झूठे आंकड़ों की गूंज!

अर्थव्यवस्था के दूसरे सभी मापदंड सरकार की ओर से बताए गए जीडीपी के इस दर की गवाही नहीं दे रहे हैं।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-15 21:13 GMT
  • शिवेश गर्ग

अर्थव्यवस्था के दूसरे सभी मापदंड सरकार की ओर से बताए गए जीडीपी के इस दर की गवाही नहीं दे रहे हैं। अगर रोजगार और निवेश जैसे दो अहम मापदंडों की बात करें तो जब अर्थव्यवस्था इतनी तेज गति से आगे बढ़ रही है तो मुल्क में गुणवत्ता वाली अच्छी नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही है। मुल्क में बेरोजगारी की दर आज चरम पर है। और न ही विदेशी और निजी निवेश में कोई बढ़ोतरी दर्ज की गयी है।

तो क्या यह महज संयोग की बात है मोदी सरकार जो भी आंकड़े लेकर आ रही है वह सवालों के घेरे में आ जा रहा है। चंदा चोरी और कॉकरोच आंदोलन के बरअक्स लगातार फजीहत झेलने के बाद अभी चार दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आंखें चमका-चमका कर भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़े जीडीपी के आंकड़े मुल्क को ऐसे बतला रहे थे गोया उन्हें कोई जादुई चिराग हाथ लग गया हो।

सरकार की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में भारत की जीडीपी बढ़ोतरी दर 7.8 प्रतिशत रही। यों तो चींटी जैसे छोटे प्राणी को छोड़कर तिनका कभी किसी डूबते के लिए सहारा नहीं बन सकता। मगर प्रधानमंत्री इस आंकड़े को लेकर जिस अंदाज में इंस्टाग्राम वीडियो जारी कर जब मुल्क को संबोधित कर रहे थे तब तो ऐसा ही लगा जैसे किसी डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंस्टाग्राम वीडियो में कहा कि- दुनिया, युद्ध-संकट, सप्लाई चेन में बाधा और कोविड के बाद की आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही है, लेकिन इन परिस्थितियों के बावजूद भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। साथ ही उन्होंने मुल्क की जनता को विदेश यात्रा न करने और सोना खरीदने की फिर से नसीहत दी। इस मौके पर भी वे गांधी परिवार और खासतौर से राहुल गांधी को लेकर अपनी परंपरागत कुंठा को छिपा नहीं सके। उन्होंने 'निराशा फैलाने वालोंÓ और 'झूठ की गूंज' जैसे जुमलों को इस्तेमाल किया जो सीधे तौर पर कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी की ओर इशारा था।

वैसे, प्रधानमंत्री का इंस्टाग्राम वाला यह बयान इस मायने में भी विरोधाभासी है कि अगर मुल्क इस रफ्तार से तरक्की कर रही है, तो आखिर मुल्क की जनता को विदेश भ्रमण न करने और सोना न खरीदने की नसीहत क्यों दी जा रही है। जाहिर है जीडीपी को लेकर सरकार की ओर से जो ताजा आंकड़े पेश किए गए हैं, वे झूठे हैं। इन झूठे आंकड़ों पर सबसे वाजिब सवाल उठाया है पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पहेल जीडीपी करीब 86.05 लाख करोड़ बतायी गई थी, लेकिन नए वित्त-वर्ष की उसी तिमाही का यह आंकड़ा घटकर तकरीबन 80 लाख करोड़ रह गया है यानि करीब 6 लाख करोड़ से ज्याद का ही अंतर है। सुभाष गर्ग के मुताबिक यह आंकड़ा असल में 2.6 प्रतिशत का है। उनका मौलिक सवाल है कि पिछले साल के आंकड़ों में इतना बड़ा संशोधन क्यों हुआ और इसका मौजूदा बढ़ोतरी दर पर क्या असर पड़ा?

एक पुरानी कहावत है कि झूठ तीन प्रकार के होते हैं- झूठ, सफेद झूठ और आंकड़े। असल में यह बाजीगरी जीडीपी के गणना के तरीके के साथ की गयी है। सवाल है कि जिस तरीके से सरकार ने जीडीपी की गणना की है क्या वह मुल्क की सभी आर्थिक गतिविधियों को समाहित कर पाया है?

अर्थव्यवस्था के दूसरे सभी मापदंड सरकार की ओर से बताए गए जीडीपी के इस दर की गवाही नहीं दे रहे हैं। अगर रोजगार और निवेश जैसे दो अहम मापदंडों की बात करें तो जब अर्थव्यवस्था इतनी तेज गति से आगे बढ़ रही है तो मुल्क में गुणवत्ता वाली अच्छी नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही है। मुल्क में बेरोजगारी की दर आज चरम पर है। और न ही विदेशी और निजी निवेश में कोई बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। असंगठित क्षेत्र तकरीबन बर्बादी के कगार पर पहुंच चुका है। मोदी सरकार की ओर से असंगठित क्षेत्र को दिए गए नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना महामारी जैसे तमाम झटकों के बावजूद आज भी मुल्क मे तकरीबन 85 फीसदी से अधिक रोजगार असंगठित क्षेत्र ही पैदा करता है।

जानकारों का मानना है कि जब अर्थव्यवस्था को लगातार इस तरह के गैरवाजिब झटकों का समाना करना पड़ा हो, संगठित क्षेत्र के संकेतकों के आधार पर असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का अनुमान करना आंकड़ों की बाजीगरी ही है। बहरहाल, दूसरी ओर जिस चीज में तेजी से बढ़ोतरी हुई है वह आवश्यक वस्तुओं की महंगाई है। बीते दिनों में दूध, चीनी, प्याज और अंडे की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। चीन 56 रुपये के बढ़कर 62 रुपये तक आ गई है। दूध की कीमत अब 93 रुपये से बढ़कर 102 रुपये पहुंच गई है। बीत दिनों में जिन आवश्यक चीजों में बढ़ोतरी हुई है अगर यहां सबका जिक्र किया जाने लगे तो काफी कागद कारे करने पड़ेंगे।

मुद्दे की बात है कि मुल्क में जनता तबाह और परेशान है। बनारस में विकास बता रहा है कि वह और उसका घर डूब रहा है और मुल्क के प्रधानमंत्री बतला रहे हैं कि चारों ओर खुशियां ही खुशियां ही फैल रही है। कहीं प्रधानमंत्री उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के खुशियों की तो बात नहीं कर रहे हैं। फिलहाल तो सरकार की ओर से जीडीपी से जुड़े आंकड़ों की जो गूंज पैदा की गई है- वह झूठे हैं।

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