ललित सुरजन की कलम से संशयग्रस्त भारत और ओलंपिक
'क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसमें खिलाडिय़ों के साथ मैदान को भी विज्ञापनों से पाटा जा सकता है।;
'क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसमें खिलाडिय़ों के साथ मैदान को भी विज्ञापनों से पाटा जा सकता है। अन्य खेलों में यह गुंजाइश कम इसलिए है क्योंकि उनमें अधिक गति होती है और सवा डेढ़ घंटे में खेल खत्म हो जाता है।
बेशक फुटबॉल और टेनिस में सट्टेबाजी होती है, खासकर विदेशों में, लेकिन क्रिकेट की सट्टेबाजी के सामने वह कुछ भी नहीं। इस व्यवसायिकता का दूसरा पहलू है कि कोई भी खिलाड़ी जिसने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर ली हो, उसे अपने कब्जे में लेने के लिए विज्ञापनदाता टूट पड़ते हैं। इसमें शायद युवा खिलाडिय़ों के माता-पिता के लालच का भी दोष होता है! एक खिलाड़ी को पर्याप्त आर्थिक प्रोत्साहन मिले यह तो ठीक है, लेकिन अगर वह विज्ञापन से मिलने वाले करोड़ों रुपए की चकाचौंध में खो जाएं तो फिर उसका एकाग्रचित्त होकर खेल पाना मुश्किल हो जाता है। हाल के वर्षों में कुछ नए खिलाडिय़ों ने जो बेहतरीन उपलब्धियां हासिल कीं उनकी चमक कम पड़ जाने का कारण शायद यही है।'
(देशबन्धु में 25 अगस्त 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/08/blog-post_24.html