ललित सुरजन की कलम से हिंदी : विसंगतियां व विडंबनाएं

मैं एक समय रेलवे बोर्ड की राजभाषा समिति का सदस्य था।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-13 21:50 GMT

मैं एक समय रेलवे बोर्ड की राजभाषा समिति का सदस्य था। तब देखा कि देश के अनेकानेक रेलवे स्टेशनों पर जो हिन्दी ग्रंथालय हैं उनमें एक सिरे से अपठनीय पुस्तकें भरी पड़ी हैं जिन्हें गैर-हिन्दी तो क्या, हिन्दीभाषी रेलकर्मी भी छूना पसंद नहीं करते। जाहिर है कि यह लेखक, प्रकाशक और राजभाषा विभाग का मिला-जुला करतब था। अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में भी स्थिति बेहतर नहीं है। जो राजभाषा अधिकारी होते हैं उनमें से अधिकतर औपचारिकता का निर्वाह करने में विश्वास करते हैं। भूले-भटके कोई कल्पनाशील और परिश्रमी हिन्दी अधिकारी आ जाए तो वह एक अपवाद ही होता है। इस विषय में चिंता यह देखकर और बढ़ जाती है कि सार्वजनिक उपक्रमों का धीरे-धीरे निजीकरण हो रहा है। निजी कंपनियों को अपने कारोबार से मतलब। वे राष्ट्रभाषा जैसे व्यर्थ के कामों में अपना दिमाग खपाना पसंद नहीं करते।

(देशबंधु में 13 सितम्बर 2018 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2018/09/blog-post_12.html

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