पत्रकारिता के पतन और उम्मीद के बीच झूलता देश
कॉकरोच जनता पार्टी बनाकर अभिजित दिपके किस तरह मोदी सरकार को परेशान कर चुके हैं, यह जंतर-मंतर आंदोलन ने दिखा दिया है।;
- सर्वमित्रा सुरजन
हाल ही में बालाघाट जिले में दूषित पानी के कारण कम से कम 30 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है। इस मामले को कांग्रेस तो जोर-शोर से उठा ही रही है, वहीं स्कूल ठीक करो अभियान चलाने वाले अभिजित दिपके भी बीते दिनों बालाघाट पहुंचे। कॉकरोच जनता पार्टी बनाकर अभिजित दिपके किस तरह मोदी सरकार को परेशान कर चुके हैं, यह जंतर-मंतर आंदोलन ने दिखा दिया है। इसके बाद अभिजित दिपके और सीजेपी से जुड़े लोग देश भर में अलग-अलग जगहों पर पहुंच कर स्कूलों की बदहाली पर सवाल उठा रहे हैं।
कानों सुनी पर यकीन करें न करें, लेकिन आंखों देखी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा। इसलिए देश की बड़ी समाचार एजेंसी एएनआई ने कहा नहीं दिखाया है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शिरकत के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच कितने सेकंड का हाथ मिलाकर अभिवादन हुआ। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एएनआई ने सितार और तबले की सुमधुर धुन के साथ डिजीटल घड़ी में समय चलते दिखाया है कि एक-दो नहीं पूरे 18 सेंकड तक मोदी और जिनपिंग हाथ मिलाते रहे। अच्छा हुआ 2014 में जब गुजरात में शी जिनपिंग के साथ नरेन्द्र मोदी ने झूला झूला था, तब एएनआई ने ये हरकत नहीं की, वर्ना पत्रकारिता के नाम पर यह जानकारी भी जनता को दी जाती कि झूला कितनी बार ऊपर गया, कितनी बार नीचे आया और कितने मिनट मोदी और जिनपिंग झूलते रहे।
इससे पहले बाकी गोदी मीडिया भी ऐसी ही फिजूल जानकारियां पत्रकारिता के नाम पर परोसता रहा है, इसलिए जनता के हित से जुड़े असल मुद्दों पर चर्चा को छोड़कर आम चूस के खाते हैं या काट कर, मोदी कितने घंटे सोते हैं, थकते क्यों नहीं- जैसे सवाल उनके एक्सक्लूसिव इंटरव्यू का हिस्सा बनते हैं। जब पत्रकार ऐसे हो चुके हैं तभी तो प्रधानमंत्री खुद को नॉन बायलॉजिकल कहने का दुस्साहस भी करते हैं। दो साल पहले चुनावों से पहले मोदी ने अपने में ईश्वरीय अंश बताने वाला बेतुका बयान दिया था और इस पर कोई प्रतिप्रश्न नहीं हुआ, तब लगा कि पत्रकारिता का पूरी तरह पतन हो चुका है। लेकिन अब एएनआई समेत कई चैनलों के पत्रकारों ने इस धारणा को तोड़ा है। अभी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ही मुफ्त की चीजें पाकर गदगद हुए पत्रकारों ने वीडियो बनाकर दिखाया कि उन्हें सरकार ने सम्मेलन की रिपोर्टिंग के लिए कौन-कौन सी चीजें बैग में भरकर दी हैं। एक अच्छा सा लैपटॉप बैग, उसके भीतर बढ़िया बोतल, मखाना, बटुआ ऐसी चीजें एक पत्रकार ने अपने वीडियो में दिखाईं और आखिर में दिखाया कि हां पत्रकार हैं तो पेन और डायरी भी मिली है। गनीमत है कि उन्हें याद रहा कि वो पत्रकार हैं तो पेन और डायरी की अहमियत है। हालांकि अब मोबाइल से भी सारे काम हो जाते हैं। पर पत्रकार ये सवाल खुलकर तो नहीं कर सकते कि नया मोबाइल ही सरकार ने क्यों नहीं दे दिया।
बैग समेत सारा सामान मान लें कि 10-15 हजार रुपए का हुआ, तब भी सरकार के लिए यह बहुत सस्ता सौदा है, जिसमें वो अब पत्रकारों से वही सब लिखवा और कहलवा सकती है जो वो चाहती है। इसलिए ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक महत्व के आयोजन में यही चर्चा हुई कि मोदी ने जिनपिंग से कितनी देर हाथ मिलाया और पुतिन को कैसे हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा। बाकी देश के लिए इस सम्मेलन का क्या हासिल रहा, या इसका भविष्य में क्या असर दिखेगा, इन बातों पर बहुतेरे पत्रकारों ने ध्यान देना छोड़ दिया है। जो पत्रकार ध्यान देते हैं, उन्हें वैसे ही परेशान किया जाता है, जैसे लखनऊ में दिव्या श्रीवास्तव को किया गया।
जी हां योगी आदित्यनाथ के साथ बिल्कुल नरेन्द्र मोदी वाला हाल हुआ। नॉर्वे में पत्रकार हेले लिंग ने प्रेस को संबोधित करने आए नरेन्द्र मोदी से पूछा था कि- आप पत्रकारों के सवालों का सामना क्यों नहीं करते और मोदी बिना जवाब दिए उठ कर चले गए थे। अब लखनऊ में योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ही एक प्रेस वार्ता को संबोधित किया और फिर उनके सहयोगी ने कहा कि पत्रकार अब जलपान के लिए आमंत्रित हैं, तो दिव्या श्रीवास्तव नाम की पत्रकार ने कहा कि आपने प्रेस वार्ता बुलाई है तो सवाल क्यों नहीं करने देते। लेकिन योगी बिना जवाब दिए उठ कर चले गए। लेकिन इसके बाद अब दिव्या श्रीवास्तव को पत्रकारिता का धर्म निभाने की सजा भुगतनी पड़ रही है। जिस संस्थान में वे कार्यरत थीं, बताया जा रहा है कि उन्हें वहां से निकाल दिया गया है। उनके घर पुलिस पूछताछ करने पहुंच गई। इसके अलावा सोशल मीडिया पर धमकियों और ट्रोलिंग का सिलसिला भी शुरु हो गया। हेले लिंग के साथ भी भारतीय मीडिया के ही कुछ पत्रकारों समेत भाजपा से जुड़े लोगों ने यही व्यवहार किया था और अब दिव्या श्रीवास्तव को सत्ता से सवाल पूछने के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है।
सरकार ऐसे ही हथकंडों से अपने विकास की गाथाएं सुनाती है। अभी उत्तरप्रदेश में चुनाव हैं, तो फिर से पत्रकारों को 10-15 हजार के सामान के साथ कलम थमाकर याद दिलाया जाएगा कि तुम पत्रकार तो हो, लेकिन भलाई इसी में है कि सरकार के पालतू बने रहो। वैसे योगी मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार का तरीका भी अपना सकते हैं। यहां यादव सरकार पर आरोप हैं कि कुछ यूट्यूबर्स को अपने पक्ष में बोलने के लिए सरकार ने तैयार कर लिया है, जो अब उन पत्रकारों पर या लोगों पर निशाना साधते हैं जो मोहन यादव सरकार पर ऊंगली उठाते हैं। हाल ही में बालाघाट जिले में दूषित पानी के कारण कम से कम 30 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है। इस मामले को कांग्रेस तो जोर-शोर से उठा ही रही है, वहीं स्कूल ठीक करो अभियान चलाने वाले अभिजित दिपके भी बीते दिनों बालाघाट पहुंचे। कॉकरोच जनता पार्टी बनाकर अभिजित दिपके किस तरह मोदी सरकार को परेशान कर चुके हैं, यह जंतर-मंतर आंदोलन ने दिखा दिया है।
इसके बाद अभिजित दिपके और सीजेपी से जुड़े लोग देश भर में अलग-अलग जगहों पर पहुंच कर स्कूलों की बदहाली पर सवाल उठा रहे हैं और सरकारों को जिम्मेदारी निभाने कह रहे हैं। लोकतंत्र में ऐसे अभियानों पर आपत्ति का कोई कारण नहीं है, क्योंकि कोई संस्था हो या व्यक्ति, हर किसी को आवाज उठाने और सवाल पूछने का हक है। लेकिन अभिजित दिपके जब बालाघाट पहुंचे तो वहां उन्हें कई तथाकथित स्वतंत्र पत्रकारों ने घेर लिया और तंज कसने लगे कि आ गए लाशों पर राजनीति करने। दिपके से ऐसे सवाल करने वाले बेचारे माइकधारियों को पता ही नहीं कि कॉकरोच जनता पार्टी कोई पंजीकृत राजनैतिक दल नहीं है, न ही अब तक दिपके ने अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता किसी दल के साथ दिखाई है। तो वो लाशों पर राजनीति कैसे करेंगे। जहां तक सवाल पत्रकारों का है, तो अगर वे वाकई पत्रकार होते तो खुद दिपके के साथ इस बात की तह में जाने की कोशिश करते कि आखिर क्यों बच्चों को दूषित पानी पीने पर मजबूर होना पड़ा। अगर एक बच्चे की भी अकाल मौत होती है तो उस पर समूचे तंत्र को दहल उठना चाहिए कि आखिर कैसी सरकार और प्रशासन है जो मासूम बच्चे को न बचा सका, लेकिन यहां 30 से ज्यादा बच्चे मर गए और मीडिया को आपस में ही भिड़ाने का खेल सरकार ने रच दिया।
लेकिन बालाघाट में भी पत्रकार माधुरी कटरे ने अपने तर्कों से जनसंपर्क विभाग की पोल खोल दी। उन्होंने कहा कि जनसंपर्क विभाग स्थानीय पत्रकारों और ज़िले के बाहर से आए इन्फ्लुएंसर्स के बीच एक 'पुल' की तरह काम करने में नाकाम रहा। उन्होंने सरकार के 'पक्षपाती रवैये' की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने राष्ट्रीय मीडिया को उस अस्पताल में जाने दिया जहां आदिवासी बच्चों का इलाज चल रहा था, लेकिन जब बालाघाट के पत्रकारों ने अंदर जाने की कोशिश की तो दरवाज़े बंद कर दिए गए। माधुरी कटरे ने साफ कहा कि हमारा भी 20-22 साल का करियर है। हमने कभी किसी के चेहरे पर कैमरा लगाकर यह नहीं कहा कि आप मौतों पर राजनीति कर रहे हैं।
गौरतलब है कि मोहन यादव सरकार बालाघाट में बच्चों की मौत के मामले में बुरी तरह फंस रही है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार से उस इलाके में 30 से ज़्यादा बच्चों की मौत के मामले में जवाब मांगा है। कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट कलेक्टर और अन्य को नोटिस जारी किए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया कि बच्चों को सही इलाज नहीं मिल रहा था और सिफ़र् 50 बिस्तर की क्षमता वाले अस्पताल में लगभग 400 बच्चों का इलाज किया जा रहा था। अब माधुरी कटरे की टिप्पणियों ने इस विवाद में एक नया पहलू जोड़ दिया है, जिससे इस मामले की रिपोर्टिंग में ज़िला प्रशासन, स्थानीय पत्रकारों और बाहरी प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि आरोप यही है कि मोहन यादव सरकार ने अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए पत्रकारों के नाम पर इंफ्लुएंसर्स को रख लिया है।
माधुरी कटरे और दिव्या श्रीवास्तव जैसी पत्रकार हैं तो उम्मीद बची हुई है कि कलम की ताकत बची रहेगी, बाकी बड़े मीडिया संस्थान तो मोदी के हाथ मिलाने का वक्त ही गिनने में लगे हैं।