ललित सुरजन की कलम से कश्मीर: समाधान के लिए प्रतीक्षा
बाइस की उम्र पूरी करते न करते उन्हीं के हाथों मारा जाता है, ऐसी स्थिति कश्मीर घाटी में क्यों कर पैदा होती है?;
'बारह-चौदह साल के बच्चों को हाथ में पत्थर क्यों उठाना चाहिए? उनके हाथ में किताबें या गेंद क्यों नहीं हैं? एक नौजवान उन्नीस-बीस साल की उम्र में बंदूक चलाकर अपने कथित दुश्मनों की हत्या करता है और फिर बाइस की उम्र पूरी करते न करते उन्हीं के हाथों मारा जाता है, ऐसी स्थिति कश्मीर घाटी में क्यों कर पैदा होती है? लेकिन फिर इसी कश्मीर घाटी में वे नौजवान भी हैं जो सामान्य घरों से या शायद अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले घरों से आते हैं जो अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं और फिर डॉक्टर, इंजीनियर, सैन्य अधिकारी, टेस्ट क्रिकेट खिलाड़ी, यहां तक कि आईएएस अफसर भी बनते हैं। एक ही सांस्कृतिक, भौगोलिक परिवेश में ये दो अलग-अलग धाराएं कैसे बनती हैं और क्या इसमें कहीं जानने, समझने, सीखने के कोई बीज निहित हैं जिनकी ओर राजनीति के पंडितों का ध्यान अब तक नहीं गया है। अब तो यह समझना भी कठिन हो रहा है कि राजनीति मीडिया को किस हद तक प्रभावित कर रही है और मीडिया राजनीतिक विमर्श को कैसे आगे बढ़ा रहा है। ऐसा लगता है कि दोनों ही फैसला सुनाने के लिए धीरज नहीं रखना चाहते। सबको एक रंग से पोतो और छुट्टी पाओ।'
(देशबन्धु में 21 जुलाई 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/07/blog-post_20.html