जंगल से मिलती है भोजन की थाली

आदिवासियों ने इस धरती पर सबसे कम बोझ डाला है। यानी आज के पर्यावरण संकट में उनका योगदान नहीं के बराबर है।;

Update: 2026-07-31 22:03 GMT
  • बाबा मायाराम

आदिवासियों ने इस धरती पर सबसे कम बोझ डाला है। यानी आज के पर्यावरण संकट में उनका योगदान नहीं के बराबर है। उनकी जीवनशैली श्रम आधारित है। प्राकृतिक संसाधनों पर जीवन आधारित है। प्रकृति को बचाने में वे आगे रहे हैं। उनकी भोजन सुरक्षा में जंगल और खेत-खलिहान से प्राप्त खाद्य पदार्थों को ही गैर खेती भोजन कहा जा सकता है। इनमें भी कई तरह के पौष्टिक पोषक तत्व हैं। यह सब न केवल भोजन की दृष्टि से बल्कि पर्यावरण और जैव- विविधता की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

हमारे जंगल, पहाड़ और नदियां ऐसे स्थान हैं, जो न केवल अपने सौंदर्य से हमेशा आकर्षित करते हैं, बल्कि भोजन व आजीविका भी देते हैं। बारिश आते ही इन सभी की सुंदर छटाएं लुभाती हैं, लेकिन इसके साथ ही बहुत से ऐसी चीजें भी देते हैं, जो पोषण की दृष्टि से उपयोगी हैं। ये सभी मनुष्य के भोजन में शामिल होती हैं। आज इसी पर बात करना चाहूंगा, जिससे इन्हें समग्रता में समझा जा सके।

प्रकृति हमें सहारा देती है, सुकून व शांति देती है, जब हम अपने तनाव भरे जीवन से छुट्टी पाना चाहते हैं, हम इनकी ओर रुख करते हैं। यह हमारी सबसे बड़ी शिक्षक भी रही है। यह हमारी जीती-जागती की नियामतें हैं। बरसात में उनकी छटा देखते ही बनती है। पेड़ों के तरह-तरह के रंग-रूप, छोटे-मोटे तने, टहनियां, रंग-बिरंगी पत्तियां, फल-फूल हमारी धरती पर अलग ही छटा बिखेरते हैं। जंगलों की तलहटी में फर्न अपनी अनोखी सुंदरता से मोहते हैं।

बरसात में नदियां तेजी से बहने लगती हैं, उनमें बाढ़ आने लगती है, उपजाऊ मिट्टी साथ लाती हैं। हमारे खेतों को उर्वर बनाती है। नदियों के किनारे ही सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई हैं। बसाहट हुई है। इनके ही किनारों पर अच्छी खेती होती है। बारिश में इनका सौंदर्य काफी बढ़ जाता है।

जंगल मनुष्य समेत कई जीव-जंतुओं को पालता-पोसता है। ताजी हवा, कंद-मूल, फल, घनी छाया, ईंधन, चारा, और इमारती लकड़ी और जड़ी-बूटियों का खजाना है। हमारे जंगल जनविहीन नहीं है, यहां गांव समाज है और ज्यादातर जंगलों में आदिवासी निवास करते हैं। उनके खानपान में जंगल से प्राप्त गैर खेती भोजन का बड़ा हिस्सा होता है। यह सैकड़ों जीव-जंतुओं की दुनिया भी बसती है।

जंगल बच्चों को भूख से बचाता है, इसलिए हम जंगल को बचाते हंै। वहां से हमें भाजी, कंद-मूल, फल-फूल और कई प्रकार के मशरूम मिलते हैं। जिन्हें या तो सीधे खाते हैं या हांडी में पकाकर खाते हैं।

मैंने कई जंगल वाले इलाकों की यात्राएं की हैं, और रिपोर्टिंग भी की है। आदिवासी कहते हैं कि जंगल उनके माई-बाप है। वे जीवन देते हैं। उससे उनके पर्व तीज-त्योहार जुड़े हुए हैं। धरती माता को वे पूजते हैं। वे प्रकृति पूजक हैं।

आदिवासियों की जीवनशैली अमौद्रिक होती है। वे प्रकृ ति के ज्यादा करीब है। प्रकृ ति से उनका रिश्ता मां-बेटे का है। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं, जितनी उन्हें जरूरत है। वे पेड़, पहाड़ को देवता के समान मानते हैं। उनकी जिंदगी प्राकृ तिक संसाधनों पर निर्भर है। ये फलदार पेड़ व कंद-मूल उनके भूख के साथी हैं।

जंगल से मिलने वाली चीजों में कंद-मूल, मशरूम, हरी भाजियां, फल, फूल और शहद आदि शामिल हैं। इनमें से कुछ खाद्य सामग्री साल भर मिलती है और कुछ मौसमी होती है।

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के जंगलों से आम, आंवला, बेल, कटहल, तेंदू, शहद, महुआ, सीताफल, जामुन, शहद मिलता है। कई तरह के मशरूम मिलते हैं। जंगल से उनका पूरा जीवन जुड़ा हुआ है। सुबह जागने से लेकर रात्रि सोने तक जंगल की कई चीजों को उपयोग में लाते हैं। जैसे प्रात: दातौन, खाना पकाने के लिए जलाऊ लकड़ी, कंद-मूल, वनोपज, छाती (मशरूम), सब्जी में कई प्रकार की हरी भाजियां मिलती हैं। थाली के रूप में सियारी या साल के पत्तों से बनी पतली (प्लेट) का उपयोग करते हैं।

इसके साथ ही सोरंदाकंद, पीताकंद, टुंडरीकंद, पीटकंद, नागरकंद, तरगरियाकंद, कु लियाकंद, बुरकीकंद, सीकापेंदी कंद, डोंगरकंद, दपनकंद, सिंधकंद, कावराकंद इत्यादि मिलता है। इसके अलावा, बोड़ा या फुटू (मशरूम) की सब्जी भी जंगल से मिलती है। इन दिनों फुटू व मशरूम दोनों निकल रहे हैं।

हरी पत्तीदार भाजियों में पेंगु भाजी, भेलवां भाजी, कोंयजारी भाजी, कोलियारी भाजी, कोकटी भाजी, बोदई भाजी। मशरूम को यहां छाती कहते हैं जिसमें डेंगुर छाती, केन्दु छाती, दाबरी छाती, बात छाती, कुटियारी छाती, पतर छाती, जाम छाती, मजुर डुण्डा, हल्दुलिया छाती आदि। झाडू के रूप में फूल बाड़न, काटा बाड़न, जिटका बाड़न, दाब बाड़न, सींध बाड़न आदि। वनोपज में चिरौंजी, आंवला, हर्रा, बहेड़ा, तेंदूपत्ता, साल, आम, जामुन, तेंदू आदि। इन सबको घरेलू उपयोग के साथ-साथ बाजार में भी बेचा जाता है, जिससे थोड़ी आमदनी भी हो जाती है।

इसी तरह कई प्रजातियों के देशी आम अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इन आमों को आदिवासी तब तक नहीं खाते जब तक कि ये परिपक्व नहीं हो जाते। आम को खाने के पूर्व ग्राम देवी देवता को पारंपरिक रूप से अर्पण किया जाता है, उसके बाद ही लोग खाते हैं।

इसी प्रकार, नवाखाई का त्योहार भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इसे नुआखाई भी कहते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है नया खाना। खेतों में नई फसल के स्वागत के लिए इसे मनाया जाता है। इसमें एक दूसरे से मिलते हैं, खुशी मनाते हैं। यह भाईचारे का त्योहार भी है।

यह सभी भोजन पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इससे भूख और कुपोषण की समस्या दूर होती है। खासतौर से जब लोगों के पास रोजगार नहीं होता। हाथ में पैसा नहीं होता। खाद्य पदार्थों तक उनकी पहुंच नहीं होती। यह प्रकृति प्रदत्त भोजन सबको मुफ्त में और सहज ही उपलब्ध हो जाता है।

आदिवासियों की परंपरा में हमेशा से ही जंगल बचाना रहा है। इसे यहां की परंपराओं से समझा जा सकता है। बस्तर के वनों में देसी प्रजाति के मौसमी फल व वन खाद्य प्रचुर मात्रा में मिलते हैं जिन्हें ग्रामवासी संग्रहण करते हैं। चाहे कृषि उपज हो या वनोपज, जब तक पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं हो जाते तब तक इन्हें ग्रहण नहीं किया जाता। इन फसलों को परिपक्व होने की स्थिति में प्रत्येक गांव में ग्राम देवी देवता को सबसे पहले अर्पण करते हैं फिर खुद ग्रहण करते हैं।

आदिवासियों ने इस धरती पर सबसे कम बोझ डाला है। यानी आज के पर्यावरण संकट में उनका योगदान नहीं के बराबर है। उनकी जीवनशैली श्रम आधारित है। प्राकृतिक संसाधनों पर जीवन आधारित है। प्रकृति को बचाने में वे आगे रहे हैं। उनकी भोजन सुरक्षा में जंगल और खेत-खलिहान से प्राप्त खाद्य पदार्थों को ही गैर खेती भोजन कहा जा सकता है। इनमें भी कई तरह के पौष्टिक पोषक तत्व हैं। यह सब न केवल भोजन की दृष्टि से बल्कि पर्यावरण और जैव- विविधता की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। क्या हम इन सबसे कुछ सीखना चाहेंगे?

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