ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार- 13
'अर्जुनसिंह 1957 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत विधानसभा में पहुंचे थे, लेकिन शीघ्र ही वे कांग्रेस में आ गए थे।;
'अर्जुनसिंह 1957 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत विधानसभा में पहुंचे थे, लेकिन शीघ्र ही वे कांग्रेस में आ गए थे। 1963 में डी पी मिश्र ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। इसके बाद उनका सितारा लगातार बुलंद होते गया। उनसे मेरा परिचय काफी बाद में हुआ, लेकिन जब वे सेठी मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री थे, तब दो-एक मौकों पर मैंने उनकी खुलकर आलोचना की थी। वे 1973 में मध्यप्रदेश एकीकृत विश्वविद्यालय अधिनियम लेकर आए जो मुझे पसंद नहीं आया। इस कानून के माध्यम से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का हनन हुआ, उनकी अपनी विशिष्ट पहचान निर्मित करने के अवसर समाप्त हुए, तथा वि वि के प्रशासन व उन्नयन में समाज की भूमिका सीमित कर दी गई। गो कि आगे चलकर श्री सिंह की इस सोच में परिवर्तन देखने मिला। 1973-74 में ही शिक्षामंत्री श्री सिंह रायपुर आए तो गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल के एक अध्यापक के सी दास ने उनकी शान में लच्छेदार भाषा में एक अभिनंदन पत्र लिखा जिसका किसी सरकारी कार्यक्रम में बाकायदा वाचन कर उन्हें भेंट किया गया। एक मंत्री की यह चापलूसी हमें नागवार गुजरी। हमने इसके खिलाफ संपादकीय लिखा और साथी प्रभाकर चौबे ने इस पर एक व्यंग्य लेख भी लिखा।Ó
(देशबन्धु में 3 सितंबर 2020 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2020/09/13.html