पैसा देंगे गाड़ीवाले तो पैदल वालों को कौन पूछे?
पैदल अगर हमारे मुहावरों और लोकोक्तियों तक में कमजोर और घटिया जैसे अर्थों में आ गया है तब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैदल चलने को मौलिक अधिकार घोषित करना और आने-जाने की आजादी से जोड़ना काफी महत्व का है।;
कार वालों और दूसरे वाहन वालों का नजरिया भी सड़क पर होने वाली इन मौत के आंकड़ों से झलकता है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब ही नहीं आम लोगों को काकरोच समझने वालों की पूरी फौज है जिसका आचरण भी इन आंकड़ों के जरिए समझ आता है। सड़क सुरक्षा का खयाल रखना सरकार का काम है लेकिन हमारी जिम्मेदारी उससे खत्म नहीं होती।
पैदल अगर हमारे मुहावरों और लोकोक्तियों तक में कमजोर और घटिया जैसे अर्थों में आ गया है तब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैदल चलने को मौलिक अधिकार घोषित करना और आने-जाने की आजादी से जोड़ना काफी महत्व का है। अब इसका व्यावहारिक अर्थ क्या निकलता है और सरकार की नीतियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है इस बारे में अभी कुछ भी कहना मुश्किल है? क्योंकि अदालत ने भले एक पांच साल के बच्चे की मौत के सवाल को यहां तक पहुंचाया है लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में पैदल यात्रियों के मारे जाने के जो आंकड़े खुद सरकार के दस्तावेज बताते हैं उनके अनुसार ज्यादातर दुर्घटनाएं सड़क सुरक्षा संबंधी कायदे कानून के न लागू हो पाने के चलते है। और ये आंकड़े डरावने हैं- पांच साल में 1.8 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवा चुके हैं। आंकड़े 2019 से 2024 के बीच के हैं और 2024 में 36326 लोगों के मरने की बात सरकार ही स्वीकारती है। इसे थोड़ा और सरल करना चाहें तो प्रति 15 मिनट में किसी न किसी की जान जाने का अनुमान सामने आएगा। इसमें भी कथित राष्ट्रीय राजमार्ग पर मरने वाले सबसे ज्यादा हैं और देहात में कम।
जरा और भी बारीकी में जाएंगे तो समझ आएगा कि सबसे ज्यादा सुरक्षित सफर विमान यात्रा है और सबसे असुरक्षित पैदल और उसके बाद साइकिल की सवारी है। पूरी इंद्रियों के सचेत रहते और गियर-ब्रेक का संचालन सीधे दिमाग से होने के बावजूद हजारों लोगों का दिमाग सड़क पार करते समय काम नहीं कर पाता। तभी उनकी मौत आती है। आखिर खुद से कौन मारना चाहता होगा। वैसे आधुनिक सड़कों का लोकतंत्र भी अद्भुत है- इसमें बीच की जगह तो सबसे तेज और आरामदायक वाहनों के लिए 'रिजर्वÓ है। रिक्शा और टमटम का नंबर उससे किनारे और पैदल वालों का सबसे किनारे जहां पैर रखने का व्यवस्थित इंतजाम ही नहीं रहता। और जहां इंतजाम होता है बेकार और भूखे लोगों की जमात वहां दूकान लगाने पहुंच जाती है। अगर बुलडोजर चलता भी है तो फुटपाथ सफाई के नाम पर। आज पीपीपी माडल में जो सड़कें बन रही हैं, जिनका जोर उदारीकरण वाले दौर में और अटल जी की सरकार के समय से ज्यादा बढ़ा है, उनमें फुटपाथ नामक चीज है ही नहीं। फ्लाईओवर और डबल-ट्रिपल डेकर सड़कों पर तो पैदल ही क्यों साइकिल और मोटरसाइकिल की भी मनाही है। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि पैदल चलने वालों की मौत के 30 फीसदी नेशनल हाईवे पर हुई दुर्घटनाओं के हैं, चलने के चलते कम, सड़क पार करने के क्रम में अधिक।
ये हाईवे भी कमाल की चीज हैं और इनके कार्यव्यापार पर अदालत और प्रबुद्ध समाज की नजर नहीं जाती। इनमें उन सभी वाहनों से सड़क पर चलाने का मोटा भाड़ा वसूला जाता है जो खरीद के समय ही काफी मोटी रकम रोड टैक्स के रूप में चुका चुकी होती हैं। जगह-जगह स्थानीय ग्रामीण समाज से तो टोल के विरोध की खबर आती है लेकिन फर्राटे भरने वाले उच्च और मध्यवर्गीय कार वालों से कभी कोई शिकायत नहीं आती। यह जमात भूमंडलीकरण के दौर में ज्यादा तेजी से बड़ा हुआ है लेकिन कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा है। और इसकी मर्दानगी या न्यायप्रियता का अंदाजा तब लगा जब सरकार ने एक साथ लाखों गाड़ियों को प्रदूषण के नाम पर स्क्रेप करा दिया। इनमें वे गाड़ियां भी थीं जिनके रोड टैक्स अगले कई साल के लिए सरकार ने वसूल रखे थे। पर शायद ही कहीं से चूं की आवाज आई या इन्हीं अदालतों ने सुगबुगाहट दिखाई। जब ये सक्रिय हुए तब तक सिर्फ एनसीआर से सत्तर लाख से ज्यादा गाड़ियां कबाड़ घोषित हो चुकी थी। कहना न होगा कि कार कंपनियां मालामाल हो गईं क्योंकि इतने नए ग्राहक मिल गए। इसलिए यह नतीजा निकालना मुश्किल है कि सरकार को किसकी चिंता है- पैदल यात्रियों की तो नहीं ही है।
कार वालों और दूसरे वाहन वालों का नजरिया भी सड़क पर होने वाली इन मौत के आंकड़ों से झलकता है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब ही नहीं आम लोगों को काकरोच समझने वालों की पूरी फौज है जिसका आचरण भी इन आंकड़ों के जरिए समझ आता है। सड़क सुरक्षा का खयाल रखना सरकार का काम है लेकिन हमारी जिम्मेदारी उससे खत्म नहीं होती। और हमें बीएमडब्ल्यू के जरिए फुटपाथ पर सोये लोगों को रौंदने की आजादी नहीं मिल जाती। सरकार अगर सड़क और फ्लाईओवर के नक्शे में पैदल चलने वालों की जगह नहीं रखती, नगर निगम अगर फुटपाथ खाली नहीं रखवाकर वहां के पटरीवालों से वसूली करता है (वैध और अवैध दोनों तरह से) तो यह उनका दोष है लेकिन हम भी जेब्रा क्रासिंग और ब्रेकर का कितना सम्मान करते हैं। सड़क पार करते बुजुर्ग, लरकोरी औरत, बोझ उठाकर चलने वाले पदयात्री या रेड लाइट का कितना सम्मान करते हैं उसके आंकड़े और प्रत्यक्ष अनुभव यह बताता है कि सड़क बनाकर कुछ कंपनियों की लूट का राज कायम हुआ है, अंतरराष्ट्रीय वाहन कंपनियों को खुली छूट दी गई है तो साथ-साथ हमारा नजरिया भी बदला है। सड़क पर सबवे या फुटओवर ब्रिज के जरिए बुजुर्ग, लरकोरी, बच्चे और भार उठाए व्यक्ति को भेजने की जगह इंजन वाले वाहनों को ऊपर नीचे चलाने वाली व्यवस्था तो सरकार और ये बड़ी ट्रांसपोर्ट वाली कंपनियां नहीं चलने दे रही हैं लेकिन हम भी अपने कर्तव्य भूल रहे हैं। वैसे हिट एंड रन मामले में गुजरात का आगे होना यह बताता है कि देश जिस गुजरात माडल का विकास चाहता है उसकी सच्चाई क्या है?
याद नहीं आता कि विश्व गुरु वाली चर्चा में यह कभी जिक्र भी होता होगा कि पुराने समय के यातायात नियम क्या थे। बहुत स्पष्ट ढंग से यह बताया गया है कि पतली सड़क या पगडंडी पर भी चलने का नियम क्या होना चाहिए। इसमें राजा के लिए रास्ता छोड़ने का नियम है तो राजा के लिए भी किसी बुजुर्ग, बीमार या भार लेकर आते यात्री के लिए रास्ता छोड़ने का नियम है। गर्भवती औरत के लिए तो हर किसी के सड़क की जगह छोड़ने का कायदा था। बाजार और उसकी संचालक शक्तियों की परिभाषा में जो आदमी महंगी खरीद न करे, ज्यादा उपभोग न करे उन सबको सम्मान देना तो दूर आदमी न गिनना ही कायदा बन गया है। जो कंज्यूमर नहीं है वह आदमी नहीं है। और सरकारों के लिए भी टैक्स न देने वालों या कम टैक्स देने वालों का हिसाब बहुत महत्व नहीं है। वे तो पांच किलो राशन पर पट सकने वाले वॉटर भर है और यही नजरिया जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के बयान से झलकता है तो कोई काकरोच पार्टी बना लेता है यही अभी तक बचा है। इस जमात के अंदर इतना भी आत्मसम्मान बचा हुआ तो सरकार डरती है पर अदालती फैसले से भी ऐसा डर होगा, इतना बड़ा और निर्णायक निर्णय कुछ करा पाएगा, इसका भरोसा कम ही रह गया है।