विनोबा : अहिंसक क्रांति के अग्रदूत
आचार्य विनोबा भावे का जीवन सत्य, प्रेम एवं करुणा से सिंचित, पल्लवित एवं पुष्पित एक बेमिसाल नजीर था।;
- अशोक भारत
सभी धर्म में सत्य का पालन अहिंसा से यानी प्रेम से बरतें और जरूरतमंदों की सेवा के लिए दौड़कर जाएं, यह मानवता का धर्म है। यानी सत्य, प्रेम और करुणा यही सभी धर्मों का सार है। पूजा पद्धति सभी धर्मों की अलग-अलग है, परंतु मूल बातें सभी धर्मों में एक ही है। आज जब धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़ों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, विनोबा के विचार हमारे लिए तारक हो सकता है।
आचार्य विनोबा भावे का जीवन सत्य, प्रेम एवं करुणा से सिंचित, पल्लवित एवं पुष्पित एक बेमिसाल नजीर था। विनोबा बंगाल की क्रांति एवं हिमालय की शांति की तलाश में 1916 में वाराणसी पहुंचे थे, फिर वहां से गांधीजी के पास पहुंच गए। इन दो महापुरुषों के मिलन ने विश्व के इतिहास को नई दिशा दी, सभ्यता को उस शिखर पर ले गए जिनके आलोक से युद्ध और हिंसा से झुलसती दुनिया आज भी शीतलता प्राप्त कर सकती है।
विनोबाजी का जन्म 11 सितंबर, 1895 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के एक छोटे से गांव गागोदा में हुआ था। उनका नाम विनायक नरहरि भावे था। मां इन्हें प्यार से विन्या कहकर पुकारती थी। विनोबा के पिता का नाम नरहरि शम्भूराव भावे और माता का नाम रुक्मिणी बाई (रखुमाई) था। विनोबा गांधी जी का दिया हुआ नाम था, जिससे पूरी दुनिया उन्हें जानती है।
मां का विनोबा पर गहरा असर पड़ा। उनका मानना था कि वे जो कुछ भी हैं, अपनी मां की वजह से हैं। विनोबा ने गीता का मराठी अनुवाद 'गीताईÓ (गीता+आई) मां के कारण ही किया। वे कहते थे कि मां ने मुझे मानव के आचार धर्म (आचरण के उसूल) की शिक्षा दी। उनका मानना था कि 'भूदान आंदोलन' के दौरान जो भी कार्य हुआ वह मां की शिक्षा के कारण ही हुआ।
आजादी के बाद देश उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। बंटवारे के कारण परिस्थिति विषम थी। गांधी की शहादत के कारण देश में घोर निराशा का वातावरण पसरा हुआ था। गांधी के बाद क्या? यह यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा था। ऐसे में लोगों का ध्यान विनोबा जी ओर गया जिन्होंने न केवल इस दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वाह किया, बल्कि सर्वोदय दर्शन और अहिंसा के प्रयोग को नई उंचाई पर पहुंचाया।
गांधीजी ने अपने प्रयोगों से पहले दक्षिण अफ्रीका फिर भारत की आजादी की लड़ाई में साबित कर दिया था कि अहिंसा व्यक्ति के साथ समाज का भी मूल्य हो सकती है। हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जा सकता है। दर्शन के रूप में गांधीजी ने सर्वोदय का विचार लोगों के सामने रखा। विनोबा ने इन प्रयोगों को आगे बढ़ाया, जिसका इतिहास में कोई सानी नहीं है।
विनोबा के शब्दों में - 'अहिंसा की खोज करना मेरा जीवनकार्य रहा। मेरी शुरू हुई प्रत्येक कृति, हाथ में लिया हुआ प्रत्येक काम - सब उसी एक प्रयोग के लिए हुए और हो रहे हैं। मैं एक अलग दुनिया का आदमी हूं। मेरे पास प्रेम है, मत नहीं। मेरे पास विचार हैं जो मुक्त होते हैं। वे बंधे हुए नहीं होते। सज्जनों के साथ विचार-विमर्श कर उनके विचार ले सकते हैं और अपने विचार उन्हें दे सकते हैं। प्रेम और विचार में जो शक्ति है वह किसी और में नहीं।'
जिस देश में सत्ता, सम्पत्ति के लिए महाभारत हुए, जहां जमीन के लिए भाई-भाई के बीच मुकदमा, दुश्मनी आम बात है। वहां प्रेम और करुणा के आधार पर 47 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन भूमिहीनों के लिए प्राप्त करना कोई चमत्कार से कम नहीं था। तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव से निकलने वाली 'भूदान गंगा' की धारा न केवल पूरे देश में पहुंची, बल्कि इसकी गूंज विदेशों में भी सुनी गई।
इस आंदोलन से न केवल भूमिहीनों के लिए जमीन मिली, बल्कि ऐसे अनेक चमत्कार हुए, जिसकी कल्पना भी करना मुश्किल था। तेलंगाना में जमीन के प्रश्न का हल अहिंसा के रास्ते निकाला। हिंसा की ज्वाला शांत हुई। वर्षों से चंबल घाटी में जारी हिंसा से मुक्ति का मार्ग खुला। जो काम तुर्क- मुगल शासन से लेकर अंग्रेजों तक तथा आजादी के बाद की सरकारें करने में नाकाम रहीं, उसे विनोबा भावे ने प्रेम - करुणा के आधार पर करने में सफलता पाई। 'भूदान आंदोलन' के दौरान ही 'ग्रामदान' का विचार आया। मंगरोठ (उत्तरप्रदेश) पहला 'ग्रामदानी गांव' बना। विनोबा ने इसे 'डिफेंस मेजर' कहा।
तेरह साल तक अनवरत 80,000 किलोमीटर से ज्यादा की पदयात्रा अद्वितीय घटना थी। इस दौरान कई श्रेष्ठ विचार उन्होंने समाज के सामने रखे। जिससे सर्वोदय विचार को नई ऊर्जा और गति मिली। उन्होंने उसमें अर्थ और आश्रय भरे। उसे पुष्ट एवं समृद्ध किया। जिसमें ग्रामदान, संपत्ति दान, सम्मति दान आदि शामिल हैं। इसी दौरान 'जय जगत,' 'सर्वोदय पात्र' एवं 'शांति सेना' आदि के उदात्त विचार हमें मिले। आंध्रप्रदेश के जीबी सुब्बाराव, जो भूदान यात्रा में शामिल थे, कहते हैं कि उन्होंने यह संकल्प लिया था कि जिस दिन जमीन दान में नहीं मिलेगी, उस दिन भोजन नहीं करेंगे। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि उस समय का माहौल कैसा था।
पारसमणि की तरह विनोबा का व्यक्तित्व था। जो भी उनके संपर्क में आया उसके जीवन में बदलाव और निखार सहज ही हो जाता था। चौथी कक्षा में पढ़ने वाले 9 साल के एक लड़के ने पंडित नेहरू को उनके जन्मदिन पर पत्र लिखा-'मेरे प्यारे नेहरू चाचा, आचार्य विनोबा भावे गरीबों के लिए जमीन दान मांगते हैं। इसीलिए मैं अपनी पूरी 70 एकड़ जमीन, दो कुएं और एक मकान सब दे रहा हूं। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं यह सारी जमीन-जायदाद आप फौरन अपने कब्जे में कर लें। यह सारी जायदाद मेरे दादाजी की थी। अब मेरे पिताजी उसके एक मात्र वारिस हैं। मैं उनकी इजाजत लेकर ही यह दान दे रहा हूं। उनके पिता ने भी लिखा था इस दान को स्वीकार कर बच्चों को आशीर्वाद दें, ताकि आगे चलकर देश का सच्चा सेवक बनें। इससे समझा जा सकता है कि 'भूदान आंदोलन' के कारण देश में किस तरह का वातावरण का निर्माण हुआ था।
विवेकानंद के सर्वधर्म समभाव के विचार को महात्मा गांधी ने आगे बढ़ाया। विनोबा ने इसका और विस्तार किया। उन्होंने विश्व के सभी प्रमुख धर्मग्रंथों का गहरा अध्ययन कर उनका सार प्रस्तुत किया। यह विनोबा की समाज को अमूल्य देन है। उन्होंने जिस श्रद्धा और भक्ति से वेद-उपनिषद- गीता का अध्ययन किया, उसी आदर और भक्ति से दूसरे धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया।
'कुरान' के अध्ययन के लिए अरबी भाषा पढ़ी। बौद्धों के 'धम्मपद' के अध्ययन के लिए पाली पढ़ी। 'बाइबिल' का सालों तक अध्ययन किया। इस प्रकार विश्व के सभी प्रमुख धर्मग्रन्थों का सार हमें दिया। सभी धर्म में सत्य का पालन अहिंसा से यानी प्रेम से बरतें और जरूरतमंदों की सेवा के लिए दौड़कर जाएं, यह मानवता का धर्म है। यानी सत्य, प्रेम और करुणा यही सभी धर्मों का सार है। पूजा पद्धति सभी धर्मों की अलग-अलग है, परंतु मूल बातें सभी धर्मों में एक ही है।
यह बात अगर समझ में आ गई तो एक-दूसरे के लिए प्रेम महसूस होने लगेगा। आज जब धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़ों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, विनोबा के विचार हमारे लिए तारक हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि विनोबा ने जो सभी धर्मों का नवनीत हमारे सामने प्रस्तुत किया उसका अध्ययन कर उसे समाज में फैलाएं, तो समाज में प्रेम, शांति और सद्भावना कायम होगी और सही अर्थों में समृद्धि आएगी।