ललित सुरजन की कलम से शिक्षक राष्ट्रपति, शिक्षक प्रधानमंत्री
'प्रधानमंत्री ने अपने एकपक्षीय व्याख्यान में गुरु-शिष्य परंपरा का बखान किया।;
'प्रधानमंत्री ने अपने एकपक्षीय व्याख्यान में गुरु-शिष्य परंपरा का बखान किया। यह उस युग की बात है जब गुरु का पद उसी को मिलता था जो प्रभुतासम्पन्न समाज के बच्चों को पढ़ा सके। आखिरकार द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अपनी कक्षा में बैठाने से साफ-साफ इंकार कर दिया था। और सांदीपनि की कक्षा में सुदामा सिर्फ इसलिए पढ़ पाए क्योंकि वे द्विज थे। आज की स्थिति तो और बदतर है। आज से लगभग तीस साल पहले वर्ल्ड बैंक के इशारे पर जब नियमित शिक्षकों की भर्ती पूरे देश में बंद कर दी गई और उनका स्थान तदर्थ शिक्षकों ने ले लिया तब से शिक्षा व्यवस्था निरंतर रसातल को जा रही है। आज किसी प्रदेश सरकार के पास यह अधिकार भी नहीं है कि वह शासकीय शालाओं में पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति कर सके।'
(देशबन्धु में 10 सितम्बर 2015 को प्रकाशित)
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