ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार- 24
'यह एक अटपटी सच्चाई है कि दिग्विजय सिंह एक ओर जहां नौकरशाहों के सहारे प्रदेश चला रहे थे;;
'यह एक अटपटी सच्चाई है कि दिग्विजय सिंह एक ओर जहां नौकरशाहों के सहारे प्रदेश चला रहे थे; वहीं दूसरी तरफ वे संवेदी समाज यानी कि सिविल सोसाइटी के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छवि गढ़ने के प्रयास कर रहे थे, जिसमें वे किसी सीमा तक सफल भी हुए। यह मजे की बात है कि इन प्रयासों में नौकरशाही और सिविल सोसाइटी दोनों की समान भागीदारी रही। एकता परिषद के पी वी राजगोपाल जैसे प्रतिष्ठित सिविल सोसाइटी नेता ने दिग्विजय सिंह का खुलकर समर्थन किया। 1998 के विधानसभा चुनावों के समय ऐसे अनेक संगठनों ने कांग्रेस के पक्ष में अपीलें तक जारी कीं। कहते हैं कि पार्टी को इसका लाभ नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में किसी हद तक मिला। और यह तब हुआ जब दिग्विजय सरकार ने सिविल सोसाइटी द्वारा बरसों से चलाए जा रहे 'होशंगाबाद विज्ञान' जैसे अत्यंत सफल शैक्षणिक प्रयोग को बिना किसी चर्चा या सुनवाई के एकतरफा निर्णय लेते हुए बंद कर दिया था। इसी दौरान मध्यप्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम ने एक गुपचुप निर्णय लेते हुए दुर्ग जिले के बोरई में औद्योगिक जल आपूर्ति हेतु शिवनाथ नदी का लगभग बाईस किलोमीटर का हिस्सा एक निजी कंपनी को सौंप दिया। संयोगवश नदी जल के इस निजीकरण का रहस्योद्घाटन करने का श्रेय छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद 2001 में देशबन्धु को ही मिला। तब तक इसकी भनक भी किसी को नहीं लगी थी।'
(देशबन्धु में 19 नवंबर 2020 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2020/11/24.html