न्यायपालिका की तरफ बढ़े जनता के कदम

सोमवार 12 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के नेतृत्व में आम जनता ने अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शन किया;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-10-13 01:47 GMT

सोमवार 12 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के नेतृत्व में आम जनता ने अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शन किया। राहुल गांधी के एक आह्वान पर लाखों की संख्या में लोग जुटे, क्योंकि अब सवाल महज भ्रष्टाचार, काला धन, पेपर लीक, लड़कियों की सुरक्षा, सांप्रदायिक उन्माद जैसे मुद्दों का नहीं है, सवाल अपने नागरिक होने के हक को बचाने का है। अगर करोड़ों लोग वोट देने के अधिकार से ही वंचित कर दिए जाते हैं, तो फिर वे इस लोकतंत्र का हिस्सा भी नहीं रह जाएंगे। करोड़ों लोगों के वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब है लोकतंत्र का ही खत्म हो जाना। ऊपर जिन मुद्दों का जिक्र किया गया है, उन पर देश में कई बार नाराजगी दिखाते हुए जनता सड़कों पर आई है। राजधानी दिल्ली में भी जे पी आंदोलन से लेकर अन्ना आंदोलन या पिछले बरसों में किसान आंदोलन, शाहीन बाग आंदोलन जैसी घटनाएं घटी हैं। ऐसे हरेक आंदोलन के पीछे सामाजिक, गैर सरकारी संगठन या विभिन्न राजनैतिक दल होते हैं। वे सरकार के खिलाफ अपने आक्रोश को दिखाने या अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरते हैं, सरकारें ताकत दिखाने के लिए कभी दमनकारी पैंतरे आजमाती है, कभी थोड़ी बहुत तकरार और बहस के बाद दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर आते हैं। लेकिन वोट चोरी के मुद्दे पर जनता की नाराजगी और विपक्ष के आह्वान पर खड़े हुए आंदोलन में केवल एक ही पक्ष तस्वीर में दिखाई दे रहा है। दूसरे पक्ष यानी सरकार की तरफ से केवल पुलिस, सुरक्षा बल या दक्षिणपंथी संगठनों के गुंडे-मवाली ही नजर आ रहे हैं। जिनसे शिकायत है, यानी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य चुनाव आयुक्त वे सब तस्वीर से इस तरह गायब हैं, मानो उन्हें जनता से कोई सरोकार ही नहीं है। उन्हें सत्ता मिल चुकी है और अब जनता उनकी नजरों से गायब है।

इसलिए राहुल गांधी ने पहले ही आह्वान किया था कि अब वे इंडिया ब्लॉक की तरफ से भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलने जाएंगे और अपनी शिकायतों को उनके सामने रखेंगे। हालांकि सुबह ही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ऐसी किसी मुलाकात के लिए अपनी सहमति नहीं दी। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। कोई भी याचिका दायर कर सकता है, चाहे वह आम नागरिक हो या किसी निर्वाचित निकाय का सदस्य। भारत के हर नागरिक को हमारे पास आने का अधिकार है। हम कानून के अनुसार उनकी शिकायतों पर सुनवाई करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि जो लोग राहत पाने के हकदार हैं, उन्हें राहत मिले।

मुख्य न्यायाधीश ने बिल्कुल कानूनसम्मत बात कही है। लेकिन अभूतपूर्व वक्त में फैसले भी अभूतपूर्व तरीके से ही लिए जाते हैं। जैसे पहले अदालत तक पहुंचना भी सबके बस में नहीं होता था। फिर 80 के दशक में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने पोस्टकार्ड पर लिखी शिकायत या याचिका को भी सुनवाई के योग्य माना, क्योंकि न्याय पाना हरेक का अधिकार है। इसके बाद अदालत ने तय किया कि गरीब, कैदी, बंधुआ मजदूर या शोषित व्यक्ति औपचारिक वकील या कोर्ट की जटिल प्रक्रिया का पालन करने में असमर्थ है, तो उसके द्वारा भेजा गया पोस्टकार्ड या पत्र भी रिट याचिका के रूप में दर्ज किया जा सकता है। ऐसी ही नयी पहल मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी शुरु कर सकते थे कि वे देश की आधी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहे विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात कर उनसे शिकायती पत्र स्वीकार कर सकते थे। बाद में अदालत में मामला तो प्रक्रिया के मुताबिक ही चलता। बहरहाल, सीजेआई सूर्यकांत न्यायिक और लोकतांत्रिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अपना नाम दर्ज करवाने का मौका गंवा बैठे हैं।

बीते शुक्रवार को ही राष्ट्रपति मुर्मू ने भी विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात की। क्योंकि जिन ज्ञानेश कुमार से विपक्ष मिलना चाह रहा है, वो मिलने का वक्त तो दे ही नहीं रहे, बल्कि इस समय पूरी तरह गुमशुदा चल रहे हैं। विपक्ष उनसे मिलता तो उन्हें अपना पत्र सौंप कर पूछता कि आपके मातहत दोनों चुनाव आयुक्तों ने जो आपत्तियां बार-बार उठाईं, उन पर आपका क्या रुख है। चुनाव आयोग में एसआईआर को लेकर किस तरह फैसले लिए गए, कब-कब इस बारे में बैठक हुई, बैठकों का एजेंडा और मिनट्स सब की जानकारी मुहैया करा दीजिए। अगर ज्ञानेश कुमार विपक्ष की मांगों पर ऐसा करते तो आज लाखों लोगों को प्रदर्शन के लिए न उतरना पड़ता, न लाखों का पुलिस बल दिल्ली की सड़कों पर तैनात होता।

2024 के चुनाव के बाद जब राहुल गांधी ने महादेवपुरा और अलंद सीटों में वोटर लिस्ट की गड़बड़ी के सबूत प्रेस कांफ्रेंसस में दिखाए थे तो इन्हीं ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी के सामने दो विकल्प रखे थे या तो वे हलफनामा दें या फिर माफी मांगे, तीसरा विकल्प राहुल गांधी को ज्ञानेश कुमार ने नहीं दिया था। लेकिन राहुल गांधी ने इनकी जगह कई और प्रेस कांफ्रेंसेस कीं और कई जगहों पर वोट चोरी के सबूत पेश कर दिए। अब ज्ञानेश कुमार राहुल गांधी के सामने विकल्प नहीं रख रहे, बल्कि कहीं गायब होकर देश में लोकतंत्र का तमाशा बनते देख रहे हैं। हालांकि सोमवार की प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने फिर से ज्ञानेश कुमार के सामने विकल्प रखा है कि वे खुद आकर बता दें कि एसआईआर के जरिए वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की साजिश किसके दबाव में रची गई। अगर ज्ञानेश कुमार ऐसा करते हैं, तब तो उनके पास बचने का मौका रहेगा, वर्ना कानूनन उन्हें सजा दिलाने का पूरा इंतजाम किया जाएगा, ऐसा दावा राहुल गांधी ने किया है। ज्ञानेश कुमार के बाद नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के साथ भी ऐसा ही होगा, यह भी राहुल गांधी ने कहा।

फिलहाल इन पंक्तियों के लिखे जाने तक राहुल गांधी के आह्वान पर वोट चोरी के खिलाफ खड़े हुए तमाम लोग सुप्रीम कोर्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। इनमें नेहा बोरा, योगेन्द्र यादव जैसे चेहरे भी शामिल हैं। राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार अलग-अलग लड़ाई नहीं लड़ी जा रही हैं, सब एक ही मकसद के लिए एकजुट हैं। राहुल गांधी समेत लाखों लोगों को रोकने के लिए रास्तों में बैरिकेडिंग की गई, तो अभिषेक मनु सिंघवी के नेतृत्व में वकीलों की टीम ने राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सौगत रॉय, अखिलेश यादव, तेजस्वी प्रसाद यादव, संजय राउत, एमए बेबी और डी राजा इन आठ लोगों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें ज्ञानेश कुमार को हटाने, एसआईआर रद्द करने और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की गई है। इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर दर्ज किया गया है। अब देखना होगा कि सीजेआई सूर्यकांत इस पर किस तरह सुनवाई को आगे बढ़ाते हैं। क्योंकि अब लोकतंत्र बचाने के लिए न्यायपालिका की तरफ जनता के कदम बढ़ चुके हैं, जिन्हें रोकना असंभव दिख रहा है। 

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