मंगल मिलन में तिरंगा और भागवत कथा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद को राजनैतिक प्रहसन के मंच में तब्दील करने में लगातार लगे हुए हैं।;
भाजपानीत मोदी सरकार के आने से पहले भी तिरंगा लहराना हमेशा ही गौरव का विषय रहता आया है। केंद्र में चाहे कांग्रेस सरकार रही हो या गैरकांग्रेस सरकार, तिरंगा कभी राजनीति करने का मकसद नहीं बना। न ही स्वतंत्रता सेनानियों पर मेरे या तेरे का ठप्पा लगाया गया। राजनैतिक दल एक-दूसरे से विचारधारा के आधार पर भिड़ते रहे, भ्रष्टाचार, दल-बदल आदि के नाम पर परस्पर उलझते रहे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद को राजनैतिक प्रहसन के मंच में तब्दील करने में लगातार लगे हुए हैं। इन दिनों उन्होंने एक नया प्रहसन हर मंगलवार को करना शुरु किया है, एनडीए सांसदों के साथ मंगल मिलन। आजकल यह चलन खत्म हो गया है कि लेकिन पहले अखबारों में नवविवाहित जोड़े के लिए मंगल मिलन या मंगल परिणय या मंगलमय हो मिलन तुम्हारा इस तरह के शीर्षक के साथ विज्ञापन प्रकाशित होते थे और नवविवाहितों को बधाई, शुभकामनाएं, आशीर्वाद दिया जाता था। अब प्रधानमंत्री मोदी न जाने किसकी बधाई और शुभकामनाएं लेने के लिए मंगल मिलन कार्यक्रम आयोजित करते हैं। एनडीए के तमाम घटक दल भी बिना हूं-चूं किए इस मिलन समारोह का हिस्सा बनते हैं, मानो भाजपा की विचारधारा और सोच ही अब इन तमाम दलों ने अपना ली है और अपना स्वतंत्र वजूद खत्म कर लिया है। इस बार मंगलमिलन में प्रधानमंत्री ने तमाम सांसदों के हाथों में तिरंगा पकड़ा दिया, और खुद सबसे आगे घूम-घूम कर उस तिरंगे को लहराते दिखे। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता मिली थी, उस समय मोदी दक्षिण अफ्रीका से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े थे और इसरो के वैज्ञानिकों को उन्होंने बधाई दी थी, तब भी हाथ में तिरंगा लेकर वे उसे लहराते नजर आए थे।
मंगलवार को ही अपने नए इंस्टाग्राम संदेश में नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से 'हर घर तिरंगाÓ अभियान को हर घर में उत्सव के रूप में मनाने की अपील की। मोदी ने अपने संदेश में कहा 'आइए, हर घर तिरंगा को हर घर में एक उत्सव बनाएं।'
पाठक जानते हैं कि 2022 से ही 'हर घर तिरंगा' अभियान की शुरुआत मोदी सरकार ने की थी। भारत की आजादी के 75वें वर्ष जिसे आजादी का अमृत महोत्सव कहा गया, उस अवसर पर भाजपा सरकार ने देश भर में इस अभियान की शुरुआत की थी। 2022 से अब हर साल 'हर घर तिरंगाÓ अभियान पूरे अगस्त महीने में चलाया जाता है। लोगों को अपने घरों, दुकानों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। सरकार बताती है कि इस अभियान का उद्देश्य केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के भीतर राष्ट्रीय ध्वज के प्रति गर्व और जुड़ाव की भावना को मजबूत करना भी है।
हालांकि भाजपानीत मोदी सरकार के आने से पहले भी तिरंगा लहराना हमेशा ही गौरव का विषय रहता आया है। केंद्र में चाहे कांग्रेस सरकार रही हो या गैरकांग्रेस सरकार, तिरंगा कभी राजनीति करने का मकसद नहीं बना। न ही स्वतंत्रता सेनानियों पर मेरे या तेरे का ठप्पा लगाया गया। राजनैतिक दल एक-दूसरे से विचारधारा के आधार पर भिड़ते रहे, भ्रष्टाचार, दल-बदल आदि के नाम पर परस्पर उलझते रहे। मगर आजादी के महानायकों को अपनी लड़ाई का हिस्सा किसी ने नहीं बनाया, न ही तिरंगे पर अपना अघोषित दावा ठोंका।
लेकिन मोदी सरकार में ऐसा ही हो रहा है। पहले सरदार पटेल पर अपना हक जताने के लिए नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में उनकी आकाश छूती प्रतिमा बनाई और 2014 से 31 अक्टूबर को उनकी जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाने की शुरुआत की। भाजपा से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या इससे पहले देश में एकता उन्हें नजर नहीं आ रही थी। पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर, पंजाब कई जगहों पर आजादी के बाद से अलगाववादी गतिविधियां पनपीं, जिनका फायदा राष्ट्रविरोधी ताकतों ने उठाने की कोशिश की, लेकिन तब भी बिना राष्ट्रीय एकता दिवस के ही राष्ट्र में एकता बनी रही। लेकिन मोदी सरकार में तथाकथित एकता के नाम पर कहीं मुसलमानों को पाकिस्तान जाने की घुड़कियां मिलती हैं, कहीं मणिपुर में जातीय संघर्ष की आग सुलगती है। इस समय अरुणाचल प्रदेश से लगातार खबरें आ रही हैं कि चीन वहां काफी आगे तक आकर अपना कब्जा जमा चुका है। एक युवक ने तो साफ कहा कि इंडिया को अब अलविदा कहना होगा, क्योंकि जल्द हम चीन का हिस्सा कहलाएंगे। विदेश मंत्रालय कह रहा है कि चीन का दावा स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इतने संवेदनशील मसले पर खुद प्रधानमंत्री मोदी आकर देश को आश्वस्त क्यों नहीं करते कि अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं से चीन को पूरी तरह दूर रखा जाएगा। इसके लिए भी एकाध इंस्टाग्राम रील बना देंगे तो उनका ही काम आसान होगा।
लेकिन नरेन्द्र मोदी केवल मतलब साधने के लिए राष्ट्रवादी होने और दिखाने का आह्वान करते हैं, यह साफ नजर आ रहा है। इसलिए संसद सत्र में सदन में न जाकर वे एनडीए सांसदों के साथ तिरंगा लहरा रहे हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि वे एनडीए के नहीं देश के प्रधानमंत्री हैं। 15 अगस्त को लालकिले पर चढ़कर वही तिरंगा फहराएंगे। इससे पहले उन्हें तिरंगा लहराने का मन था तो दोनों सदनों में जाते और सारे सांसदों को तिरंगा थमाते, यकीन है कि कोई भी तिरंगा थामने और उसे लहराने से इंकार तो नहीं करता। लेकिन ऐसा दिखाई दे रहा है कि मोदी तिरंगे को भाजपा के राजनैतिक लाभ और खोखले राष्ट्रवाद के मकसद के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए चिंता होती है कि देश किन हाथों में है, जो राष्ट्रभक्ति का भी सौदा करने से हिचकते नहीं।
नरेन्द्र मोदी के हर घर तिरंगा अभियान के पीछे शायद यह कुंठा भी हो सकती है कि उनके राजनैतिक पुरखों यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की मदद की और जब आजादी मिल गई तब भी तिरंगे की अवहेलना ही की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र 'द ऑर्गेनाइजरÓ के जुलाई-अगस्त 1947 के संपादकीय और लेखों में तिरंगे को लेकर आपत्ति जताई गई थी। पत्र में लिखा गया था कि 'संख्या तीन अपने आप में एक बुराई/अशुभ है और तीन रंगों वाला झंडा देश के लिए हानिकारक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करेगा। संघ ने तिरंगे के बजाय पारंपरिक 'भगवा ध्वजÓ को देश का राष्ट्रीय ध्वज बनाने की वकालत की थी। यह तथ्य है कि नागपुर में संघ मुख्यालय में आजादी के 52 सालों तक तिरंगा नहीं फहराया गया। 26 जनवरी 2001 को 'राष्ट्रप्रेमी युवा दलÓ के संस्थापक बाबा मेंढे और उनके साथियों ने संघ मुख्यालय पहुंचकर वहां तिरंगा फहराया था। तब संघ की शिकायत पर उन युवकों के खिलाफ अनधिकृत प्रवेश और अन्य धाराओं के तहत पुलिस में मामला दर्ज किया गया था। यह मामला लगभग 13 साल तक चला। अगस्त 2013 में नागपुर की एक अदालत (प्रथम श्रेणी न्यायाधीश आर.आर. लोहिया) ने तीनों आरोपियों—बाबा मेंढे, रमेश कलंबे और दिलीप छत्तानी—को बाइज्जत बरी कर दिया। यह मामला केस नंबर 176 के रूप में मशहूर है।
संघ ने 2002 से तिरंगा फहराने का सिलसिला शुरु किया। इस बारे में कई बार मोहन भागवत से सवाल हो चुके हैं। हाल ही में जेन ज़ी और जेन अल्फा के साथ हुए संवाद में भी उनसे यही सवाल हुआ तो भागवत ने बताया कि 1933 में जलगांव के पास कांग्रेस सम्मेलन में पंडित नेहरू 80 फीट ऊंचे खंभे पर ध्वजारोहण कर रहे थे, लेकिन तभी झंडा फंस गया। यह देख लोगों की भीड़ में से एक युवक आया और उसने खंभे पर चढ़कर झंडे को निकाला। वह तब संघ का ही स्वयंसेवक था और जवाहर लाल नेहरू उसे सम्मानित करना चाहते थे। लेकिन उन्हें पता चला कि वह संघ से जुड़ा है, तो उन्होंने ऐसा नहीं किया। तब संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार उस युवक के घर गए और उसकी प्रशंसा की। मोहन भागवत ने उस युवक का नाम किशन सिंह राजपूत बताया। भागवत का यह भी कहना था कि तिरंगे के लिए हमारे मन में सम्मान है और जहां पर देश के सम्मान का प्रश्न है, राष्ट्रध्वज के सम्मान का प्रश्न है, वहां पर हम सबसे आगे आपको मिलेंगे लड़ने के लिए प्राण देने के लिए। लेकिन उनकी इस कहानी में कई झोल हैं, जैसे 1933 में कांग्रेस का अधिवेशन जलगांव नहीं कोलकाता में हुआ था जहां मालवीय जी की गिरफ़्तारी की वजह से नलिनी सेनगुप्ता ने अध्यक्षता की थी। तीन रंगों वाला झंडा कांग्रेस ने 1924 में पहली बार नागपुर में फहराया। इसे स्वराज झंडा कहा गया। पंडित नेहरू ने 1929 में रावी के तट पर झंडा फहराया था, पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा की थी। 1931 के कराची सत्र में पहली बार इसे कांग्रेस के आधिकारिक ध्वज का दर्जा दिया गया।
मनगढ़ंत इतिहास रचने से पहले भागवत थोड़े तथ्य परख लेते तो कहानी और अच्छी बन सकती थी। वैसे नरेन्द्र मोदी की ही पार्टी में नवीन जिंदल हैं, जिन्होंने आम लोगों के तिरंगा लहराने की कानूनी लड़ाई लड़ी और उनकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में फैसला दिया था कि झंडा फहराना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, बशर्ते उसका पूरा सम्मान किया जाए। इसके बाद सरकार ने ध्वज संहिता में संशोधन किया, और आम जनता को साल के हर दिन तिरंगा फहराने की अनुमति मिल गई।
कायदे से नरेन्द्र मोदी को नवीन जिंदल को हर घर तिरंगा अभियान का ब्रांड एम्बेसडर बना देना चाहिए या कम से कम एक बार बाबा मेंढे, रमेश कलंबे और दिलीप छत्तानी का सम्मान करना चाहिए, जिन्होंने संघ मुख्यालय पर तिरंगा फहराया था।