खुली आंखों से न्याय की देवी देख रही हैं अवमानना

दो साल पहले अक्टूबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की देवी की नयी मूर्ति लगाई गई थी।;

By :  DB Desk
Update: 2026-10-11 21:46 GMT

दो साल पहले अक्टूबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की देवी की नयी मूर्ति लगाई गई थी। जिसकी आंखों पर पट्टी नहीं थी, हाथों में दंड का प्रतीक तलवार को संविधान की किताब से बदल दिया गया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी वाय चंद्रचूड़ के वक्त यह बदलाव हुआ था, उद्देश्य था कि औपनिवेशक दासता के प्रतीकों को हटाया जाए। न्याय की देवी की आंखें खुली रखकर संदेश देने की कोशिश हुई कि कानून अंधा नहीं होता। हालांकि आंखों पर पट्टी का मकसद यह बताना था कि कानून किसी को देखकर फैसला नहीं सुनाता, निष्पक्ष होता है। मगर अब खुली आंखों से शायद न्यायपालिका में बैठे लोगों को नजर आ रहा है कि कौन मोदी-शाह के लोग हैं और कौन उनके विरोधी हैं। उसी हिसाब से फैसले होते हैं। अगर मजबूरी में सरकार के खिलाफ फैसला देना भी पड़े तो फिर इस बात की परवाह नहीं रहती कि उस फैसले का पालन हो रहा है या खुलेआम अवमानना हो रही है।

शनिवार और रविवार को यह बात और खुलकर नजर आई। शनिवार 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतर-मंतर पर फिर से प्रदर्शन का ऐलान किया था। ज्ञानेश कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद से हटाने, एसआईआर को वापस लेने, 2024 से पहले की वोटर लिस्ट ही बहाल करने जैसी कई मांगों पर इस समय देशव्यापी आंदोलन चल ही रहा है। राहुल गांधी तो लगातार वोट चोरी के आरोप सबूतों के साथ लगा रहे हैं, अब इंडिया के बाकी दल भी उनके साथ आ गए हैं। पिछले हफ्ते विपक्ष के तमाम नेताओं ने किस तरह ज्ञानेश कुमार से मिलने की कोशिश की और उन्हें कैसे पुलिस ने जबरदस्ती रोका, यह सभी ने देखा है। इन लोगों ने 9 तारीख को राष्ट्रपति से भी मुलाकात की और राहुल गांधी ने कहा कि द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें सबूत लाने भी कहा है, जो वो ले आएंगे। सोमवार 12 अक्टूबर को राहुल गांधी ने इसी मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से मिलने का वक्त मांगा है। इससे पहले उन्होंने सोमवार को ही फिर से प्रदर्शन का ऐलान भी किया है। इधर कॉकरोच जनता पार्टी के साथ-साथ सिविल सोसायटी ने भी शनिवार को आंदोलन का ऐलान किया था, तो शुक्रवार को ही दिल्ली को बंधक बनाने का काम नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने किया था।

57 मेट्रो स्टेशन शनिवार को बंद किए गए, दिल्ली आने वाली कई ट्रेनें रद्द हो गईं, जो ट्रेनें आईं उनमें ढूंढ-ढूंढ कर लोगों को उतारा गया, हिरासत में लिया गया। अब तक प्रदर्शनकारी बंद का आह्वान करते थे, लेकिन यह आजादी के 80 बरसों में पहला मौका था जब सरकार ने ही राजधानी को बंद करवा दिया। शनिवार को विमान से ही कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजित दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया। इन्हें कहां ले जाया गया, इस बारे में देर रात तक कोई खबर ही नहीं थी। रविवार सुबह 9 बजे इन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां इनकी सशर्त रिहाई की गई। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मेट्रो आदि सार्वजनिक परिवहन को बंद न किया जाए, क्योंकि इससे आम लोगों को तकलीफ होती है। लेकिन फिर भी इस आदेश को नहीं माना गया। इस पर भी रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे अवमानना क्यों न माना जाए। अपनी विशेष सुनवाई में शीर्ष अदालत में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की दो-सदस्यीय बेंच ने यह भी कहा कि क़ानून के मुताबिक़ शहर में लोगों की निर्बाध आवाजाही की अनुमति होगी। क़ानून में निर्धारित प्रक्रिया के अलावा किसी को हिरासत में नहीं लिया जाएगा। लेकिन इस आदेश के पारित होने के कुछ देर बाद ही रविवार को दिन के 11 बजे के आसपास सिविल सोसायटी के लोग, वामपंथी छात्र संगठन और एनएसयूआई के कार्यकर्ता ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए उतरे तो दिल्ली पुलिस ने उन्हें पहले की तरह प्रताड़ित करते हुए हिरासत में ले लिया। यानी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को एक दिन क्या कुछ घंटों के लिए भी मोदी सरकार ने नहीं माना, इसके बाद क्या फर्क पड़ता है कि न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी है या खुली है। मूर्ति तो जड़ है, लेकिन न्याय की आसंदी पर बैठे मी लॉर्ड क्या यह सब नहीं देख रहे हैं। अगर संविधान की रक्षा करने वाले सुप्रीम कोर्ट की बात ही सरकार नहीं मानेगी, बल्कि उसके आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए आम लोगों का दमन करेगी, तो फिर जनता किनसे न्याय की उम्मीद रखेगी, यह पूर्व और मौजूदा न्यायाधीशों को बताना चाहिए।

जंतर-मंतर पर जुलाई में जो आंदोलन हुआ था, उसमें भी मोदी सरकार के खिलाफ ही गुस्सा था, लेकिन वह केवल परीक्षा में चोरी की नाराजगी थी, इस बार नाराजगी का दायरा बड़ा है, क्योंकि सवाल नागरिकता की चोरी का है। नरेन्द्र मोदी जानते हैं कि धर्मेन्द्र प्रधान की तरह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से उनकी कुर्सी नहीं बचेगी, बल्कि मामला उनकी सत्ता के लिए संगीन हो सकता है। कौन जाने ज्ञानेश कुमार की फाइलों में ऐसे कौन से राज सुरक्षित हैं, जिन्हें मोदी कतई बाहर नहीं आने देना चाहते। इसलिए यह मामला महज एक नौकरशाह को बचाने का नहीं, अपनी सत्ता बचाने का है।

वैसे भी नरेन्द्र मोदी किस तरह डरे हुए और अमेरिका के आगे दबे हुए हैं, इसका एक नमूना एलन मस्क ने दिखा ही दिया है। मस्क ने अपने ही बनाए प्लेटफार्म एक्स पर खुलेआम मुकेश अंबानी को भारत का प्रधानमंत्री लिखा है। आजाद भारत में कभी किसी विदेशी कारोबारी ने ऐसा दुस्साहस नहीं किया कि वह भारत के प्रधानमंत्री की गरिमा को ऐसे तार-तार करे। लेकिन इस बार तो मौका नरेन्द्र मोदी ने ही दिया है। पूरी भाजपा इस मुद्दे पर मुंह में दही जमा कर बैठ गई है।

मोदी सरकार इस समय अपनी पूरी ताकत प्रदर्शनकारियों और निष्पक्ष पत्रकारों को कुचलने में लगा रही है। शनिवार के प्रदर्शन को कवर करने गए देशबन्धु डीबी लाइव के पत्रकार समीरात्मज मिश्र से दिल्ली पुलिस ने बदसलूकी की, यह बात कैमरे में दर्ज हुई है। उनके अलावा और भी कई पत्रकारों, खासकर महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई। रविवार को दिल्ली प्रेस क्लब के बाहर ही भारी पुलिस बल और आंसू गैस छोड़ने वाले वाहन तैनात कर दिए गए। पुलिस अधिकारी अनाधिकृत रूप से प्रेस क्लब के भीतर हथियारों के साथ चले गए। यह सब सुप्रीम कोर्ट की नाक के नीचे ही हो रहा है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं भाजपा की मददगार बन चुकी हैं, ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाएं सरकार के इशारों पर काम कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की बात कोई नहीं सुन रहा और अब लोकतंत्र में आईने का काम करने वाली पत्रकारिता को डराया जा रहा है। देश पर आए ये दुर्दिन जनता ही बदलेगी।

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