ज्ञानेन्द्र तो फंस गए हैं लेकिन भाजपा?

भाजपा और केंद्र सरकार अगर अभी तक ज्ञानेश कुमार के पीछे खड़ी है तो यह उनके फायदे का सौदा रहा होगा।;

Update: 2026-10-06 22:02 GMT

भाजपा और केंद्र सरकार अगर अभी तक ज्ञानेश कुमार के पीछे खड़ी है तो यह उनके फायदे का सौदा रहा होगा। लेकिन इतना तय मानिए कि अगर ज्ञानेश कुमार फंसते हैं तो यह मेल बहुत दूर तक नहीं जाएगा। केन्द्रीय सत्ता इतनी आसानी से ऐसे मसलों से घिर जाए यह होता नहीं है। वह ज्ञानेश या किसी भी ऐसे अति महत्वाकांक्षी और कॅरियर के छोटे लाभों के लिए कायदे कानून को दरकिनार करने वालों से किनारा करने में देर नहीं लगाएगी।

अपनी निर्णय प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि संबंधी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट आने के बाद से चुनाव आयोग भले आम लोगों को और संबंधित पक्षों के सामने अपनी बात रखने से बचना चाहता था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार और आयोग के सभी संबंधित लोगों को अदालत के सामने सारे सवालों का जवाब देना पड़ेगा। और फिर इस सफाई का कोई मतलब नहीं हैं कि अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील के इस तर्क को नहीं माना कि मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित किया जाए और उनको काम करने से रोका जाए। अदालत यह फैसला नहीं कर सकती और बिना संबंधित पक्ष को सुने ऐसा फैसला न्यायोचित होता भी नहीं। लेकिन अदालत ने जिस तरह हर बात सफाई पूछी है और फार्म 6 के विवाद में खुद को घसीटे जाने से अपना पाला झटका है वह इस बात का संकेत हैं कि ज्ञानेन्द्र कुमार मुश्किल में हैं। अगर 14 फैसलों पर शेष दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को उन्होंने दरकिनार किया था तो यह गंभीर दोष है और सरकार द्वारा चुनाव कानून में बदलाव करने की जगह खुद से फार्म 6 में बदलाव कर लिए तो यह अपराध की श्रेणी में ही आएगा। अगर वे आपत्तियों के बाद भी शेष दोनों आयुक्तों द्वारा सभी फैसलों पर दस्तखत करने का प्रमाण ला देते हैं, जैसा कि भाजपा की तरफ से कहा जा रहा है, तो फिर अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी।

सवाल भाजपा के जवाब देने पर भी उठे हैं और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण पर भाजपा और एनडीए के लोग ही लगातार जवाब देते रहे हैं। उस हिसाब से इंडिया गठबंधन द्वारा चुनाव आयोग की घेरेबंदी और देश भर में विरोध प्रदर्शन का आयोजन करना महत्वपूर्ण है। कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी लगातार इस सवाल को उठाते रहे हैं लेकिन उनका व्यवहार मुद्दे के अनुरूप पर्याप्त गंभीर नहीं दिखता। सारी गड़बड़ बोलकर भी चुनाव में भागीदारी करना और जीतने पर सरकार बनाने से लेकर खुशियां मनाना और हारने पर ईवीएम और आयोग पर दोष मढ़ना गंभीरता को खत्म करता है। लेकिन अदालती लड़ाई और राजनैतिक लड़ाई का फर्क हमको भी समझना होगा। अदालत तथ्यों और तर्कों के आधार पर फैसला करती है, राजनीति में हवा बनने बनाने की भी बड़ी भूमिका है और चुनाव आयोग की घेरेबंदी से लेकर सड़कों पर उतरना उसका हिस्सा है। जब भाजपा खुलकर आयोग का साथ दे रही है तो ज्ञानेश कुमार के फै़सलों के साथ केंद्र सरकार और भाजपा को जोड़ना बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन अभी तक राहुल ने सड़क की कोई बड़ी लड़ाई नहीं लड़ी है।

मतदाता सूची के पुनरीक्षण को एक सामान्य प्रशासनिक अभियान की जगह घुसपैठिया-विरोधी मुहिम, अल्पसंख्यक-विरोधी मुहिम और कमजोर तथा कम पढ़े-लिखे या दस्तावेजों को संभालने और प्रस्तुत करने के मामले में कमजोर या लाचार लोगों के खिलाफ अभियान बना देना चुनाव आयोग भर का काम न था। यह भाजपा का एजेंडा था और जो अभियान भारतीय मतदाता सूची को दुरुस्त करने पर केंद्रित होना चाहिए था वह जाने कब विदेशी नागरिक ढूंढने वाला बना दिया गया। फार्म 6 में बदलाव भी वोटर के मां-बाप की तलाश और उनसे जुड़े दस्तावेज तक इसी के चलते पहुंचा।

और नतीजा क्या निकाला? बांग्लादेशी या रोहिंगिया घुसपैठियों के पकड़े जाने का शायद ही कोई मामला सामने आया लेकिन मतदाता सूची से तेरह करोड़ नाम काट दिए गए। यह सब तब हुआ जब बिहार के बाद हर राज्य में राजनैतिक दलों द्वारा नए मतदाता सूची में नाम जोड़वाने और कटवाने का अभियान सा चलाया। मृत लोगों या पता बदलने वालों और दो जगह नाम वालों का नाम हटाना जरूरी था लेकिन उसके लिए कई राज्यों में तीस फीसदी से भी ज्यादा नाम काट देना सिर्फ बीएलओ जैसे कर्मचारियों के वश का नहीं है। यह निर्देश आयोग और संभव है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से गया हो। इसी संभावना को पुख्ता राजनैतिक विमर्श बनाने की कोशिश कांग्रेस और विपक्ष कर रहे हैं। अब यह उनके पुरुषार्थ पर निर्भर करता है कि वे इस काम को कहां तक पहुंचाते हैं।

भाजपा और केंद्र सरकार अगर अभी तक ज्ञानेश कुमार के पीछे खड़ी है तो यह उनके फायदे का सौदा रहा होगा। लेकिन इतना तय मानिए कि अगर ज्ञानेश कुमार फंसते हैं तो यह मेल बहुत दूर तक नहीं जाएगा। केन्द्रीय सत्ता इतनी आसानी से ऐसे मसलों से घिर जाए यह होता नहीं है। वह ज्ञानेश या किसी भी ऐसे अति महत्वाकांक्षी और कॅरियर के छोटे लाभों के लिए कायदे कानून को दरकिनार करने वालों से किनारा करने में देर नहीं लगाएगी। लेकिन इसके लिए जरूरी होगा कि कांग्रेस और विपक्ष का सड़क का आन्दोलन इतना दबाव बनाने में सफल हो जिसे भाजपा का नेतृत्व अपने लिए नुकसानदेह मानने लगे। यह दूर की बात लगती है लेकिन अदालती फैसला इस स्थिति को जल्दी भी लाने में मदद करेगा। अगली सुनवाई की तारीख ज्यादा दूर नहीं है और वहां आया जवाब काफी सारे संकेत देने लगेगा।

विपक्ष इस बात पर भी खुश हो सकता है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर सीधे ज्ञानेन्द्र कुमार की विदाई को मुद्दा बनाया है। उसका अभियान 10 अक्टूबर से चलेगा। इसके पहले उसने दो अक्टूबर को जो कार्यक्रम किया उसमे मुंबई का कार्यक्रम काफी सफल रहा जबकि दिल्ली में पुलिस ने आंदोलनकारियों को लगातार खदेड़ा। इसमे सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी के लोग ही नहीं वाम छात्र संगठन और योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण जैसे लोग भी थे। उसे और इस मांग को जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के सीटींग जज समेत काफी सारे प्रबुद्ध और नामी लोगों का समर्थन मिल रहा है उसे भी विपक्ष अपने आंदोलन का सहारा बना सकता है। पिछली बार कॉकरोच जनता पार्टी ने ही मोदी सरकार की और उनकी मजबूत छवि को तार-तार कर दिया था और धर्मेन्द्र प्रधान को जाना पड़ा। लेकिन इसके लिए विपक्ष को बहुत सावधानी और समझ से काम करना होगा। उससे ज्यादा मुश्किल काम भाजपा के लिए है। अभी तक तो वह ज्ञानेन्द्र कुमार के हर काम का समर्थन कर दिया करती थी और सुप्रीम कोर्ट तक ने बंगाल चुनाव के समय लाखों मतदाताओं को निराश करते हुए अगले चुनाव में वोट डालने का मजाक कर दिया। इस बार ऐसा लगता नहीं। ज्ञानेश कुमार फंस गए हैं लेकिन भाजपा फंसी है या नहीं यह आने वाले वक्त में जल्दी ही पता चल जाएगा।

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