गैंगस्टर को कानूनी संरक्षण क्यों

इस घटना के बाद अनिल पंडित और हरमन संधू ने बाकायदा सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जिम्मेदारी ली है।;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-10-19 21:20 GMT

फिल्म अभिनेता टाइगर श्रॉफ़ पर मुंबई में रविवार शाम उस समय सरेराह गोलियां बरसाई गईं, जब वे फुटबॉल खेलने के बाद अपनी गाड़ी में बैठकर घर की तरफ जा रहे थे। भीड़भाड़ होने की वजह से गाड़ी की रफ्तार धीमी थी, अभिनेता को देखने के लिए लोग जमा थे, हाथों में मोबाइल थे, लिहाजा घटना के कई वीडियो भी सामने आए हैं। जिनमें साफ दिख रहा है कि दो लोग आराम से पिस्तौल निकाल कर गोलियां बरसाते हैं और फिर भाग जाते हैं। फिल्मों और धारावाहिकों में तो ऐसे कई दृश्य देखे गए हैं, लेकिन असल जिंदगी भी फिल्मी कहानियों से अलग कहां हैं। इस गोलीबारी में टाइगर श्रॉफ बाल-बाल बचे, अलबत्ता उनके ड्राइवर को हाथ में गोली लगी और कार के बगल में ही मौजूद एक अन्य व्यक्ति को भी गोली लगी। टाइगर श्रॉफ फिल्मों में अपने एक्शन और स्टंट सीन्स के लिए खासे मशहूर हैं और ये देखकर अच्छा लगा कि घटना के बाद उन्होंने पर्दे की तरह बहादुरी दिखाते हुए ड्राइविंग सीट पर आकर स्टीयरिंग संभाला और अपने ड्राइवर को अस्पताल ले गए। आप पर गोलियां चलें और उसके कुछ क्षणों में ही आप खुद को संभाल लें, यह काम आसान नहीं है।

इस घटना के बाद अनिल पंडित और हरमन संधू ने बाकायदा सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जिम्मेदारी ली है। बताया जा रहा है कि ये लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े लोग हैं। मुंबई में इससे पहले बाबा सिद्दीकी की इसी तरह गोलियों से जान ले ली गई थी, फिर सलमान खान के घर पर भी गोलीबारी की गई थी। उधर पंजाब में गायक सिद्धू मूसेवाला को भी ऐसे ही मारा गया था। तमाम घटनाओं में लॉरेंस बिश्नोई का ही नाम सामने आ रहा है। अनिल पंडित और हरमन संधू का कहना है कि टाइगर श्रॉफ को सलमान खान के साथ काम न करने की हिदायत दी गई थी, लेकिन उसने बात नहीं मानी। दरअसल बिश्नोई गैंग सलमान खान के काले हिरण के शिकार वाले मामले में उनका दुश्मन बना हुआ है। हालांकि कानून हाथ में लेने का यह कोई बहाना नहीं होता।

असल बात यह है कि अब लॉरेंस बिश्नोई वही जगह ले चुका है जो एक वक्त हाजी मस्तान या दाउद इब्राहिम जैसे कुख्यात अपराधियों की होती थी। फर्क इतना ही है कि लॉरेंस बिश्नोई ने हिंदुत्व का कवच ओढ़ रखा है। सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है कि कितने दक्षिणपंथी लोगों ने लॉरेंस बिश्नोई की शान में समय-समय पर कसीदे गढ़े हैं। कानून हाथ में लेते हुए अपनी सुविधा के हिसाब से लोगों को मारना या धमकाना अपराध के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन इस पर ज्यादा चर्चा इस समय इसलिए नहीं हो रही है क्योंकि लॉरेंस बिश्नोई हिंदुत्ववादी लोगों की नजरों में चढ़ा हुआ है। टाइगर श्रॉफ मामले में ही दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने कहा कि इस घटना के बारे में जो कॉल था, उसमें लॉरेंस बिश्नोई साहब का नाम लिया गया था। सोचिए किस तरह एक गैंगस्टर को पुलिस अधिकारी ने साहब कहा और मुख्यधारा का मीडिया सवाल नहीं कर रहा। अगर ऐसा ही बयान कांग्रेस सरकार के वक्त दिया गया होता तो अब तक गृहमंत्री से इस्तीफे की मांग कर ली गई होती। लेकिन फिलहाल पूरे मामले में अमित शाह पर कोई सवाल ही नहीं कर रहा है।

मुंबई में नवरात्रि के वक्त इस तरह की घटना पर कायदे से सरकार को जिम्मेदारी लेते हुए माफी मांगनी चाहिए थी कि कानून व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक हो गई। लेकिन इसकी जगह विपक्ष को सवाल उठाने पर घेरा जा रहा है। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस दावा कर रहे हैं कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने इनके आका जो कहीं छुपकर बैठे हैं, उनको भी हम ढूंढने का काम करेंगे। हम केंद्र सरकार की मदद से उनको ढूंढेंगे और उन पर कार्रवाई की जाएगी। कोई भी गैंग या कोई भी व्यक्ति हो, उसको छोड़ा नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री का यह बयान हास्यास्पद लगता है। क्योंकि मामले में अगर लॉरेंस बिश्नोई का नाम आया है, तो उससे पूछताछ करना कोई कठिन नहीं है। क्योंकि वह अभी फरार नहीं है, पिछले चार सालों से गुजरात की जेल में ही बंद है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इस हमले के तीन अभियुक्तों को राजस्थान के कोटा से पुलिस ने गिरफ़्तार किया है। लेकिन ऐसी कोई खबर नहीं आई है कि मुंबई पुलिस पूछताछ के लिए गुजरात पहुंची हो।

क्योंकि लॉरेंस बिश्नोई को तो साबरमती जेल से बाहर ही नहीं लाया जा सकता। अगस्त 2023 में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 268 के तहत आदेश जारी कर गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई को गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल से बाहर ले जाने पर पाबंदी लगा दी थी। इस आदेश के कारण अन्य राज्यों जैसे मुंबई, पंजाब या दिल्ली की पुलिस उसे अपने राज्य ले जाकर पूछताछ नहीं कर सकती। यदि किसी एजेंसी को पूछताछ करनी होती है, तो उसे साबरमती जेल परिसर के भीतर ही जाकर पूछताछ करनी पड़ती है। अब सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के खतरों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार इस आदेश को हर साल आगे बढ़ाती रही है। लॉरेंस बिश्नोई की तरह ही उसके छोटे भाई अनमोल बिश्नोई को भी पूछताछ के लिए एक साल तक तिहाड़ जेल से बाहर न निकालने के आदेश दिए गए हैं। गृह मंत्रालय ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 300 के तहत यह आदेश जारी किया है। जिसके मुताबिक अनमोल का किसी भी राज्य की पुलिस या केंद्रीय एजेंसियां अगले एक साल तक ट्रांजिट रिमांड नहीं ले पाएगी।

इन आदेशों के पीछे कारण बताया जा रहा है कि लारेंस भाइयों को उसके विरोधी गैंगस्टर हिमांशु भाऊ, दविंदर सिंह बंबिहा, नीरज बवाना, कौशल चौधरी, जग्गू भगवानपुरिया, गोल्डी बराड़ और रोहित गोदारा जैसों से जान को खतरा है। कितने कमाल की न्याय व्यवस्था चल रही है कि दूसरों की जान लेने का खेल जेल में बैठकर जो लोग रच रहे हैं, उन्हें कानूनन सुरक्षा दी जा रही है। वैसे गौर करने की बात ये है कि अनमोल से पहले लॉरेंस तिहाड़ जेल में था और यहीं से उसने सिद्धू मूसेवाला की हत्या को अंजाम दिया था। उसके बाद जब वह साबरमती जेल में भेजा गया तो वहां से बाबा सिद्दकी की हत्या करा दी थी। इसके बावजूद न गुजरात सरकार से, न गृहमंत्री अमित शाह से सवाल हो रहा है कि आखिर लॉरेंस बिश्नोई को कौन सी सुविधाएं मिल रही हैं, जो वह जेल में बैठकर हत्याएं करवा रहा है। माननीय अदालत को क्या अब स्वत:संज्ञान लेते हुए गैंगस्टर को मिले सुरक्षा कवच पर सवाल नहीं उठाए चाहिए। 

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