सेशल्स दौरे का हासिल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तीन दिनों के विदेश दौरे से सोमवार को वापस लौट आए हैं। हिंद महासागर के छोटे से द्वीपीय देश सेशल्स में मोदीजी का सप्ताहांत गुजरा।;

By :  DB Desk
Update: 2026-06-29 21:20 GMT

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तीन दिनों के विदेश दौरे से सोमवार को वापस लौट आए हैं। हिंद महासागर के छोटे से द्वीपीय देश सेशल्स में मोदीजी का सप्ताहांत गुजरा। साढ़े चार सौ वर्गकिलोमीटर के छोटे से क्षेत्रफल और डेढ़ लाख से भी कम आबादी वाले इस देश में तीन दिनों का लंबा वक्त मोदीजी ने क्यों गुजारा, यह जानने की इच्छा है। क्योंकि इस समय देश में एक साथ कई समस्याएं सिर उठाए हुए हैं। पेपर लीक की घटनाएं और तनाव के कारण छात्रों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं थम रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी का धरना-प्रदर्शन जंतर-मंतर पर चल रहा है, सोनम वांगचुक रविवार से अनशन पर बैठ चुके हैं। राम मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा आर-पार हो गया और श्रद्धालु अपनी आस्था पर हमले से दुखी हैं। गर्मी और बारिश दोनों का कहर आम जनजीवन को संकट में डाल रहा है। अरुणाचल प्रदेश में स्थानीय जनता से फिर आगाह किया है कि चीन फिर जमीन हड़प रहा है। इन चौतरफा मुसीबतों के बीच अगर बहुत जरूरी था तो प्रधानमंत्री सेशल्स के 50वें स्वतंत्रता दिवस के समारोह में शामिल होकर एक दिन में लौट सकते थे। बता दें कि इस समारोह के मुख्य अतिथि नरेन्द्र मोदी थे। सेशल्स के राष्ट्रपति डॉक्टर पैट्रिक हर्मिनी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'गार्डियन ऑफ़ द ब्लू होराइज़न' से सम्मानित किया। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 'मैं इस सम्मान को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूं और इसे उन सभी देशों को समर्पित करता हूं जो जलवायु परिवर्तन की चुनौती से लड़ रहे हैं और पर्यावरण संरक्षण को भावी पीढ़ियों के प्रति अपनी दायित्व मानते हैं।'

प्रधानमंत्री मोदी को अब तक करीब 35 देश इसी तरह सम्मानित कर चुके हैं, भाजपा समर्थक इसे ही विश्वगुरु बनने की निशानी मानते हैं। हालांकि सेशल्स ने जो सम्मान मोदीजी को दिया है, वो इसी साल ही बना है और मोदीजी उसे पाने वाले पहले व्यक्ति हैं। इस सम्मान का जो पत्र सोशल मीडिया पर दिखाया जा रहा है, उसमें अंग्रेजी वर्तनी की ढेर सारी गलतियां हैं, सेशल्स और रिपब्लिक तक गलत वर्तनी के साथ लिखे गए हैं। इसकी सच्चाई क्या है, इस बारे में विदेश मंत्रालय ज्यादा प्रकाश डाल सकता है। लेकिन असली मुद्दा यह है कि मोदी के सेशल्स के दौरे से देश को क्या हासिल होने जा रहा है। ध्यान रहे कि मॉरिशस की तरह सेशल्स भी प्रमुख 'टैक्स हेवन' (कर चोरों का स्वर्ग) है जो विदेशी कंपनियों और निवेशकों को शून्य कर लाभ और उच्च स्तरीय वित्तीय गोपनीयता प्रदान करता है। मनी लॉन्ड्रिंग और कर पारदर्शिता की चिंताओं के कारण सेशल्स को कई अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं की 'ग्रे लिस्ट' में रखा गया था। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं में अक्सर जो व्यापार सौदे और समझौते होते हैं, उनमें उनके करीबी बड़े उद्योगपतियों की सुविधाओं और लाभ का ही खास ध्यान रखा जाता है, क्या सेशल्स दौरे में भी ऐसा ही कुछ होगा, इसका पता निकट भविष्य में लग ही जाएगा।

वैसे सेशल्स के साथ भारत के संबंध शुरु से अच्छे रहे हैं। भारत ने कई बार सेशल्स की आर्थिक, सामरिक मदद की है और 1986 में जब सेशल्स के तत्कालीन रक्षा मंत्री ओगिल्वी बर्लुइस के नेतृत्व में राष्ट्रपति फ्रांस-अल्बर्ट रेने के ख़िलाफ़ तख़्तापलट की कोशिश हुई तो भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसे रुकवाया था। राजीव गांधी रक्षा मंत्री भी थे और उनके कहने पर नौसेना प्रमुख एडमिरल आरएच तहिलियानी की देखरेख में तख्तापलट की कोशिशों को नाकाम किया गया। भारत ने इस गुप्त ऑपरेशन को 'फ़्लावर्स आर ब्लूमिंग' का कोडनेम दिया था।

असली विश्वगुरु ऐसा ही होता है, जो बिना किसी तामझाम, दिखावे या बड़बोलेपन के अपना प्रभाव दुनिया पर लंबे वक्त तक छोड़ देता है। नेहरूजी से लेकर मनमोहन सिंह तक तमाम प्रधानमंत्रियों के नेत़त्व में दुनिया के कई छोटे, शक्तिहीन देशों की रक्षा भारत ने इसी तरह की है। इन पूर्व प्रधानमंत्रियों को कितने देशों ने सम्मान दिए, इसकी बात कोई नहीं करता, लेकिन इनके कारण वैश्विक हालात किस तरह कई बार संभाले गए, इसे दुनिया आज भी याद करती है। प्रधानमंत्री मोदी चाहते तो इनका ही अनुकरण करके पुरानी विदेश नीति पर चलते, जिससे उनका रसूख भी बढ़ता और भारत का प्रभाव भी। लेकिन इस समय हालात भारत के लिए अनुकूल नहीं दिख रहे, खासकर पड़ोसी देशों के मामलों में। जिस समय प्रधानमंत्री मोदी सेशल्स में थे, पड़ोसी बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान चीन में थे। प्रधानमंत्री बनने के करीब चार महीने बाद तारिक़ रहमान ने अपनी पहली विदेश यात्रा की, जिसमें उन्होंने सबसे पहले मलेशिया का दौरा किया। इसके बाद वे चीन गए और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। शेख हसीना की सरकार गिराने के बाद मोहम्मद युनूस के नेतृत्व में जो अंतरिम सरकार बनी थी, तब भारत और बांग्लादेश के संबंध बेहद खराब हो गए थे। लेकिन फिर तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने तो यह उम्मीद बंधी कि उनकी पार्टी बीएनपी का रुख पारंपरिक तौर पर भारत के पक्ष में नहीं रहता है, फिर भी संबंध बेहतर होंगे।

जब मोदी सरकार ने पूर्व मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश का उच्चायुक्त बनाया, तब यही संकेत दिए गए कि इस नियुक्ति से दोनों देशों के रिश्ते सुधरेंगे, लेकिन ढाका पहुंचने के तुरंत बाद दिनेश त्रिवेदी ने भूपेन हजारिका के एक लोकप्रिय गीत का हवाला दिया, इसमें यह विचार बताया गया कि दोनों देशों का 'आसमान एक है और हवा भी एक है'। उनकी इस टिप्पणी पर बांग्लादेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। कई लोगों को लगा कि यह 'अखंड भारत' के विवादित विचार को बढ़ावा देने जैसा है। दरअसल मोदी सरकार में लगातार घुसपैठियों का मुद्दा उठाया जा रहा है, जिसमें बांग्लादेश ही निशाने पर होता है। हिमंता बिस्वासरमा और सुवेन्दु अधिकारी जैसे मुख्यमंत्रियों की भाषा भी इस संबंध में कई बार अपमानजनक होती है। बांग्लादेश को ख़ासतौर पर उन बयानों पर कड़ा एतराज है, जिनमें कथित बांग्लादेशी नागरिकों को जबरन सीमा पार भेजने की बात कही गई। बांग्लादेश इसे उकसाने वाला और भड़काऊ मानता है।

जिस बांग्लादेश का निर्माण ही भारत की मदद से हुआ, उससे इस तरह अलगाव की भावना पनपेगी, यह कुछ साल पहले तक सोचा नहीं जाता था, लेकिन अब यही हकीकत है। पिछले साल अगस्त में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इसहाक़ डार ढाका पहुंचे तो उन्होंने कहा कि दोनों देशों की नई पीढ़ी एक 'साझा सपना' अपनाने के लिए तैयार हैं। इसहाक़ डार ने उस समय कहा था, 'कराची से चटगांव, क्वेेटा से राजशाही, पेशावर से सिलहट और लाहौर से ढाका तक, हमारे युवा एक साथ खड़े होने और हर चुनौती का मिलकर सामना करने के लिए तैयार हैं।' यह बयान उन्होंने उस समय के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस से मुलाक़ात के बाद दिया था। अब तारिक रहमान ने भी भारत की जगह चीन जाकर अपनी प्राथमिकताएं जाहिर कर दी हैं।

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