रिजीम चेंज पर बवाल

रिजीम चेंज ये शब्द इस समय मोदी सरकार को बुरी तरह डरा रहा है। वैसे रिजीम चेंज कहें या सत्ता परिवर्तन या वोट चोर, गद्दी छोड़ के नारे लगाएं, लोकतंत्र में ये जुमले गुनाह नहीं हैं, बल्कि उसकी बुनियादी शर्त हैं;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-10-22 01:12 GMT

रिजीम चेंज ये शब्द इस समय मोदी सरकार को बुरी तरह डरा रहा है। वैसे रिजीम चेंज कहें या सत्ता परिवर्तन या वोट चोर, गद्दी छोड़ के नारे लगाएं, लोकतंत्र में ये जुमले गुनाह नहीं हैं, बल्कि उसकी बुनियादी शर्त हैं। जनता ही तय करती है, रिजीम यानी शासन करने का हक किसे दिया जाए और ठीक न लगने पर उसे कब उतारा जाए। इस परिवर्तन में जब तक कोई अनैतिक तरीके इस्तेमाल नहीं होते या गैरकानूनी काम और हिंसा नहीं होती, तब तक उसे गलत नहीं कहा जा सकता। मगर मोदी सरकार में जनता के विरोध को देशविरोध काम की तरह पेश किया जा रहा है। पहले राजनाथ सिंह ने रिजीम चेंज पर विपक्ष को घेरा, उसके बाद मोहन भागवत ने भी अपने विजयादशमी के भाषण में यही डर दिखाया और आंदोलन को गलत बताने की कोशिश की। इससे पहले संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू भी बांग्लादेश और फ्रांस का नाम लेकर भारत में उठे आंदोलन को गलत ठहरा सकते हैं।

गौरतलब है कि आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, और शिक्षा व्यवस्था की खामियां जैसे कई मुद्दों पर इस समय यूरोप के कुछ देशों में हिंसक आंदोलन खड़े हो चुके हैं। फ्रांस, इटली, बेल्जियम, स्पेन, पुर्तगाल, अल्बानिया, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और ग्रीस में अलग-अलग आंदोलन चल रहे हैं। उसमें भी फ्रांस, इटली और अल्बानिया में स्थिति सबसे अधिक विस्फोटक हो चुकी है। अल्बानिया में तो सरकार पर कोई एक्शन न लेने के कारण सुप्रीम कोर्ट में ही आग लगा दी गई। वहीं फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, योग्य शिक्षकों की भारी कमी और सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र के बजट में की गई भारी-भरकम कटौती के खिलाफ छात्र और शिक्षक पहले सड़कों पर उतरे फिर एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो गया। जर्मनी में युवा वर्ग अनिवार्य सैन्य-सेवा योजनाओं और नीतियों का खुलकर विरोध कर रहा है। उधर इटली के मिलान सहित कई प्रमुख शहरों में भी प्रदर्शनकारियों ने भारी उत्पात मचाया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सार्वजनिक रूप से इन हिंसक हरकतों को कोरा अराजनीतिक उपद्रव और अराजकता करार दिया है।

जिन देशों में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, पुलिस और सुरक्षा बलों के खिलाफ लोग हिंसा कर रहे हैं, वहां की सरकारें अगर इसे उपद्रव कहें तो समझ आता है। लेकिन भारत में तो हालात इसके उलट हैं।

जुलाई में जंतर-मंतर की हिंसा की बात न भी करें, तो अभी अक्टूबर में हुए विरोध प्रदर्शनों में भी दिल्ली पुलिस ने न केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर शक्ति का इस्तेमाल किया, बल्कि गैरकानूनी तरीके से उन्हें प्रताड़ित भी किया। इसके बाद भी भारतीय जनता जिस हिम्मत, धैर्य और सहनशक्ति के साथ शांति और अहिंसा को अपने प्रदर्शनों का हिस्सा बनाए हुए है, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। सरकार जनता के इस अद्भुत विवेक का लगातार अपमान कर रही है। अच्छी बात यह है कि जनता बार-बार यह साबित कर रही है कि हम गांधी का देश यूं ही नहीं हैं। आज की तारीख में गांधी भी अगर वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठाते तो उन्हें ऐसे ही सलाखों के पीछे डाला जाता या उन पर भी लाठियां बरसतीं।

यह सही है कि विपक्ष सड़कों पर उतरा और विपक्ष के आह्वान पर जनता भी सड़क पर उतर आई। इस वक्त सबकी यही मांग है कि जिन लोगों ने वोटों की चोरी की है, धांधली करके चुनाव जीता है, उन्हें सत्ता में बैठने का कोई हक नहीं है। अगर सरकार को इस मांग से ऐतराज है तो वह साबित करे कि उसने चुनावी धांधली नहीं की। इसके लिए सबसे पहले तो ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाया जाए, फिर एसआईआर में उठे सवालों का जवाब दिया जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने के लिए जो पहले व्यवस्था थी, यानी प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के अलावा देश के मुख्य न्यायाधीश की चयन समिति बनाई जाए। मुख्य चुनाव आयुक्त को आजीवन कानूनी संरक्षण का प्रावधान भी खत्म किया जाए। यह सब मोदी सरकार कर ले तो फिर विपक्ष को आंदोलन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एसआईआर की जांच होगी तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। लेकिन ऐसा करने की जगह विपक्ष को अलोकतांत्रिक कहकर कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।

पिछली जुलाई में जंतर-मंतर पर हुई हिंसा पर विपक्ष ने लोकतांत्रिक तरीके से ही सदन में गृहमंत्री को जवाब देने कहा था, लेकिन पूरे मानसून सत्र में केवल आखिरी दिन अमित शाह लोकसभा में आए और वंदेमातरम् सुनकर चले गए। जुलाई से अब अक्टूबर आ गया, लेकिन इस सवाल का जवाब अमित शाह ने नहीं दिया कि पैलेट गन और एके 47 किसके आदेश पर चली। बल्कि अब नए सवाल भी जुड़ गए हैं कि प्रदर्शन के लोकतांत्रिक हक को मोदी सरकार क्यों कुचल रही है। क्यों पुलिस निहत्थे लोगों पर लाठियां बरसा रही है। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी अगर संसद में आकर इसका जवाब दे दें तो फिर विपक्ष और सामाजिक संगठनों को सड़क पर उतरना ही नहीं पड़ेगा।

जनता तो दरअसल वही कर रही है जो गांधीजी ने रास्ता दिखाया था। 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार की जांच के लिए बनी हंटर कमेटी के सामने सुनवाई के दौरान भी सरकार के सामने सत्याग्रह का सवाल पेश आया था। 1920 में अहमदाबाद में गांधी जी हंटर कमेटी के सामने पेश हुए थे, तो कमेटी ने सवाल किया था कि अगर आज़ाद भारत में बहुमत से चुनी हुई सरकार ऐसा कोई कानून पास कराती जिसे कुछ लोग या व्यक्ति अन्यायपूर्ण मानते हों तो क्या उन्हें अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ सत्याग्रह या सविनय अवज्ञा का अधिकार होगा?

इस पर गांधीजी ने कहा था हां बिलकुल होगा। ये लोगों का पवित्र कर्तव्य होगा कि अगर सरकार निरंकुश और भ्रष्ट हो जाये तब ऐसी सरकार के खिलाफ सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनायें। हिंसक तरह से विरोध लोगों का अधिकार है। कानूनी सज़ा स्वीकार करें और सरकार पर नैतिक दबाव बनायें।

आज हिंदुस्तान के लोग यही तो कर रहे हैं। अब भले रिजीम चेंज और रेजिस्टेंस यानी सत्ता परिवर्तन और प्रतिरोध को भाजपा गुनाह माने, लोकतंत्र के लिए तो यही दवा है और यही दुआ भी है।

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