन अली खामेनेई की हत्या करने के बाद ईरान में कोई नेतृत्व नहीं बचेगा और ईरानी पलटवार नहीं कर पाएंगे। लेकिन अमेरिका और इजरायल का यह भ्रम बहुत जल्दी टूट गया। ईरान ने अली खामेनेई के बेटे मोज्तबा खामेनेई को सर्वोच्च नेता घोषित किया, वे अब तक सार्वजनिक तौर पर दिखाई नहीं दिए हैं। लेकिन ईरान के राष्ट्रपति डा.मसूद पेजेश्कियान से लेकर विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची, ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद गलीबाफ जैसे तमाम नेता लगातार सड़कों पर उतर कर जनता में हिम्मत बंधाते रहे और साथ ही ईरानी सेना अमेरिका और इजरायल पर जवाबी वार भी करती रही। इस युद्ध में ईरान को बेशक जान माल का बहुत नुकसान हुआ। आयतुल्लाह अली खामेनेई के अलावा अली लारीजानी जैसे नेता भी मारे गए, मिनाब की स्कूल में सौ से ज्यादा बच्चियां हमले का शिकार बनीं। लेकिन ईरान झुका नहीं, संघर्ष करता रहा। हालात ऐसे बने कि आखिर में अमेरिका को ईरान के साथ पहले अस्थायी युद्ध विराम और अब समझौता करने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि ट्रंप की अकड़ अब भी खत्म नहीं हुई है।
अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए कम से कम एक करोड़ लोग ईरान में अलग-अलग जगहों पर सड़कों पर आए हैं। इसे देखकर ट्रंप ने कहा कि उन्हें ईरानियों को रोता देखकर हैरानी हुई। उन्हें लगा था कि लोग ख़ामेनेई से नफ़रत करते हैं। फिर खुद को सही साबित करने के लिए ट्रंप ने कहा, 'हो सकता है ये नकली आंसू हों।' इस बयान के पीछे दो ही कारण हो सकते हैं या तो ट्रंप सच्चाई को अनदेखा कर रहे हैं कि उनके खामेनेई के विरुद्ध चलाए गए अभियान को जनता ने नकार दिया है या फिर उनमें वैश्विक मामलों की वाकई समझ नहीं है। वे अब भी इस मुगालते में हैं कि ईरान की सभ्यता को जमींदोज कर सकते हैं। याद कीजिए ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य न खोलने पर ईरान को सभ्यता मिटाने की धमकी दी थी। ऐसे बयानों से ट्रंप खुद ही अपनी मिट्टी पलीद करवा रहे हैं। बीबीसी के मुताबिक नकली आंसू वाले ट्रंप के दावे पर शोक मना रही 50 साल की महिला ज़हरा सफ़ाई ने रॉयटर्स से कहा, 'हमने 47 साल पहले नकली आंसू बहाने के लिए क्रांति नहीं की थी। हमने अपने इतने शहीदों की क़ुर्बानी नकली आंसू बहाने के लिए नहीं दी।'
ऐसे बयान ट्रंप और नेतन्याहू को आईना दिखाने के लिए काफी हैं कि वे ईरान की सच्चाई समझ लें और युद्ध के रास्ते से पीछे लौट जाएं। मगर ये दोनों मगरूर नेता अब भी अपनी झूठी अकड़ में फैसले ले रहे हैं। जैसे खामेनेई के अंतिम संस्कार में तमाम वरिष्ठ ईरानी नेता और अधिकारी शामिल हो रहे हैं। इस पर ट्रंप ने कहा कि ईरानी शासन के कई वरिष्ठ अधिकारी एक ही जगह मौजूद हैं। अमेरिका चाहे तो 'एक ही हमले' में उन सभी को मार सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा, 'हम ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि फिर बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा।' दरअसल ट्रंप इस बात को समझ नहीं रहे हैं कि ईरान किसी एक नेता पर निर्भर नहीं है, ईरानी जनता ने यह साबित किया है कि देश बड़ा होता है कोई चेहरा नहीं। देश आदर्शों और सिद्धांतों पर चलता है। तो आयतुल्लाह अली खामेनेई ने पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका की नीतियों के प्रतिरोध में जो सिद्धांत अपनाए ईरान अब भी उन्हीं पर चल रहा है, इसलिए उसे झुकाया नहीं जा सका।
इधर बेंजामिन नेतन्याहू की नजर ईरान के साथ अब लेबनान पर टिकी है और हिज्बुल्लाह को खत्म करने के नाम पर लगातार लेबनान पर हमले हो रहे हैं। इस में अमेरिका को भी तकलीफ हो रही है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने जब इजरायल को कहा कि अमेरिका की बात सुनिए क्योंकि केवल हम ही आपका साथ दे रहे हैं तो नेतन्याहू का जवाब था कि भारत का समर्थन उनको मिल रहा है। वैसे इस बयान पर अब तक मोदी सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन यह विचारणीय है कि कभी ट्रंप, कभी नेतन्याहू जैसी मर्जी वैसे दावे भारत का नाम लेकर कर कैसे देते हैं। आखिर मोदी से दोस्ती के नाम पर क्या ये नेता समझते हैं कि वे भारत को अपनी मर्जी से हाँक सकते हैं। ऐसे दावों का जवाब तो कायदे से प्रधानमंत्री मोदी को ही देना चाहिए। लेकिन वे तो इजरायल से सम्मान लेकर इस पूरे मुद्दे पर मुंह सिल कर बैठे हैं। जबकि कायदे से उन्हें ईरान और भारत के सदियों पुराने रिश्ते का मान रखते हुए खुलकर ईरान का साथ देना चाहिए था। वहीं युद्ध अपराधों के दोषी बेंजामिन नेतन्याहू से दूरी दिखानी चाहिए थी। मगर मोदी ये दोनों काम नहीं कर सके और अब फिर छह दिन की नयी विदेश यात्रा पर निकल पड़े हैं। हालांकि मोदी के रवैये के बावजूद ईरानी जनता और भारत की जनता में सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते बने हुए हैं।
जबकि ट्रंप और नेतन्याहू के लिए ईरानी जनता का गुस्सा बढ़ रहा है। रविवार को हुई शोकसभा में इन दोनों नेताओं के मुर्दाबाद के नारे लगे। बहरहाल अब खामेनेई के पार्थिव शरीर को उनके जन्मस्थान मशहद ले जाया जाएगा, जहां इमाम रजा दरगाह में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। ईरान में खामेनेई युग का अंत हो रहा है, लेकिन नए संघर्ष की जमीन भी तैयार हो चुकी है।