एआई से खतरों के बीच मुनाफे और ताकत के दांव

टेक्नालॉजी से मानव की तरक्की से कोई इन्कार नहीं करता है। लेकिन उसके दुरुपयोग की आशंकाओं को खारिज भी नहीं कर सकते हैं।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-17 21:05 GMT
  • राजेश पांडेय

टेक्नालॉजी से मानव की तरक्की से कोई इन्कार नहीं करता है। लेकिन उसके दुरुपयोग की आशंकाओं को खारिज भी नहीं कर सकते हैं। एआई को किनारे रख दें और सोशल मीडिया के प्रभाव को देख लें तो स्थिति समझी जा सकती है। सोशल मीडिया की लत युवाओं, किशोरों के साथ सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रही है। लेकिन, उस पर कारगर रोक किसी कंपनी ने नहीं लगाई है।

इन दिनों दुनियाभर खासकर अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से होने वाली तबाही पर गर्म बहस छिड़ गई है। विश्व के भविष्य को लंबे समय तक प्रभावित करने वाली तकनीक में दो महाशक्तियों अमेरिका और चीन के साथ दिग्गज टेक्नालॉजी कंपनियों के बड़े दांव लगे हैं। एआई से मानवता के अस्तित्व को खतरों की चेतावनियों के बावजूद कोई पक्ष पीछे नहीं हटना चाहता है। अमेरिका, चीन को अपना प्रभाव कम होने और पिछड़ने की आशंका है तो टेक कंपनियों की नजर अरबों रुपए के निवेश और मुनाफे पर है। इस रस्साकशी ने उम्मीद जगाई है कि देर-सबेर एआई पर काबू पा लिया जाएगा।

एआई या कृत्रिम बुद्धि के विध्वंसक नतीजों के बारे में एआई के गॉडफॉदर माने जाने वाले वैज्ञानिक ही आगाह कर रहे हैं। यहां कुछ नामी साइंटिस्ट का जिक्र काफी होगा। मांट्रियल यूनिवर्सिटी, कनाडा में कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर जोशुआ बेंजिओ 2023 से एआई के कारण मानव अस्तित्व को खतरे और उस पर मानवीय नियंत्रण खत्म होने के बारे में कह रहे हैं। बेंजिओ ने एआई के खिलाफ अभियान छेड़ने और सुरक्षा का सिस्टम बनाने के लिए लॉ जीरो संगठन बनाया है। लॉ जीरो बेकाबू एआई एजेंट को बेअसर करने के सेफ्टी सिस्टम बना रहा है। संगठन को जर्मनी और कनाडा की सरकारों के साथ माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया से मदद मिली है।

बेंजिओ के साथ 2018 में एलन ट्यूरिंग पुरस्कार हासिल करने वाले ज्याफ्रे हिंटन ने 2023 में गूगल से इस्तीफा दे दिया। उनका कहना था कि वे एआई के जोखिमों पर अधिक स्वतंत्रता से बोलने के लिए काम छोड़ रहे हैं। हिंटन कहते हैं कि एआई मानवों से अधिक स्मार्ट हो जाएगी और सत्ता पर कब्जा करने जैसे लक्ष्य बना लेगी। उसे बंद करना या नियंत्रण में रखना असंभव हो जाएगा। गूगल के पूर्व शोधकर्ता का कहना है कि एआई का बुरे लोग दुरुपयोग करेंगे,ऑटो साइबर हमले होंगे और जैविक वायरस तैयार किए जाएंगे हैं। वे इस टेक्नालॉजी के कारण बेरोजगारी बढ़ने और चुनावों में धांधली का अंदेशा भी जताते हैं।

बेंजिओ, हिंटन के साथ एआई लैब्स में काम करने वाले कई शोधकर्ता लगातार चिंता जता रहे हैं। वे कहते हैं कि एआई इस दशक के अंत तक मानवों का अस्तित्व खत्म कर देगी। इनकी चेतावनियों ने वैसा असर नहीं किया है जैसा कि 8 सितंबर को एआई लैब एंथ्रोपिक से जेकब कॉक्सन के इस्तीफे का हुआ है। कॉक्सन ने तीन साल तक ओपनएआई और एंथ्रोपिक में एआई के शक्तिशाली मॉडलों को प्रशिक्षित किया है। उनके इस्तीफे की पोस्ट को इंटरनेट पर 24 घंटे से कम समय से नौ करोड़ से अधिक व्यू मिले थे। उन्होंने सबसे बड़ा खतरा बताया यह है कि यदि हमने एआई की वर्तमान गति को धीमा नहीं किया तो निकट भविष्य में हम सब मर जाएंगे। वे कहते हैं, एआई कंपनियों में काम कर रहे सभी लोग ऐसा ही सोचते हैं। कॉक्सन की चेतावनी से हड़कंप मच गया है।

12 सितंबर को एंथ्रोपिक के प्रमुख डैरियो अमोडेई ने एक लेख में सुझाव दिया है कि एआई पर सामूहिक रोक और संयम की जरूरत है। प्रमुख एआई लैब्स को एआई की क्षमता बेहतर बनाने की गति धीमी करना चाहिए। ओपनएआई के सैम आल्टमैन, दुनिया के सबसे अमीर शख्स और एक्सएआई के मालिक एलन मस्क का भी कहना है कि एआई मॉडलों की रफ्तार धीमी होनी चाहिए। माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला कहते हैं, एआई के बड़े मॉडलों को समाज की मदद और मानवीय नियंत्रण के सिद्धांतों से निर्देशित होना चाहिए। लेकिन इस वक्त सबसे कीमती टेक कंपनी एनवीडिया के सीईओ जेनसन हुआंग कहते हैं, एआई को नियंत्रित करने के लिए किसी नए कानून या नियमों की जरूरत नहीं है। उनका कहना है, नियंत्रण का काम बाजार की ताकतें करेंगी। हुआंग जोर देते हैं, तेजी से आगे बढ़ें लेकिन अगर किसी बिंदु पर लगता है कि कंपनी या उसके प्रोडक्ट काबू से बाहर जा रहे हैं तो ठहर जाइए और सुधार कीजिए।

कुछ टेक्नालॉजी कंपनियां एआई की गति को धीमी करने की बात तो करती हैं लेकिन वे निर्णायक कदम नहीं उठा रही हैं। दरअसल, उनका मुनाफा और बाजार मूल्य एआई पर बहुत हद तक निर्भर है। अलग-अलग कंपनियों ने सॉफ्टवेयर, सोशल मीडिया और एआई मॉडलों के दम पर अरबों रुपए कमाए हैं। इनका बाजार मूल्य कई देशों के जीडीपी से आगे है। इस समय एनवीडिया का बाजार मूल्य 5.35 लाख करोड़ रुपए, एपल 450 लाख करोड़ रुपए, गूगल 393 लाख करोड़ रुपए, माइक्रोसॉफ्ट 355 लाख करोड़ रुपए, अमेजन 266 लाख करोड़ रुपए और मेटा का मूल्य 158 लाख करोड़ रुपए है।

बड़ी टेक कंपनियां एआई पर काफी पैसा लगा रही हैं। अमेजन, गूगल, फेसबुक की मेटा और माइक्रोसॉफ्ट ने 2024-25 और 2025-26 में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और पूंजी खर्च के बतौर 95 लाख करोड़ रुपए लगाए हैं। ओपनएआई और एंथ्रोपिक में माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और जापान के सॉफ्ट बैंक ने निवेश किया है। लिहाजा,उनके लिए यह काम समेटना या धीमा करना मुश्किल नहीं है लेकिन कारोबार की होड़ उनके कदम रोकती है। निवेशक भी खुले हाथ से पैसा लगा रहे हैं। 2020 में निवेशकों ने रोबोटिक्स, स्पेस, क्वांटम कंप्यूटिंग में 2.1 लाख करोड़ रुपए लगाए थे। 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 8.6 लाख करोड़ रुपए हो गया है। ये सभी तकनीक एआई से जुड़ी हैं।

एआई की होड़ देशों और कंपनियों के बीच टेक्नालॉजी के कारण बढ़ती असमानता पर भी रोशनी डालती है। एआई में भारत सहित कई देशों की कंपनियां निवेश कर रही हैं। लेकिन, वे इनोवेशन में पीछे हैं। केवल फ्रांस की मिस्ट्रल अमेरिकी, चीनी कंपनियों का थोड़ा बहुत मुकाबला कर सकती है। इसी तरह एआई में बड़ी कंपनियों को ज्यादा कामयाबी मिली है। ओपनएआई और एंथ्रोपिक का आकार छोटा है पर वे इनोवेशन में अव्वल हैं। चीन की अलीबाबा, डीपसीक और जेडएआई जैसी कंपनियां अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले कम खर्च में एआई मॉडल बना रही हैं। एआई से साइंस, टेक्नालॉजी, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती जैसे क्षेत्रों में असीमित संभावनाओं के साथ देशों की सामरिक ताकत भी जुड़ी है। इसलिए अमेरिका, चीन की सरकारें रोक लगाने के विचार का सख्त विरोध कर रही हैंं।

टेक्नालॉजी से मानव की तरक्की से कोई इन्कार नहीं करता है। लेकिन उसके दुरुपयोग की आशंकाओं को खारिज भी नहीं कर सकते हैं। एआई को किनारे रख दें और सोशल मीडिया के प्रभाव को देख लें तो स्थिति समझी जा सकती है। सोशल मीडिया की लत युवाओं, किशोरों के साथ सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रही है। लेकिन, उस पर कारगर रोक किसी कंपनी ने नहीं लगाई है। कुछ सरकारों ने जरूर सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की पहल की है। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम आयु के लोगों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर कई तरह के नियंत्रण लगाए हैं। कुछ अन्य देश ऑस्ट्रेलिया के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। वहीं कंपनियों ने कोई कारगर कदम नहीं उठाए हैं।

सोशल मीडिया के अनुभव को देखते हुए टेक कंपनियों से अपनी तरफ से एआई पर पूरी तरह रोक लगाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। अलबत्ता, वे एआई मॉडलों की तेज रफ्तार को जरूर थाम सकती हैं। इतिहास के पन्नों को टटोलें तो हम पाते हैं कि कई बार मानवजाति को त्रासदियों और विनाश से बचाने के लिए असरदार पहल हुई है। 1975 में लगभग 150 वैज्ञानिकों ने कैलिफोर्निया, अमेरिका में मानव शरीर की मुख्य संरचना-डीएनए टेक्नालॉजी के नुकसानदेह परिणामों पर चर्चा की थी। उस वक्त आशंकाएं जताई गई थीं कि शरीर के किसी हिस्से से जेनेटिक मटीरियल डीएनए को निकालकर उससे दूसरे किस्म के अंग या जीव बनाए जा सकते हैं। इस पहलू पर रिसर्च को रोकने और जरूरी सुरक्षा उपाय करने के लिए निर्णायक कदम उठाए गए थे। इसलिए डीएनए से छेड़छाड़ के बड़े अभियान अब तक सामने नहीं आए हैं।

1942-47 के बीच मैनहटन प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका ने परमाणु बम का निर्माण किया था। 1945 में हिरोशिमा, नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए और लाखों लोग मारे गए थे। हिरोशिमा, नागासाकी की तबाही को आज तक याद किया जाता है। इसके बाद एटम बम के जनक साइंटिस्ट रॉबर्ट ओपेनहीमर ने अपनी घातक टेक्नालॉजी के इस्तेमाल पर नियंत्रण का आह्वान किया था। नतीजतन अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का गठन हुआ और परमाणु अप्रसार संधि अस्तित्व में आई। हालांकि परमाणु हथियारों का निर्माण जारी है। फिर भी, उसके भयावह परिणामों ने सभी देशों को अब तक तो स्वनियंत्रण में रखा है। कुछ ऐसा ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मामले में हो सकता है। जिन कंपनियों ने इस टेक्नालॉजी को आगे बढ़ाया है, उन्हें इस पर नियंत्रण के रास्ते और औजार खोजने होंगे। सरकारें खासकर अमेरिका और चीन की सरकारें निर्णायक कदम उठाएं तो अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। इन देशों से एआई से संपन्नता, वैज्ञानिक बढ़त और घातक हथियार बनाने की क्षमता जैसे फायदों को ताक पर रखकर मानवता के पक्ष में सोचने की अपेक्षा है। लेकिन, दुनिया पर दबदबा बनाने और अमीर बने रहने की महत्वाकांक्षा ऐसे लक्ष्यों के आड़े आती है।

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