नई फसल के स्वागत का त्योहार
यह खेती-बाड़ी और कृ षि परंपरा से जुड़ा है। विशेषकर, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में यह त्योहार उत्साह से मनाया जाता है।;
- बाबा मायाराम
पशुपालन के बिना खेती अधूरी है। इसमें एक चक्र बना रहता था। फसलों के ठंडल व भूसा, खेत के चारे को पशु खाते थे, खेतों में उनसे जुताई होती थी, उनके गोबर की खाद से खेत की मिट्टी उर्वरक बनती थी। इस तरह टिकाऊ खेती की परंपरा थी। पशुपालन खेती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। गाय-बैल को परिवार के सदस्य की तरह उनकी परवरिश की जाती थी।
हाल ही में नवाखाई का त्योहार मनाया गया। यह खेती-बाड़ी और कृ षि परंपरा से जुड़ा है। विशेषकर, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में यह त्योहार उत्साह से मनाया जाता है। हमारी खेती-किसानी इस समय संकट से गुजर रही है। ऐसे त्योहार हमें खेती—किसानी, पशुपालन, और प्रकृति के सामंजस्य की याद दिलाते हैं। आज इसी त्योहार के बहाने खेती-किसानी की परंपराओं पर बात करना चाहूंगा, जिससे इसके महत्व को समझा जा सके।
नवाखाई का शाब्दिक अर्थ नया खाना है। यह त्योहार धान की नई फसल के स्वागत के लिए मनाया जाता है। नए अन्न की पूजा की जाती है। इस मौके पर किसान खेती के औजारों, जैसे हल-बैल, फसल और खेत की पूजा करते हैं। यह त्योहार ग्रामीण जीवन में खुशी और उम्मीद जगाता है।
इस त्योहार में लोग उनकी कुल देवी-देवता की खेतों में पूजा करते हैं और धन-धान्य से भरपूर होने की कामना करते हैं। नवाखाई के एक दिन पहले धान की बालियों के साथ चिवड़ा, और पूजा के फूल पूजा की तैयारी के लिए रख लिए जाते हैं। कुछ जगह चिवड़ा, गुड़ के साथ देवताओं को प्रसाद चढ़ाया जाता है सबको प्रसाद दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में नुआखाई का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस मौके पर सिहाड़ी पत्तों का इस्तेमाल भी आम है। इस मौके पर नए चावल से बनी खीर को प्रसाद स्वरूप देवताओं को भोजन चढ़ाया जाता है। सभी लोग नए कपड़े पहनते हैं। इस त्योहार के लिए कई दिनों से तैयारी करते हैं। घरों की साफ-सफाई व लिपाई-पुताई भी की जाती है। इस त्योहार को अलग-अलग समय में मनाते हैं। इस त्योहार को मनाने का सिलसिला लम्बे समय तक चलता है।
पिछले साल में मैं एक निजी कार्य से ओडिशा के बरगढ़ शहर में था। वहां मुझे एक किसान ने भोजन के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने स्वाली (मीठी रोटी) खीर, दाल चावल, पापड़, चटनी और हरी पत्तीदार सब्जियां बनाई थीं। उन्होंने बताया कि अरसा पीठा विशेष रूप से तैयार किया जाता है।
नुआखाई के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह कुछ समय तक चलता है। इसमें भी लोगों का मिलना-जुलना होता रहता है। इस मौके पर मुझे कुछ साल पहले ओडिशा के मुनिगुड़ा की रेल यात्रा याद आ रही है। मैं मुनिगुड़ा एक मिश्रित खेती का प्रयोग देखने गया था। वहां से रायपुर लौटते समय ट्रेन में दूरदराज गांव की एक बुजुर्ग महिला मिली थी, जो बिलासपुर में रहने वाली उसकी बेटी के लिए नुआखाई के पकवान लेकर जा रही थी। उसने पोटली दिखाते हुए बताया था कि वह उसकी नातिनों के लिए गांव से अरसा पीठा बनाकर ले जा रही है। यानी यह परिजनों से मिलने-जुलने का भी अच्छा मौका होता है।
यह त्योहार भाईचारे का भी है, लोग नुआखाई जुहार व भेंटघाट ( सांस्कृतिक कार्यक्रम) के लिए एक दूसरे के घर आते जाते हैं। आपस में मिलकर उन्हें बधाई व शुभकामनाएं भी देते हैं। सुदूर शहरों में नौकरीपेशा लोग भी गांव को चले आते हैं, और त्योहार में शामिल होते हैं।
इस त्योहार में जिन खेती के औजारों व बैलों की पूजा होती है, अब उनमें से कईयों का खेती में उपयोग कम हो गया है, या नहीं के बराबर है। हल-बैल की जगह ट्रेक्टर आ गए हैं। जबकि पहले पशुओं के बिना खेती संभव नहीं थी। रासायनिक खेती की अपनी कई समस्याएं है, जो सभी जानते हैं।
हाल ही में पोला त्योहार निकला है, इसमें ग्रामीणों द्वारा बैलों की पूजा की जाती है। पशुपालन के बिना खेती अधूरी है। इसमें एक चक्र बना रहता था। फसलों के ठंडल व भूसा, खेत के चारे को पशु खाते थे, खेतों में उनसे जुताई होती थी, उनके गोबर की खाद से खेत की मिट्टी उर्वरक बनती थी। इस तरह टिकाऊ खेती की परंपरा थी।
पशुपालन खेती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। गाय-बैल को परिवार के सदस्य की तरह उनकी परवरिश की जाती थी। हाल तक यह परंपरा जारी रही है, कुछ जगह अब भी है।
खेती में बैल की जगह ट्रेक्टर आने से ऐसा लगता है कि खेती की आत्मा ही खो गई है। खेती और बैल का रिश्ता अटूट रहा है। उससे एक पूरा चक्र बनता है। खेती में फसलों के डंठल मवेशी खाते हैं, मनुष्य अनाज के लिए होता है। बैल खेत की जुताई करते हैं। उसके गोबर खाद से मिट्टी उर्वर बनती है।
मेरे पिता एक छोटे किसान थे। हालांकि मैंने खुद किसानी नहीं की है, पर देखी है। घर में, पड़ोस में, गांव में खेती को करते हुए नजदीक से देखा है। बचपन में उसमें थोड़ा बहुत हाथ भी बंटाया है। देशभर में घूम-घूमकर किसानों से किसानी को समझा है। उस पर रिपोर्टिंग की है। इसलिए खेती को जाना-समझा है।
पहले किसान के घर का बीज होता था, पशुओं की गोबर से खाद बनती थी, हल-बैल से खेती होती थी, इसलिए किसान की लागत कम होती थी। अब भी प्राकृतिक खेती में यही तौर-तरीके अपनाए जाते हैं। स्थानीय पेड़-पौधों की पत्तियों से जैव कीटनाशक बनाए जाते हैं। जैविक खाद का उपयोग किया जाता है। इसमें भी कृषि लागत कम हो जाती है।
पिछले कुछ सालों से रासायनिक खेती का संकट साफ तौर पर उभरकर सामने आया है। खेती की लागत बढ़ती जा रही है। किसानों पर कर्ज हो जाता है और धीरे-धीरे वे इस कर्ज से उबर नहीं पाते हैं। क्योंकि खेती की लागत के अलावा और भी अन्य खर्चे बढ़ गए हैं।
हमारी खेती में सैकड़ों सालों की अच्छी परंपराएं रही हैं। कृषि संस्कृति रही है। हमारे अधिकांश त्योहार खेती से जुड़े हैं। दीपावली भी इनमें से एक है। दीवाली पर गाय, बैल आदि सभी पालतू जानवरों को सजाया जाता है। उनकी पूजा की जाती है। यह वह समय होता है, जब किसान के घर खरीफ की फसल आ जाती है। इस दीवाली में समस्त जीव-जगत के पालन का विचार शामिल है।
दीपावली पर भी अन्न व पशु धन की पूजा की जाती है। पहले स्कूलों में भी दीपावली की लम्बी छुट्टी होती थी। इसे फसली छुट्टी भी कहते थे। इस दौरान बच्चे उनके अभिभावकों के साथ खेतों में काम करते थे। खेती के तौर-तरीके सीखते थे। यानी फसल कटाई के लिए अवकाश भी इसे कहा जाता था।
खेती अब कई समस्याओं से घिर गई है। कृषि सभ्यता ठहर गई है। खेती व गांव उजड़ती हुई सभ्यता के प्रतीक बनते जा रहे हैं। हम ऐसे आधुनिक समय में रह रहे हैं, जहां सब कुछ देखकर भी अनदेखा कर देते हें। किसान व किसान की पीड़ा हमारी आंखों से ओझल हो रहे हैं।
हमें हमारी खेती किसानी को बचाना है तो हमें नुआखाई जैसे त्योहारों की भावना का सम्मान करना चाहिए। खेती-बाड़ी, पशुपालन और मिट्टी-पानी और पर्यावरण के संरक्षण की जरूरत है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?