आंकड़ों से छिप नहीं सकता 'भरोसे का संकट'
तकनीकी जानकारी जीडीपी के आंकड़ों को समझा सकती है जबकि अनुभव पर आधारित समझ उन आंकड़ों की सच्चाई पर सवाल उठा सकती है।;
- जगदीश रत्तनानी
तकनीकी जानकारी जीडीपी के आंकड़ों को समझा सकती है जबकि अनुभव पर आधारित समझ उन आंकड़ों की सच्चाई पर सवाल उठा सकती है। वहीं, व्यावहारिक समझ उन्हें बेकार बताकर खारिज कर सकती है- खासकर ऐसी दुनिया में जहां वास्तविक ज़िंदगी का अनुभव बताए गए आंकड़ों से कोसों दूर है। जब सरकारी बयानों में बताई गई बातें लोगों की असल ज़िंदगी से मेल नहीं खातीं तो लोगों की ज़िंदगी ही सच बन जाती है।
क्या भारतीय अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, धीमी है या बहुत सुस्त है? इस बात पर ज़ोरदार बहस चल रही है कि क्या 2026 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ सरकार के दावे के मुताबिक सचमुच 7.8 प्रतिशत थी या सिर्फ़ 2.6 फीसदी, जो पिछले साल के आंकड़ों में बदलाव और महंगाई के असर (इन्फ्लेशन डिफ्लेटर) को ठीक से जोड़ने पर लगभग शून्य हो जाती है। इस बहस का फ़ैसला सिफ़र् आंकड़ों से नहीं हो सकता।
तकनीकी जानकारी जीडीपी के आंकड़ों को समझा सकती है जबकि अनुभव पर आधारित समझ उन आंकड़ों की सच्चाई पर सवाल उठा सकती है। वहीं, व्यावहारिक समझ उन्हें बेकार बताकर खारिज कर सकती है- खासकर ऐसी दुनिया में जहां वास्तविक ज़िंदगी का अनुभव बताए गए आंकड़ों से कोसों दूर है। जब सरकारी बयानों में बताई गई बातें लोगों की असल ज़िंदगी से मेल नहीं खातीं तो लोगों की ज़िंदगी ही सच बन जाती है और सरकारी बयान सिफ़र् एक कहानी या नैरेटिव बनकर रह जाते हैं।
जीडीपी के आंकड़ों को लेकर हो रही बहस मौजूदा हालात की निशानी है। ये उस भरोसे के संकट को दिखाते हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व नौकरशाहों ने आंकड़ों को लेकर सरकार से मोर्चा ले लिया है। इससे इस मामले ने एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप धर लिया है तथा 'दांव' और भी ऊंचे हो गए हैं। पिछले सप्ताहांत पीएम ने विकास की कहानी को इन शब्दों में पेश किया-'पश्चिम एशिया में युद्ध और वैश्विक व्यापार की बाधाओं के बीच 7.8 प्रतिशत की तिमाही विकास दर हासिल करना भारत की आंतरिक क्षमता को दर्शाता है।' ज़ोरदार सरकारी दावों और उनके तीखे जवाबों ने इसे सरकार के लिए एक राजनीतिक दलदल बना दिया है जो पहले से ही मुश्किल हालात का सामना कर रही है।
असल में जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद 7.8 प्रतिशत की विकास दर सरकार के लिए पहली अच्छी खबर थी क्योंकि इन प्रदर्शनों ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया और जुलाई में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा ले लिया। इस विवाद में सरकार की काफी किरकिरी हुई थी। प्रदर्शनों के दौरान एक ऐसे प्रधानमंत्री का मज़ाक उड़ाया गया और उन पर मीम्स बनाए गए जिन्हें कभी बहुत ताकतवर और अजेय माना जाता था। विरोध-प्रदर्शनों को संभालने के तरीके को लेकर उनके गृह मंत्री अमित शाह को कड़े सवालों का सामना करना पड़ा। अंदरूनी स्तर पर भारी तनाव की बात कहने वाले एक पूर्व नौकरशाह को जिस तरह से नई दिल्ली में घंटों तक हिरासत में रखा गया उससे इस बात को और बल मिला है कि अंदर कुछ तो बहुत ही गड़बड़ है।
एक समय था जब मोदी की कही लगभग कोई भी बात गलत नहीं मानी जाती थी। अब एक ऐसा समय आ गया है जब उनकी कही लगभग कोई भी बात सही नहीं मानी जाती। इस बात पर गौर करें- 2014 में केन्द्र में सत्ता में आने से ठीक पहले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी ने मुंबई में उद्योगपतियों के एक समूह से खुलकर कहा था कि उन्हें पता है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली जिस बुलेट ट्रेन का सपना वे देख रहे थे, उसमें कोई सवारी नहीं करेगा। लेकिन जल्द ही प्रधानमंत्री बनने वाले उसी व्यक्ति ने कहा कि, 'हमें दुनिया को यह दिखाना होगा कि हमारे पास बुलेट ट्रेन है।' चीन का उदाहरण देते हुए उन्होंने दावा किया कि चीनी लोग भी पूरे देश के बजाय सिफ़र् शंघाई को ही दुनिया के सामने पेश करते हैं। दर्शकों ने तालियां बजाईं। किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। गहराई से देखें तो यही वह सोच या कार्य-पद्धति है जो सरकार के साथ लगातार बनी रही है और नैरेटिव बनाए रखने के लिए कई विचारों, फैसलों और अनुमानों को आकार देती रही है। दुनिया को जो दिखाना है उसे पहले देश के भीतर दिखाना और पेश करना ज़रूरी है।
भारत की जीडीपी की कहानी इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे मोदी सरकार के बेहतर प्रदर्शन के दावों पर लोगों का भरोसा और विश्वास कम हुआ है। गैर-निष्पादित परिसंपत्तिÓ (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) को साफ करने के दावे और सिस्टम के असल कामकाज को लेकर फिर से उठे विवाद पर गौर करें। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के हालिया आदेश से एक समाधान निकाला गया जिसमें टीवी के एक पूर्व दिग्गज को कुल 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों के बदले सिफ़र् 6.25 करोड़ रुपये चुकाने थे। ये दावे एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड ने ट्रिब्यूनल के सामने रखे थे। यानी हर सौ रुपये के कर्ज के बदले तीन पैसे से भी कम। उस दिग्गज का कहना है कि वे लगभग कंगाल हो चुके हैं। 'समझौतेÓ का यह चौंकाने वाला मामला अब रोक दिया गया है। इसके अलावा, उस दिग्गज के खिलाफ एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड की शिकायत पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया है।
कोई एक मामला भले ही अहम हो लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी वह बात है जिसकी ओर वह इशारा करता है। वित्तीय वर्ष 2018 और वित्तीय वर्ष 2025 के बीच सरकारी बैंकों का कुल एनपीए 8.96 लाख करोड़ रुपये से घटकर 2.84 लाख करोड़ रुपये हो गया पर बही-खातों से यह बैड स्टॉक (खराब लोन) कैसे हटाया गया? यह रिकवरी के बजाय 'राइट-ऑफ' (बट्टे खाते में डालने) के ज़रिए किया गया। उन्हीं आठ सालों में, 6.72 लाख करोड़ रुपये की रिकवरी और अपग्रेडेशन के मुकाबले 10.76 लाख करोड़ रुपये राइट-ऑफ किए गए जिसका अनुपात 1.60 था। हर एक रुपये की रिकवरी के बदले 1.60 रुपये राइट-ऑफ किए गए। 2025 के लिए सरकारी बैंकों द्वारा राइट-ऑफ की गई रकम रिकवरी से लगभग दोगुनी थी।
इस सबके बारे में आधिकारिक जवाब यह है कि राइट-ऑफ एक अकाउंटिंग एंट्री है न कि लोन माफ़ी, मतलब उधार लेने वाला व्यक्ति अभी भी लोन चुकाने के लिए ज़िम्मेदार रहता है। वास्तव में रिकवरी कम ही रहती है। यह हमें 'तकनीकी रूप से सही होने' और 'ज़मीनी हकीकत' के उस अंतर की समस्या पर वापस ले जाता है जो जीडीपी ग्रोथ की कहानी में भी देखने को मिलती है। सिस्टम को यह संकेत मिलता है कि बड़े उधारकर्ता बचकर निकल सकते हैं जिससे सुशासन के मानक और कमज़ोर होते हैं। फिर भी, ग्रॉस एनपीए कम हुए हैं जो सिफ़र् आंकड़ों के लिहाज़ से एक उपलब्धि है और सरकार के लिए जश्न मनाने की बात है। कागज़ों पर तो समस्या हल हो जाती है लेकिन असलियत में वह वैसी ही बनी रहती है।
एक अहम बात यह है कि 'खराब' आंकड़े सामने आने देना सरकार के लिए फायदेमंद होता है क्योंकि इन्हीं से अच्छे आंकड़ों पर भरोसा बढ़ता है। इनसे अच्छी बहस, बेहतर पॉलिसी बनाने और भरोसा बढ़ने में मदद मिलती है। अमेज़न के जेफ़ बेज़ोस से जब कहा गया कि, 'सेल्स साइट पर खराब रिव्यू से बिज़नेस को नुकसान होता है', तो उसने कहा था कि, 'नकारात्मक प्रतिक्रिया और ग्राहक शिकायतें उत्पाद और सेवा दोषों को खोजने के लिए एक शक्तिशाली प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करती हैं।' यह सच है कि नुकसान होता है, परन्तु थोड़े समय के लिए। लंबे समय में इनसे बेहतर खरीदारी व कम रिटर्न को बढ़ावा मिलता है और अच्छे रिव्यू पर भरोसा बढ़ता है जिससे पूरे रिव्यू सेक्शन की विश्वसनीयता बढ़ती है। ग्राहकों तथा कंपनी दोनों को फायदा भी होता है। इससे भरोसा बन सकता है। सबक सीधा है : खराब और लीक करने वाली जगह को कोई भी पेंट लंबे समय तक नहीं छिपा सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)