ब्रिक्स : ग्लोबल साउथ की गूंज मजबूत
भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में हुए ब्रिक्स के 18वें शिखर सम्मेलन की गूंज क्या वर्ल्ड ऑर्डर में किसी बड़ी तब्दीली का संकेत दे रही है।;
- भाषा सिंह
ब्रिक्स देशों ने सम्मेलन में आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के साथ युद्ध, टैरिफ वार और प्रतिबंधों जैसी चुनौतियों पर बेहतर समझदारी विकसित की। बुनियादी तौर पर सहमति बनी कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे पर आने वाले संकटों में साथ देना चाहिए। ब्रिक्स में बड़ी आर्थिक ताकत बनने का दम-खम है और सम्मेलन में उसका रोडमैप सामने आया।
भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में हुए ब्रिक्स के 18वें शिखर सम्मेलन की गूंज क्या वर्ल्ड ऑर्डर में किसी बड़ी तब्दीली का संकेत दे रही है। सम्मेलन शुरू होने से पहले ही यह माना जा रहा था कि 11 सदस्य देश आपसी साझेदारी-व्यापार-अनुसंधान आदि पर सहमति तक पहुंचेंगे और अमेरिका के वर्चस्व को सीधी चुनौती देने से बचेंगे। लेकिन ब्रिक्स के देश इससे आगे युद्ध और अमेरिका के टैरिफ वार के खिलाफ कड़ा संदेश देने में सफल रहे।
इस सम्मेलन में भारत, चीन, रूस और ईरान ने युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक दबाव से दुनिया भर में आम लोगों का जीवन तबाह होने और सप्लाई चेन बाधित होने की बात कही। भारत ने मौजूदा वैश्विक संकट की नब्ज पर हाथ रखते हुए क्रिटिकल मिनरल्स को हथियार बनाए जाने पर चिंता जताई साथ ही आगाह किया कि दुनिया का कोई संकट एक क्षेत्र में नहीं रहता, यानी उसकी मार सब पर पड़ती है। यह सबका भुगता हुआ सच है, चाहे वह रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या फिर ईरान पर अमेरिका का हमला—दुनिया के हर देश ने इनके असर को झेला है। यही वजह है कि ब्रिक्स 2026 के घोषणापत्र में तनावों और युद्ध जैसी स्थितियों को परस्पर संवाद से सुलझाने की बात पर जोर दिया गया है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अबु धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद की ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हुई अलग बैठक भी बहुत चर्चा में रही। पश्चिम एशिया में गहरे तनाव के बीच दोनों नेताओं का एक मंच पर मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण था। दोनों ने तनाव घटाने, क्षेत्रीय स्थिरता और शांति की कोशिशों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। इस तरह ब्रिक्स सम्मेलन ने वर्ल्ड ऑर्डर को यह संदेश दिया कि वह परस्पर विरोधी हितों और तनावों के बीच भी संवाद का मंच बन सकता है।
ब्रिक्स की शक्ति विविधता और सहयोग में है और सम्मेलन ने इस दिशा में खासी उपलब्धि हासिल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक संकटों से मुकाबला करने के लिए लचीला रुख अख्तियार करने की बात की। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि बिना नियमों के दुनिया एक ऐसे चौराहे जैसी है जहां ट्रैफिक लाइट ने काम करना बंद कर दिया हो। अंतरराष्ट्रीय नियमों को लिखने में सभी देशों की साझेदारी होनी चाहिए। 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन के पास होगी, लिहाजा शी जिनपिंग का यह कहना कि ब्रिक्स को इतिहास के सही पक्ष में खड़ा होना चाहिए, आने वाले समय में इस प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका के बारे में संकेत देने वाला है।
ब्रिक्स घोषणापत्र 2026 में कहीं भी अमेरिका का नाम नहीं है, लेकिन उसके वर्चस्व को तगड़ी चुनौती दी गई है। खासतौर से टैरिफ वार और डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर जोर महत्वपूर्ण है। घोषणापत्र में सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को बेहतर बनाने और ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार तथा निवेश में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर चर्चा जारी रखने की बात कही गई है। ब्रिक्स के देश खासतौर पर अमेरिका के टैरिफ वार के निशाने पर रहे हैं—चाहे चीन हो या भारत या फिर रूस। सभी के लिए इस टैरिफ के डंडे से बाहर निकलने का रास्ता खोजना प्राथमिकता रही और 11-13 सितंबर को ब्रिक्स के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इस पर खूब चर्चा हुई।
भारत ने संतुलित रुख अख्तियार करने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन व ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से गर्मजोशी भरी मुलाकातें और साथ में पौधा लगाना अलग ढंग का राजनीतिक संदेश दे रहे थे। संदेश साफ है—ग्लोबल साउथ अपनी दावेदारी पेश कर रहा है और यह दुनिया को बहुधु्रवीय बनाने की दिशा में कदम है। घोषणापत्र के निशाने पर इज़रायल भी है और खुलकर गाजा में हो रही हिंसा-बर्बरता के खिलाफ बोला गया है—जो अपने आप में ऐतिहासिक है। घोषणापत्र में कहा गया है कि ब्रिक्स के देश तमाम पक्षों से यह आग्रह करते हैं कि वे गाजा में युद्धविराम का सम्मान करें। ब्रिक्स फिलिस्तीनियों को जबरन बाहर ढकेलने के खिलाफ है और दो राष्ट्रों के निर्माण की अवधारणा के समर्थन में है। इस तरह से ब्रिक्स के तमाम देशों का फिलिस्तीन के पक्ष में आना और इजरायल के खिलाफ बोलना एक मायने में अमेरिका के स्टैंड के खिलाफ बोलना है।
ब्रिक्स देशों ने सम्मेलन में आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के साथ युद्ध, टैरिफ वार और प्रतिबंधों जैसी चुनौतियों पर बेहतर समझदारी विकसित की। बुनियादी तौर पर सहमति बनी कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे पर आने वाले संकटों में साथ देना चाहिए। ब्रिक्स में बड़ी आर्थिक ताकत बनने का दम-खम है और सम्मेलन में उसका रोडमैप सामने आया।
ब्रिक्स की असली परीक्षा अब घोषणाओं में नहीं, उन्हें लागू करने में होगी। इसी कमजोरी को दूर करने के लिए भारत ने 'ब्रिक्स कंटिन्युटी एंड इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्मÓ का प्रस्ताव रखा है, ताकि हर साल अध्यक्ष बदलने के साथ पिछले फैसले ठंडे बस्ते में न चले जाएं। विश्व कूटनीति में अब ग्लोबल साउथ की धमक आने वाले दिनों में और ज्यादा मजबूत होगी और यह विश्व शांति के लिए भला होगा।
(लेखिका अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार हैं।)