एचडीएफसी के नए चेयरमैन पर सवाल
देश के प्रमुख निजी बैंक एचडीएफसी ने भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को बैंक का नया स्वतंत्र निदेशक नियुक्त किया है।;
देश के प्रमुख निजी बैंक एचडीएफसी ने भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को बैंक का नया स्वतंत्र निदेशक नियुक्त किया है। यह नियुक्ति 30 जून 2026 से प्रभावी हो गई है। वह अगले चार वर्षों तक इस पद पर रहेंगे। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक की मंजूरी मिलने के बाद वह तीन साल की अवधि के लिए बैंक के अंशकालिक चेयरमैन की जिम्मेदारी भी संभालेंगे। कोई बैंक किसी पूर्व अधिकारी को निदेशक बनाए, तो इसमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि प्रमुख चुनाव आयुक्त जैसे पद को संभालने के बाद एक निजी बैंक का निदेशक राजीव कुमार बने हैं। ध्यान रहे कि उनके मुख्य चुनाव आयुक्त रहते चुनावों में बड़ी धांधलियों के आरोप बार-बार लगे और चुनाव आयोग जैसी संस्था पर सवाल उठने शुरु हुए, जो मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तक जारी ही हैं।
2024 के लोकसभा चुनावों के वक्त राजीव कुमार ही चुनाव आयोग के प्रमुख थे, और तब विपक्ष ने आरोप लगाए थे कि प्रधानमंत्री मोदी के सांप्रदायिक भाषणों पर आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि यह आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। विपक्ष का कहना था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या अन्य बड़े भाजपा नेताओं ने चुनावों के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ या सांप्रदायिक बयान दिए, तो चुनाव आयोग ने उन पर कोई सीधी कार्रवाई नहीं की। आयोग ने प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत नोटिस भेजने के बजाय भाजपा अध्यक्ष (जेपी नड्डा) को नोटिस थमा दिया, जिसे विपक्ष ने नियमों का मज़ाक उड़ाना कहा। जबकि विपक्षी नेताओं की छोटी गलतियों पर भी तुरंत और सख्त कार्रवाई की गई। इसके अलावा भी वोट चोरी, ईवीएम की गड़बड़ी, वोटर डेटा आदि की गड़बड़ियों के सवाल विपक्ष उठाता रहा। लेकिन राजीव कुमार का रवैया ऐसा था कि वे प्रेस कांफ्रेंस में खुलकर सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर देते थे, या फिर स्तरहीन शायरी सुनाकर जवाब देते थे। राजीव कुमार का कहना था कि जो लोग चुनावी नतीजों को स्वीकार नहीं करना चाहते, वे अक्सर चुनाव आयोग को 'बलि का बकरा' बनाते हैं। उन्होंने ईवीएम में गड़बड़ी और मतदाता सूची से छेड़छाड़ जैसे आरोपों को भी पूरी तरह निराधार बताया था।
मुख्य चुनाव आयुक्त पद से सेवानिवृत्त होने के बाद राजीव कुमार करीब साल भर सुर्खियों से दूर ही रहे। यदा-कदा उनकी सुबह की सैर की तस्वीरें ही सामने आईं, अन्यथा वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, देश में चुनाव आयोग से जुड़े एसआईआर जैसे कई गंभीर मसले उठे, तब भी उनकी कोई टीका-टिप्पणी नहीं सुनी गई। जबकि एस वाय कुरैशी या अशोक लवासा जैसे पूर्व चुनाव आयुक्तों के आलेख या बयान समसामयिक विषयों पर आते ही रहते हैं। इसलिए जब राजीव कुमार को एचडीएफसी का नया चेयरमैन बनाने की खबर सामने आई, तो सभी को आश्चर्य हुआ। राजीव कुमार का पिछला कार्यप्रभार जितना विवादों में रहा, वैसे ही विवाद एचडीएफसी से भी जुड़े हैं।
इसी साल मार्च में बैंक के चेयरमैन पद से अतानु चक्रवर्ती ने इस्तीफा दे दिया था।
17 मार्च 2026 की रात को, पूर्व आईएएस अधिकारी, आर्थिक मामलों के विभाग के पूर्व सचिव और एचडीएफसी बैंक के अंशकालिक अध्यक्ष अतानु चक्रवर्ती ने तीन वाक्य लिखे जिसने वित्तीय जगत को चौंका दिया था। श्री चक्रवर्ती ने लिखा कि 'पिछले दो वर्षों में मैंने बैंक के भीतर कुछ ऐसी घटनाएं और प्रथाएं देखी हैं जो मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं। यही मेरे उपरोक्त निर्णय का आधार है। मैं पुष्टि करता हूं कि मेरे इस्तीफे के लिए ऊपर बताए गए कारणों के अलावा कोई अन्य ठोस कारण नहीं हैं।' अतानु चक्रवर्ती ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा। कोई विशिष्ट विवरण नहीं दिया। किसी घटना का नाम नहीं लिया। कोई स्पष्ट आरोप नहीं लगाया। बस तीन वाक्य लिखकर अपना इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद शेयर बाजार में भी उथल-पुथल रही। क्योंकि एचडीएफसी बैंक लिमिटेड बाजार पूंजीकरण के आधार पर भारत का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र का बैंक है। खुदरा बैंकिंग, थोक बैंकिंग, ट्रेजरी ऑपरेशन्स, डिजिटल बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट सहित बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला एचडीएफसी उपलब्ध कराता है, भारत और विदेशों में लाखों ग्राहकों इससे जुड़े हैं। जब इसके चेयरमैन ही यह कहें कि कुछ ऐसा हो रहा है जो नैतिकता के हिसाब से सही नहीं है, तो जाहिर है निवेशकों और ग्राहकों का भरोसा टूटेगा ही।
बता दें कि एचडीएफसी पर कुछ महीने पहले आरोप लगा था कि इसने महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम को करीब रुपए 45 करोड़ की राशि का ब्याज भुगतान किया लेकिन इसे 'मार्केटिंग खर्चÓ (रोड सेफ्टी कैंपेन) के रूप में गलत तरीके से दिखाया गया है। आरोप था कि एमएसआरडीसी को दी जाने वाली अतिरिक्त ब्याज दर को नियम-कायदों के चलते 'रोड सेफ्टी कैंपेनÓ या मार्केटिंग खर्च के रूप में दर्शाया गया। हालांकि इस आरोप के बाद बाहरी लॉ फर्मों ने तीन महीने की स्वतंत्र जांच की और अब बैंक को इन आरोपों से क्लीन चिट मिल गई है। यह जांच विल्सन सोंसिनी गुडरिच एंड रोसाटी और वाडिया गांधी एंड कंपनी द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई। लगभग तीन महीने की अवधि में, दोनों फर्मों ने हजारों दस्तावेज, बोर्ड और समिति की बैठक के रिकॉर्ड, एजेंडा पेपर और अन्य प्रासंगिक सामग्रियों की समीक्षा की, साथ ही स्वतंत्र निदेशकों, समिति के अध्यक्षों, प्रबंध निदेशक और सीईओ और वरिष्ठ प्रबंधन टीम के सदस्यों के साथ साक्षात्कार भी किए। जांच के बाद कहा गया कि अतानु चक्रवर्ती के बयान का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं मिला है। जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि समीक्षा किए गए समकालीन सबूत इस्तीफे के पत्र में किए गए बयानों से मेल नहीं खाते थे और कानूनी समीक्षा ने उन बयानों का समर्थन करने वाला कोई आधार नहीं पाया। बैंक ने यह भी नोट किया कि बार-बार अनुरोधों के बावजूद, श्री चक्रवर्ती ने जांच के दौरान साक्षात्कार में भाग नहीं लिया। जबकि यह प्रक्रिया का एक हिस्सा था।
तो कुल मिलाकर एचडीएफसी को 45 करोड़ की हेराफेरी के मामले में बरी कर दिया गया है, लेकिन इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला है कि अतानु चक्रवर्ती को आखिर दो सालों में बैंक के भीतर और क्या गड़बड़ी दिखी, क्यों वो इतने असहज हो गए कि पद ही छोड़ दिया। अब जिस तरह से राजीव कुमार को इस पद पर लाया गया है, उससे यह विवाद और गहरा हो चुका है। क्योंकि राजीव कुमार की छवि भी जनता से ज्यादा सरकार के पक्ष में काम करने की बनी हुई है। क्या राजीव कुमार एचडीएफसी को पूरी तरह नियमों से संचालित कर अपनी छवि पर लगे दाग को मिटा देंगे या फिर एक और बड़े बैंक में लाखों लोगों के हजारों करोड़ रूपयों की सुरक्षा की चिंता खड़ी हो गई है।