छात्र युवाओं के लिए राहुल वर्तमान और भविष्य, मोदी अतीत

जनता समझ चुकी है कि उसे हिन्दू-मुसलमान के नाम पर बहुत बेवकूफ बनाया गया। उसकी जिन्दगी खराब कर दी।;

Update: 2026-09-13 21:30 GMT
  • शकील अख्तर

जनता समझ चुकी है कि उसे हिन्दू-मुसलमान के नाम पर बहुत बेवकूफ बनाया गया। उसकी जिन्दगी खराब कर दी। और अगर अब भी वह चुप रही हिन्दू-मुसलमान के नशे में डूबी रही तो उसके बच्चों की जिन्दगी भी खराब हो जाएगी। खुद बच्चे भी यह समझ गए हैं। इसलिए पहले छात्र और युवा आए जिन्हें जेन जी कहा गया फिर स्कूली बच्चे, किशोर। जो जेन अल्फा कहला रहे हैं। 16 साल तक के लड़के-लड़कियां।

क्स और इस तरह के अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन थोड़े दिनों के लिए प्रधानमंत्री मोदी के अन्दर के डर को कम कर देते हैं। यहां फोटो में सेंटर में रहने से वे समझते हैं कि देश की राजनीति में भी वे उसी तरह केन्द्र में हैं।

मगर वह बात अतीत हो चुकी है। अब प्रधानमंत्री केवल गोदी मीडिया और मेजबान की हैसियत से ऐसे अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में ही सेंटर पाइंट में दिखते हैं। इससे पहले 2023 में यहीं दिल्ली में जी-20 के शिखर सम्मेलन में भी मोदी जी ऐसे ही खुद में आत्मविश्वास भर रहे थे। 400 पार की बात करने लगे थे।

लेकिन वे जो देश का विश्वास खो चुके थे वह 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों में सामने आ गया। 400 पार का दावा 240 पर आकर रूक गया। जनता को भूलकर केवल गोदी मीडिया में जीने का नतीजा सामने आ गया। अब फिर मोदी जी सब भूलकर इस ब्रिक्स सम्मेलन को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि की तरह लेंगे। गोदी मीडिया उन्हें चढ़ा ही रहा है।

लेकिन इससे वापस उनके देश के सेंटर पांइट में आने की उम्मीदें पूरी नहीं होंगी। जगह भर चुकी है। वहां नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आ चुके हैं। चार साल पहले उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा शुरू करके गेम पलट दिया था। लेकिन देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा होने के कारण मोदी 2024 में पूरी तरह पराजित नहीं हो सके।

राहुल ने इस चुनाव के बाद दो बहुत महत्वपूर्ण बातें कही थीं। एक अगर चुनाव ईमानदारी से होते तो मोदी को सौ सीटों का और नुकसान होता। और दूसरे अगर प्रियंका गांधी बनारस से लड़ जातीं तो मोदी हार जाते। वहां कांग्रेस के प्रत्याशी अजय राय ने ही मोदी को 7 राउंड तक पीछे छोड़ रखा था। लेकिन उसके बाद खेल बदला गया। फिर भी मोदी 2019 के मुकाबले काफी कम अंतर से जीत दर्ज कर पाए। 2019 में 4 लाख 79 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे और 2024 में केवल 1 लाख 52 हजार वोटों से।

2014 के चुनाव में भी 3 लाख 71 हजार वोटों का अंतर था। मगर 2024 वाटर लू होते होते बचा। उसके बाद से मोदी वापस अपना आत्मविश्वास प्राप्त नहीं कर पाए। कहां वे भारत की कुशल वायुसेना को यह तक बता देते थे कि पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकवादी ठिकाने पर हमला करने के लिए जहाज को तब लेकर जाओ जब बादल हों।

इतने अति आत्मविश्वास में होते थे कि साइंस की नई खोज कर दी थी कि बादलों में रडार काम नहीं करता है। सेना को चुप रह जाना था। वह रही और अपना काम कर आई। मगर मोदी उस समय ऐसे ही आत्मविश्वास में थे कि जो मैं कहूंगा वह हो जाएगा।

इससे पहले उन्होंने कहा था कि नाले के गैस से चाय बन सकती है। तो यह सब जीत का आत्मविश्वास था। लग रहा था कि मैं हार ही नहीं सकता। जनता वही करेगी जो मैं चाहूंगा। जनता के लिए मैं कुछ करूं, ना करूं! जनता को मुझ में कुछ दिखता है। जिसे उन्होंने बाद में ईश्वरीय अंश भी कहा था। खुद को नान बायलोजिकल। सीधे अवतरण। तो एक वह दौर था।

लेकिन उसे फिर राहुल ने अपनी दो यात्रा, और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनकर वहां प्रधानमंत्री मोदी के सामने रोज नई चुनौती पेश करके ऐसा बदला कि अभी पिछले लोकसभा के मानसून सत्र में मोदी और उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी अमित शाह दोनों लोकसभा में आ ही नहीं पाए।

खेल इस तरह बदल जाएगा किसी ने नहीं सोचा था। संसद के इससे पहले के बजट सत्र में भी प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने लोकसभा में नहीं आ पाए। साफ तौर पर कारण डर को बताया गया। लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि मैंने उन्हें मना किया। सदन में उन्हें विपक्ष की महिला सदस्यों की तरफ से खतरा था!

ऐसा कभी नहीं हुआ। एक कि प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब न दें। और दूसरे वे सदन के अंदर महिला सदस्यों से खतरा महसूस करें। यहीं से बाजी पलटना शुरू हो गई। इसलिए अब केवल ऐसे अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों से ही मोदी कुछ समय के लिए आत्मविश्वास पाते हैं। मगर फिर जल्दी ही सच्चाई का सामना हो जाता है कि छात्र और युवा भारी आक्रोश मेंं हैं। जनता की समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और उनके पास इन सबका कोई हल नहीं है। उनका एकमात्र दांव हिन्दू-मुसलमान चल नहीं पा रहा है।

जनता समझ चुकी है कि उसे हिन्दू-मुसलमान के नाम पर बहुत बेवकूफ बनाया गया। उसकी जिन्दगी खराब कर दी। और अगर अब भी वह चुप रही हिन्दू-मुसलमान के नशे में डूबी रही तो उसके बच्चों की जिन्दगी भी खराब हो जाएगी। खुद बच्चे भी यह समझ गए हैं। इसलिए पहले छात्र और युवा आए जिन्हें जेन जी कहा गया फिर स्कूली बच्चे, किशोर। जो जेन अल्फा कहला रहे हैं। 16 साल तक के लड़के-लड़कियां।

राहुल इन सबकी आवाज बने। 17 जून को उन्होंने कोटा में छात्रों का एक पहला सम्मेलन किया। उसकी सफलता के बाद देहरादून, प्रयागराज, पुणे जो केवल छात्रा सम्मेलन था और अभूतपूर्व सफल हुआ के बाद अब वे इन्दौर में इस गूंज सीरिज का पांचवा सम्मेलन करने जा रहे हैं। पिछले चारों मौकों पर राज्य सरकारों ने सम्मेलन की जगह देने में आखिऱी आखिरी तक व्यवधान डाले। जगह दे कर कैंसिल की।

देहरादून में जो जगह पहले दी थी उसे कैंसिल की और वहीं म्यूजिक का बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर दिया कि आज की युवा पीढ़ी इसमें बहुत रुचि लेती है वहां आ जाएगी। प्रोग्राम भी बिना टिकट का। मगर छात्र वहां न जाकर राहुल के प्रोग्राम में पहुंचे। प्रयागराज में तो सभा स्थल पर सीवर का गंदा पानी छोड़ दिया गया। लेकिन यह सारी बाधाएं न राहुल को रोक पाईं, न छात्रों को।

अब इन्दौर में छात्रों के सम्मेलन के लिए जो जगह मांगी थी नेहरू स्टेडियम नहीं दी। कांग्रेस का ही बनाया हुआ है और कांग्रेस छात्रों के लिए मांग रही है मगर नहीं दिया। मध्य प्रदेश में 23 साल से भाजपा की सरकार है। कुछ इन्होंने बनाया? नहीं। मगर जो कांग्रेस का बनाया हुआ है वह भी नहीं दे रहे।

दूसरी जगह रीजनल पार्क के सामने का मैदान मांगा। काफी अड़ंगे डालने के बाद उसके लिए दस लाख से ज्यादा रुपए जमा करवाए। वह भी कांग्रेस ने कर दिए। मगर फिर भी अभी तक फाइनल मंजूरी नहीं मिली है।

यह किसका डर है? छात्रों का? राहुल का? या दोनों का? यह डर अब शिफ्ट हो गया है। पहले जनता डरी हुई थी। अब सरकार डरी हुई है। छात्र और युवाओं के सामने आने से सब में हौसला आया है। प्रधानमंत्री मोदी जो अतीत की यहां तक कि हजार साल पहले तक की बात करके लोगों को बहकाते थे वे अब सफल नहीं हो रहे हैं।

राहुल की वर्तमान की, भविष्य की बातें लोगों को खास तौर से छात्रों, युवाओं का समझ में आने लगी हैं। नफरत और विभाजन के परिणाम उन्होंने देख लिए। पहले हिन्दू-मुसलमान किया। अब जाति-जाति को आपस में लड़वा दिया। देश में इस समय अगड़े-पिछड़े के बीच जो तनाव आरोप प्रत्यारोप और यहां तक कि सोशल मीडिया पर गाली-गलौज तक चल रहा है वह भयावह है।

नई पीढ़ी इसे समझ गई है कि मोदी केवल नफरत और विभाजन की राजनीति ही जानते हैं। और अब उसके भी खत्म होने का समय आ गया है। छात्र युवाओं का समय भी यहीं से शुरू हो रहा है। अपना भविष्य बनाने का। और उसमें उन्हें अब मोदी की कोई भूमिका नजर नहीं आती है। राहुल में उन्हें उम्मीद की किरण नजर आती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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